सबसे बड़ी संपत्ति वह है जो हम अपने भीतर प्राप्त करते हैं। एक बार जब हम अपने भीतर की शांति और खुशी को महत्व देने लगते हैं, तो हम उस संपत्ति को बनाए रखने के लिए आवश्यक धन भी अर्जित कर लेते हैं। इसे समझने के लिए आइए, यह सुंदर कहानी पढ़ते हैं।
एक बार एक चोर महान बौद्ध गुरु नागार्जुन के आभा-मंडल (Aura) के प्रति आकर्षित हो गया। चोर ने नागार्जुन से पूछा, “क्या मेरे विकास की भी कोई संभावना है? आप जो कहेंगे मैं वही करूँगा, लेकिन मैं चोरी करना नहीं छोड़ सकता। यह बात मैं शुरू में ही साफ कर देना चाहता हूँ।”
जागरूकता और आंतरिक शांति: नागार्जुन और चोर की प्रेरणादायक लोककथा
नागार्जुन हँसे और बोले, “मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं है। मेरी बस एक ही शर्त है: जागरूक (Aware) रहो। जाओ, घरों में सेंध लगाओ, प्रवेश करो, चीजें उठाओ, चोरी करो; तुम जो चाहे करो, उससे मुझे कोई सरोकार नहीं – मैं कोई चोर नहीं हूँ – लेकिन जो भी चोरी करो, पूर्ण जागरूकता के साथ करो।”
चोर समझ नहीं पाया कि जाल में फँस रहा है। तीन सप्ताह बाद वह वापस आया और बोला, “आप बहुत चतुर हैं क्योंकि मैं जागरूक हो जाता हूँ तो मैं चोरी नहीं कर पाता। और यदि मैं चोरी करता हूँ तो जागरूकता गायब हो जाती है। मैं दुविधा में हूँ।”
उसने आगे बताया, “अभी पिछली रात ही पहली बार मैं राजा के महल में प्रवेश करने में सफल रहा। मैंने खजाना खोल लिया। मैं दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन सकता था, लेकिन मुझे आपकी सीख याद आ गई; ‘जागरूक रहना’। जब मैं जागरूक हुआ तो मैं ढेर पत्थर की तरह लगने लगा, साधारण पत्थर। जब मेरी जागरूकता लुप्त हुई तो वह खजाना फिर से दिखने लगा। तब मैंने सोचा, ‘मैं यह क्या कर रहा हूँ? पत्थरों के पीछे खुद को खो रहा हूँ?’ अंततः मैंने फैसला किया कि वे इस लायक नहीं थे।”
नागार्जुन ने कहा, “अब, तुम तय करो! यदि तुम जागरूकता चाहते हो, तो फैसला करो। यदि तुम इसे नहीं चाहते, तो भी फैसला तुम्हारा ही है।”
नागार्जुन को बुद्ध के बाद सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध दार्शनिक माना जाता है
नागार्जुन दक्षिण भारत के एक भारतीय विद्वान-भिक्षु, दार्शनिक और महायान बौद्ध धर्म के शिक्षक (आचार्य) थे। उन्हें मध्यमक (मध्यमार्ग) संप्रदाय का संस्थापक माना जाता है।
आचार्य नागार्जुन दूसरी शताब्दी (लगभग 150–250 ईस्वी) के महान भारतीय बौद्ध दार्शनिक थे। उन्हें भगवान बुद्ध के बाद सबसे महत्वपूर्ण बौद्ध दार्शनिक और महायान बौद्ध धर्म के ‘मध्यमक‘ (शून्यवाद) संप्रदाय का संस्थापक माना जाता है। तिब्बत, चीन और जापान जैसे देशों में उन्हें ‘दूसरा बुद्ध‘ भी कहा जाता है।
आचार्य नागार्जुन भारत के उन विरल प्रज्ञावानों में से थे, जिनकी तुलना बुद्ध से की जा सकती है। उनकी बुद्धि इतनी पैनी थी कि संसार के दार्शनिक आज भी उनके ‘शून्यवाद’ के सामने नतमस्तक होते हैं।
