हृदय एक पेशीय, खोखला, संकुचनशील, मुट्ठी के आकार का अंग है। यह छाती की हड्डी के पीछे और फेफड़ों के मध्य कुछ बायीं ओर स्थित रहता है। यह शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो जन्म से मृत्यु तक 24 घंटे, दिन-रात, जीवन भर कार्य करता है। यह शरीर से अशुद्ध रक्त को प्राप्त करके फेफड़ों में शुद्ध करने के लिए भेजता है और फेफड़ों द्वारा शुद्ध रक्त को प्राप्त कर शरीर के अन्य अंगों तक पहुँचाने का कार्य करता है।
हृदय अपने कार्य को कोरोनरी धमनियों के द्वारा करता है। व्यक्ति की आयु जैसे-जैसे बढ़ती है, वैसे-वैसे शरीर की रक्त वाहिनियाँ संकरी व कठोर होने लगती हैं। इससे रक्त का प्रवाह प्रभावित होता है और हृदय पर अधिक दबाव पड़ता है, जिससे हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है। हृदय संबंधी रोग कई प्रकार के हो सकते हैं। जब वसा, कोलेस्ट्रॉल व अन्य पदार्थ धमनियों में जमकर उन्हें संकीर्ण और कठोर बना देते हैं, तो इसे आर्टेरियोस्क्लेरोसिस (Arteriosclerosis) कहा जाता है।
- मस्तिष्क में रक्त वाहिका का कमजोर होकर फूल जाना ब्रेन एन्यूरिज्म अथवा मस्तिष्क धमनी विकार कहलाता है।
- जब रक्त वाहिकाओं में जमा वसा का कोई टुकड़ा मस्तिष्क की रक्त वाहिका में पहुँच जाता है, तो इससे शरीर का आधा भाग रोगग्रस्त हो जाता है।
- यदि मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका, जो रक्त प्रवाह का दबाव सहन नहीं कर पाती, फट जाती है, तो उसे ब्रेन हेमरेज कहते हैं।
- यदि हृदय की कोरोनरी धमनियों में रक्त प्रवाह में अवरोध उत्पन्न हो जाता है, तो उसे कोरोनरी आर्टरी डिजीज कहा जाता है। इसके अतिरिक्त, हृदय के वाल्व में दोष होना या हृदय का आकार बढ़ जाना या हृदय की मांसपेशियों का कमजोर होना, हृदय की धड़कन को नियंत्रित करने वाले तंत्र (पेसमेकर) का ठीक से कार्य न करना आदि भी हृदय रोग के अंतर्गत आते हैं।हृदय संबंधी रोगों को हृदय रोग कहा जाता है। आधुनिक समय में इनमें से हृदय की कोरोनरी धमनियों में वसा का जमाव अधिक होने पर होने वाले हृदय रोग के आक्रमण का खतरा बढ़ रहा है। हृदय रोग के आक्रमण के अनेक कारण हो सकते हैं।
हृदय रोग के कारण:
- आयु : आयु बढ़ने के साथ-साथ रक्त वाहिनियों का संकुचन व कठोरता बढ़ती है। यह प्रक्रिया लगभग 15 वर्ष की आयु से ही प्रारंभ हो जाती है।
- लिंग : महिलाओं में रजोनिवृत्ति काल तक रक्त वाहिनियों में संकुचन व कठोरता कम होती है, परंतु पुरुषों में इसकी प्रवृत्ति अधिक होती है।
- वंशानुगत : यदि हृदय रोग माता-पिता को रहा है, तो संतानों में यह रोग होने की संभावना अधिक होती है।
- गरिष्ठ व वसायुक्त भोजन : जो व्यक्ति अधिक गरिष्ठ व वसा युक्त भोजन का सेवन करते हैं, उनके शरीर में हृदय रोग के आने की संभावना बढ़ जाती है।
- मधुमेह रोग : जो लोग मधुमेह के रोगी होते हैं, उनके शरीर में अतिरिक्त रूप से कोलेस्ट्रॉल अधिक बनता है, जिससे रक्त वाहिनियों में वसा की परत बढ़ने से इस रोग के आने के अवसर बढ़ जाते हैं।
