क्रोध का परिणाम: शिक्षाप्रद हिंदी कहानी की कैसे क्रोध बुद्धि और विवेक को नष्ट कर देता है

क्रोध का परिणाम: शिक्षाप्रद हिंदी कहानी की कैसे क्रोध बुद्धि और विवेक को नष्ट कर देता है

कुणाल एक मध्यमवर्गीय परिवार का इकलौता बेटा था। माता-पिता उसे बहुत प्यार करते थे। वे चाहते थे कि उनके बेटे को किसी भी चीज की कमी न रहे। कुणाल कुछ मांगता, उससे पहले ही उसकी जरूरत की चीज घर में आ जाती।

धीरे-धीरे यही लाड़-प्यार उसकी आदत  बिगाड़ने लगा। वह जिद्दी होता जा रहा था। बचपन में उसकी छोटी-छोटी इच्छाएं आसानी से पूरी हो जाती थीं, लेकिन अब वह बड़ा हो रहा था और उसकी मांगें भी बढ़ती जा रही थीं – कभी महंगी साइकिल चाहिए होती, कभी नया वीडियो गेम, तो कभी बाजार में सबसे महंगी चॉकलेट।

क्रोध का परिणाम: क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है

शुरू-शुरू में उसके माता-पिता किसी तरह उसकी बातें मान लेते, लेकिन हर इच्छा पूरी करना उनके लिए आसान नहीं था। जब वे किसी चीज के लिए मना करते, तो कुणाल गुस्सा करने लगता।

अब वह आठवीं कक्षा में पहुंच चुका था। एक दिन स्कूल में उसने अपने सहपाठी रोहन के हाथ में नई स्मार्ट वॉच देखी। “वाह! कितनी सुंदर घड़ी है।” कुणाल बोला।

“हां, पापा ने मेरे जन्मदिन पर दी है।” रोहन मुस्कुराते हुए बोला।

कुणाल ने तुरंत कहा, “जरा मुझे पहनकर देखने दो।”

रोहन अपनी घड़ी को लेकर बहुत सावधान था। उसने विनम्रता से कहा, “माफ करना कुणाल, मैं किसी को अपनी घड़ी नहीं देता।” बस, इतना सुनते ही कुणाल का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसे लगा जैसे रोहन ने सबके सामने उसका अपमान कर दिया हो। वह चिल्लाने लगा, “तुम खुद को बहुत बड़ा समझते हो क्या?”

रोहन ने उसे शांत करने की कोशिश की, लेकिन कुणाल का गुस्सा बढ़ता गया। तभी उसने पास पड़ा एक छोटा पत्थर उठाया और रोहन की घड़ी पर दे मारा। घड़ी टूट गई। यह देखकर आसपास खड़े बच्चे डर गए। उसी समय पी.टी. शिक्षक वहां आ पहुंचे। उन्होंने सब देख लिया था। वह कुणाल को तुरंत प्रधानाचार्य के कमरे में ले गए।

प्रधानाचार्य ने गंभीर आवाज में कहा, “कुणाल, गुस्से में किया गया काम हमेशा नुकसान पहुंचाता है। तुम्हें अपनी गलती की सजा मिलेगी।”

उन्होंने कुणाल को एक सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया। घर पहुंचने पर भी कुणाल का गुस्सा शांत नहीं हुआ था। उसने पिता से वैसी ही स्मार्ट वॉच दिलाने की जिद पकड़ ली। पिता ने प्यार से समझाया, “बेटा, वह घड़ी बहुत महंगी है। अभी हम उसे नहीं खरीद सकते।”

लेकिन कुणाल ने उनकी बात सुनने के बजाय गुस्से में मेज पर रखी महत्वपूर्ण फाइल उठा ली और फाड़ डाली। उसमें पिता के ऑफिस के जरूरी कागजात और कई महीनों की मेहनत थी। यह देखकर पिता बहुत दुखी हो गए। उन्होंने पहली बार कठोर स्वर में कहा, “कुणाल, तुम्हारा गुस्सा तुम्हें गलत रास्ते पर ले जा रहा है।”

उस रात कुणाल की मां बहुत रोईं। उन्हें समझ आ गया कि केवल प्यार ही नहीं, बच्चों को सही संस्कार देना भी जरूरी होता है। अगले दिन पिता ने कुणाल को एक बोर्डिंग स्कूल भेजने का निर्णय लिया, जहां अनुशासन पर विशेष ध्यान दिया जाता था।

शुरुआत में कुणाल को वहां बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। अब उसे अपना बिस्तर खुद लगाना पड़ता, समय पर उठना पड़ता और अपने काम स्वयं करने पड़ते। वहां कोई उसकी जिद नहीं मानता था। धीरे-धीरे उसे अपनी गलतियों का एहसास होने लगा। उसे रोहन की टूटी घड़ी याद आती, पिता की फटी फाइल याद आती और मां की आंखों के आंसू भी।

एक दिन उसने अपने माता-पिता को पत्र लिखा, “मां-पापा, मुझे अपनी गलती समझ आ गई है। क्रोध में इंसान सही और गलत का फर्क भूल जाता है। मैं अब खुद को बदलना चाहता हूं। कृपया मुझे माफ कर दीजिए।”

पत्र पढ़कर उसके माता-पिता की आंखें नम हो गईं। उन्हें खुशी थी कि उनका बेटा अपनी गलती समझ चुका है।

कुछ महीनों बाद जब कुणाल छुट्टियों में घर लौटा, तो वह पहले जैसा जिद्दी लड़का नहीं था। अब वह विनम्र और शांत स्वभाव का हो गया था। उसने सबसे पहले रोहन से माफी मांगी और अपनी बचत से उसे नई घड़ी भी दिलाई।

तभी उसके पिता मुस्कुराकर बोले, “बेटा, गलती करना बुरा नहीं है, लेकिन अपनी गलती न मानना सबसे बड़ी भूल है।”

सच ही कहा गया है – क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। जो व्यक्ति अपने क्रोध पर विजय पा लेता है, वही सच्चा विजेता कहलाता है।

~ प्रिया देवांगन ‘प्रियू’

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