एक बार नागार्जुन राजधानी से गुजर रहे थे। उस देश की रानी उनकी परम भक्त थी। जब नागार्जुन राजमहल के द्वार पर भिक्षा मांगने पहुँचे, तो रानी ने उनके पुराने लकड़ी के पात्र के बदले एक रत्नों से जड़ा सोने का भिक्षापात्र उन्हें भेंट किया।
नागार्जुन ने बिना किसी संकोच या विरोध के उसे स्वीकार कर लिया। रानी को थोड़ा आश्चर्य हुआ – उसे लगा कि एक महान संन्यासी को सोने का मोह नहीं होना चाहिए था, उन्हें मना करना चाहिए था। पर नागार्जुन के लिए क्या मिट्टी और क्या सोना? उनके लिए दोनों का मूल्य शून्य था।
एक प्रसिद्ध चोर ने जब एक नग्न संन्यासी के हाथ में वह कीमती पात्र देखा, तो उसके मन में लालच आ गया। उसने सोचा, “यह साधु इसकी रक्षा कैसे करेगा? कोई भी इसे छीन लेगा, इससे अच्छा मैं ही इसे चुरा लूँ।” चोर नागार्जुन के पीछे-पीछे उनके ठहरने के स्थान (एक खंडहर मठ) तक पहुँच गया।

नागार्जुन जानते थे कि कोई उनके पीछे आ रहा है। जैसे ही वे मठ के भीतर पहुँचे, उन्होंने वह कीमती पात्र खिड़की से बाहर चोर की तरफ फेंक दिया।
चोर स्तब्ध रह गया। उसने सोचा, “यह कैसा पागल आदमी है? जिसे पाने के लिए लोग जान दे देते हैं, इसने उसे कूड़े की तरह बाहर फेंक दिया!” जिज्ञासावश वह चोर अंदर गया और बोला, “महाराज, मैं इसे चुराने आया था, पर आपने इसे फेंक क्यों दिया?”
नागार्जुन ने सहजता से कहा, “मैंने इसे इसलिए फेंका ताकि तुम्हें अंदर आने में संकोच न हो। मैं सोने जा रहा था, और मैं नहीं चाहता था कि तुम मेरी नींद का इंतज़ार करो। तुम इसे ले जाओ, यह तुम्हारा ही है।”
चोर नागार्जुन की इस विराटता से हिल गया। उसने कहा, “मैं एक नामी चोर हूँ। कई साधुओं के पास गया, सब कहते हैं कि पहले चोरी छोड़ो, तब दीक्षा मिलेगी। पर मैं चोरी छोड़ नहीं पाता। क्या मेरे जैसे पापी के लिए शांति का कोई मार्ग है?”
नागार्जुन मुस्कुराए और बोले: “चोरी और ध्यान का भला क्या लेना-देना? तुम अपना काम जारी रखो। बस मेरी एक शर्त है: तुम जो भी करो, पूरे ‘होश’ में करना। जब तिजोरी तोड़ो, तो सजग रहना कि हाथ कैसे चल रहे हैं। जब हीरा उठाओ, तो देखना कि भीतर क्या घट रहा है। बस बेहोश मत होना।”
तीसरे ही दिन वह चोर नागार्जुन के चरणों में गिर पड़ा। वह बोला, “आपने मेरे साथ चालाकी की! पिछले तीन दिनों से मैं राजमहल के खजाने तक जाता हूँ, कीमती रत्न हाथ में उठाता हूँ, लेकिन जैसे ही मैं ‘सजग’ होता हूँ, मेरे हाथ पत्थर के हो जाते हैं। होश और चोरी एक साथ नहीं चल सकते।”
उसने आगे कहा, “जब मैं बिना कुछ चुराए खाली हाथ वापस लौटा, तो मुझे पहली बार लगा कि मैं चोर नहीं, बल्कि खुद एक सम्राट हूँ। मुझे अब वह धन नहीं, वह ‘होश’ चाहिए। मुझे अपना शिष्य बना लीजिए।”
यह कहानी हमें सिखाती है कि परिवर्तन बाहर से थोपने से नहीं, बल्कि भीतर की सजगता से आता है।
“जागरूकता वह दीया है, जिसके जलते ही अंधेरा (बुरा साया) टिक नहीं पाता।”
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