इनाम: तार्किक सोच वाली हिंदी बाल-कहानी - गोविंद शर्मा

इनाम: तार्किक सोच वाली हिंदी बाल-कहानी – गोविंद शर्मा

इनाम: सेठ गंगा प्रसाद कलाकारों की बड़ी कद्र करते थे। उन्होंने अनेक कलाकारों की कलाकृतियां खरीदीं और उन्हें पुरस्कृत भी किया। वहन केवल स्वयं कलाकृतियों का संग्रह करते थे, दूसरों को भी कला का सम्मान करने की प्रेरणा देते रहते थे।

एक बार की बात है। एक कलाकार ने मिट्टी एवं रंगों की सहायता से मोतीचूर के लड्डू बनाए और सेठ गंगा प्रसाद को भेंट किए। लड्डू देखकर सेठ जी दंग रह गए। एकदम असली जैसे लग रहे थे। छूने पर ही पता चलता था कि वे नकली हैं। एक और कलाकार मिट्टी तथा रंगों के संयोजन से कटा हुआ तरबूज बनाकर लाया। वह भी बिल्कुल असली जैसा लग रहा था।

इनाम: तार्किक सोच वाली बाल-कहानी

सेठ जी ने एक प्रतियोगिता की घोषणा की। उन्होंने कहा, “रविवार को मेरे घर के आगे की चौकी पर एक प्लेट में असली लड्डू और एक में नकली लड्डू रखा होगा। एक में कटा हुआ असली तरबूज और एक में नकली तरबूज होगा। जो भी बिना छुए उनकी पहचान करलेगा, उसे लड्डू और तरबूज खाने को तो मिलेंगे ही, एक हजार रुपए इनाम के रूप में भी दिए जाएंगे।”

सेठजी के लड्डू और तरबूज देखने बहुत से लोग आए। सबने कलाकारों और उनकी कृतियों की भरपूर प्रशंसा की मगर कोई भी असली-नकली की पहचान नहीं कर सका।

एक छोटा लड़का अंबुज उनको बड़े ध्यान से देख रहा था। जब कोई भी पहचान नहीं सका तो सेठ जी ने कलाकृतियों को समेटने का आदेश दे दिया। उसी समय अंबुज सेठ जी के पास पहुंचा। उसे देखकर सेठ जी बोले, “जब बड़े-बड़े और पढ़े-लिखे स्त्री-पुरुष असली-नकली की पहचान नहीं कर सके तो तुम इतने छोटे होकर यह प्रतियोगिता कैसे जीत सकते हो?”

“सेठ जी मैं बता सकता हूं कि कौन-सा लड्डू और कौन-सा तरबूज असली है। यह कहते हुए अंबुज आगे आया। उसने असली लड्डू और असली तरबूज की प्लेटों पर हाथ लगा दिया। यह देखकर सेठ जी हैरान रह गए। अंबुज की पहचान एकदम सही थी।

सेठ जी ने कहा, “शाबाश बेटे, तुमने कमाल कर दिखाया। तुम अब इन्हें खा सकते हो। मैं अभी एक हजार रुपए मंगवाता हूं पर तुम यह तो बताओ कि असली-नकली की पहचान कैसे की?”

अंबुज ने कहा, “सेठ जी, मैं इन्हें नहीं खाऊंगा लेकिन यह जरूर बता देता हूं कि मैंने असली-नकली का पता कैसे लगाया। मैं इन्हें काफी देर से ध्यान से देख रहा था। मक्खियां बार-बार आ रही थीं और इस लड्डू पर बैठ रही थीं, कभी उस तरबूज पर बैठ रही थीं। इससे मैं समझ गया कि ये ही असली हैं।”

सेठ बोला, “वाह, यह हुई अक्ल की बात पर तुम इन्हें खाने से इंकार क्यों कर रहे हो। क्या तुम्हें लड्डू और तरबूज खाना पसंद नहीं है?”

“नहीं, यह बात नहीं है। लड्डू तो मेरी मनपसंद मिठाई है और तरबूज मुझे बहुत अच्छे लगते हैं पर मैं वे चीजें कभी नहीं खाता हूं जिन पर मक्खियां बैठती हैं। मैं बाजार से कभी कटे हुए फल नहीं खरीदता हूं। ऐसे हलवाइयों से भी मिठाई नहीं लेता जो उन्हें खुले में रखते हैं और जिन पर मक्खियां या मधुमक्खिया भिनभिनाती हैं।”

“अरे वाह, तुमने आज मुझे एक नया रास्ता दिखाया है। तुम्हारा इनाम मैं 1000 से बढ़ाकर 2000 रुपए कर रहा हूं। आज से मैं केवल कलाकृतियों को ही पुरस्कृत नहीं करूंगा बल्कि ढककर मिठाई रखने वाले दुकानदारों और मक्खियों से बचाकर सेहत के लिए सफाई के साथ फल बेचने वालों को भी इनाम देने की योजना चलाऊंगा।”

~ ‘इनाम‘ Hindi story by ‘गोविंद शर्मा

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