मेहनत से बनी 'पहचान': नाम कैसे कमाया जाता है - हिंदी बाल-कहानी

मेहनत से बनी ‘पहचान’: नाम कैसे कमाया जाता है – हिंदी बाल-कहानी

गंभीर बचपन से ही मन ही मन सोचता था कि अपनी पहचान बनाने के लिए क्या करना पड़ता है? प्रसिद्धि कैसे हासिल की जाती है? बहुत सारे लोग कैसे जानने लगते हैं? नाम कैसे कमाया जाता है? समाचारपत्रों में नाम तथा फोटो कैसे छपते हैं?

मेहनत से बनी ‘पहचान’

जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया वैसे-वैसे उसकी यह जानने की उत्सुकता बढ़ती गई। वह अपनी पुस्तकों को खोलते ही पाठ लिखने वाले लेखकों, उच्चाधिकारियों, वैज्ञानिकों, नेताओं, खिलाड़ियों तथा अपने जीवन में कुछ और विशेष करने वाले लोगों के बारे में पढ़कर अपने मन में सोचने लगता कि इन महान लोगों ने अपनी ऐसी पहचान कैसे बनाई होगी? कैसे पहुंचे होंगे वे इस मंजिल पर?

अब उसके मन में उठने वाले प्रश्न उसकी जुबान पर भी आने लगे। उसने अपने प्रश्नों का उत्तर ढूंढने के लिए अपने मम्मी-पापा तथा अपने अध्यापकों से प्रश्न करने शुरू कर दिए।

उसे अपने मम्मी-पापा तथा अध्यापकों से एक ही उत्तर मिलता कि मेहनत करने से किसी भी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई जा सकती है।

वह उनके इस उत्तर को सुनकर सोचने लगता कि वह मेहनत करके भी क्या करेगा, उसके घर का निर्वाह तो मुश्किल से होता है। अपने परिवार की गरीबी के कारण वह कुछ बनकर अपनी पहचान कैसे बनाएगा?

उनके विद्यालय के प्रधानाचार्य समय-समय पर अपने विद्यालय के बच्चों को प्रेरित करने के लिए आई.ए.एस, आई.पी.एस अधिकारियों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, खिलाड़ियों, उच्चाधिकारियों तथा किसी न किसी क्षेत्र में पहचान रखने वाले लोगों को अपने विद्यालय में बुलाते रहते थे।

मेहनत से बनी 'पहचान': नाम कैसे कमाया जाता है - हिंदी बाल-कहानी
मेहनत से बनी ‘पहचान’: नाम कैसे कमाया जाता है – हिंदी बाल-कहानी

उनकी उपलब्धियों के बारे में सुनकर गंभीर के मन में अपनी पहचान बनाने की उत्सुकता बढ़ जाती थी।

एक दिन उनके विद्यालय में जिले के डिप्टी कमिश्नर बच्चों को प्रेरित करने के लिए आए। गंभीर डिप्टी कमिश्नर की शानो-शौकत, उनकी गाड़ी, उनके साथ सुरक्षा कर्मी, पी.ए. देखकर बहुत प्रभावित हुआ।

डिप्टी कमिश्नर साहब ने बच्चों को प्रेरित करते हुए कहा, “आप परिश्रम और लगन से कुछ भी बन सकते हो। उन्होंने यह भी कहा कि आपकी लगन और मेहनत के आगे सभी रुकावटें अपने आप दूर हो जाती हैं।”

उन्होंने बच्चों को बताया, “छोटी आयु में ही पिता जी की मृत्यु तथा निर्धनता होने पर भी मेरे दृढ़ निश्चय, परिश्रम और लगन ने मुझे इस मंजिल पर पहुंचा दिया।”

डिप्टी कमिश्नर साहब के इन शब्दों ने गंभीर को उसके प्रश्नों का उत्तर दे दिया था। उसने उस दिन ही मन में निश्चय कर लिया कि वह अब अपनी मंजिल हासिल करके ही रहेगा।

वह मेहनत और लगन से पढ़ाई करता रहा। वह दसवीं कक्षा में सारे प्रांत में प्रथम रहा। उसकी मेहनत ने उसकी पहचान बना दी। प्रांत के मुख्यमंत्री ने उसे सम्मानित करते हुए कहा कि उसकी सारी पढ़ाई का खर्च प्रांत सरकार करेगी।

समाचारपत्रों में छपी उसकी फोटो ने उसे और भी उत्साहित किया। एक दिन वह भी यू.पी.एस.सी. की परीक्षा पास करके आई.ए.एस अधिकारी बन गया।

~ प्रिंसीपल विजय कुमार

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