- धूम्रपान : धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों में निकोटिन, कार्बन मोनोऑक्साइड जैसे जहरीले तत्व रक्त नलिकाओं की अंदरूनी दीवारों को क्षतिग्रस्त करके इस रोग को बढ़ावा देते हैं।
- इसके अतिरिक्त निष्क्रिय जीवन, उच्च रक्तचाप, मोटापा व तनाव के कारण भी रक्त नलिकाओं में काठिन्य व संकुचन का दोष तेजी से बढ़ने पर हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।
उपचार:
यदि आकस्मिक स्थिति हो तो रोगी को हृदय रोग विशेषज्ञ से अवश्य संपर्क कर लेना चाहिए। अन्यथा व्यक्ति अपनी दिनचर्या को स्वस्थ बनाकर, नियमित योगाभ्यास तथा भोजन को ठीक करके हृदय रोगों से अपना बचाव कर सकता है। हृदय रोगी को योगाभ्यास किसी योग्य शिक्षक के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए।
हृदय रोगी के लिए प्रभावकारी योगाभ्यास:
आसन:
आसनों के अभ्यास से कोरोनरी धमनियों व अन्य रक्त नलिकाओं में जमा वसा पिघलती है। रोगी को आसनों का अभ्यास करते समय कहीं भी श्वास न रोकें। आसनों का अभ्यास करते समय थकान अनुभव होने पर उसे तुरंत समाप्त कर दें।
शुरू में, उसके लिए ताड़ासन, हस्त उत्तानासन (Hasta Uttanasana), उत्तान मंडूकासन, भुजंगासन (Bhujangasana), शवासन (Shavasana) आदि आसनों का अभ्यास लाभकारी है।
प्राणायाम:
प्राणायाम के अभ्यास से रक्त का शोधन होता है तथा हृदय की मांसपेशियाँ सशक्त बनती हैं। हृदय रोगी को कहीं भी प्राणायाम के अभ्यास के दौरान कुम्भक (श्वास रोकना) नहीं करना चाहिए।
हृदय रोगी के लिए अनुलोम-विलोम प्राणायाम, उज्जायी प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम व गहरे लंबे श्वास लाभकारी हैं।
ध्यान एवं योग निद्रा:
प्रतिदिन दिन में दो बार 15–15 मिनट ध्यान व योग निद्रा का अभ्यास करने से तनाव कम होता है तथा मानसिक शांति मिलती है। इससे सुख और आनंद की अनुभूति करने वाली तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो इस रोग को ठीक करने में सहायक हैं। हृदय रोगी के लिए योग निद्रा का प्रतिदिन अभ्यास करना अत्यंत लाभकारी है।
सुपाच्य भोजन:
हल्का, सुपाच्य व सात्विक भोजन हृदय रोगी के लिए अनिवार्य है। भोजन में सलाद, अंकुरित अनाज, फल, हरी सब्जियाँ, दलिया आदि को उचित मात्रा में शामिल करना चाहिए। गरिष्ठ भोजन, तला हुआ भोजन व अधिक मसालेदार भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
अन्य सुझाव:
- धूम्रपान व मदिरा का सेवन न करें।
- प्रतिदिन सैर करें।
- तनाव से बचें।
- आत्म-चिंतन करके जीवन-शैली की त्रुटियों को ठीक करें।
- क्षमता के अनुसार कार्य करें।
- प्रसन्नचित्त रहें।
क्या आप जानते हैं?
हमारे शरीर के अंग हमारी अमूल्य संपदा हैं, जो दिन-रात चुपचाप हमारी सेवा में लगे रहते हैं। अब हृदय को ही लें — क्या आप जानते हैं कि यह छोटा-सा हृदय प्रतिदिन 1 लाख बार धड़कता है और एक जीवन में औसतन 250 करोड़ बार धड़क-धड़क कर प्रतिदिन 7.50 हजार लीटर रक्त लगभग 1 लाख किमी लंबी धमनियों में पहुँचाता है। पर हमने जीवन में कभी इसका आभार व्यक्त किया क्या!
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