एक दिन का पानी संकट: स्कूलों में पीने के पानी की कमी पर प्रेरणादायक हिंदी कहानी

एक दिन का पानी संकट: स्कूलों में पीने के पानी की कमी पर प्रेरणादायक हिंदी कहानी

एक दिन का पानी संकट: ग्रीष्म ऋतु चरम सीमा पर थी। गर्मी ने लोगों की नाक में दम कर रखा था। प्यास बुझाने के लिए पानी की जरूरत बार-बार पड़ रही थी।

धर्मेन्द्र नौवीं कक्षा का विद्यार्थी था। उसके विद्यालय में पीने के पानी का बहुत अच्छा प्रबंध था परंतु फिर भी बच्चों को घर से पीने के पानी की बड़ी बोतलें लाने के लिए कहा गया था ताकि बच्चों को पानी पीने के लिए क्लास से दूर न जाना पड़े।

एक दिन का पानी संकट: प्रिंसीपल विजय कुमार

परन्तु गर्मी अधिक पड़ने और बच्चों को अधिक प्यास लगने के कारण बच्चों की बोतलों का पानी शीघ्र ही समाप्त हो जाता और उन्हें पुनः बोतलों में पानी भरने के लिए पीने वाले पानी के स्थान पर जाना पड़ता था।

पीने वाले पानी के स्थान पर यह नोटिस लगाया गया था कि पानी की टोंटियों को खुला न छोड़ें। पानी की एक-एक बूंद बहुमूल्य है। पानी को व्यर्थ मत गंवाएं।

प्रातः की प्रार्थना सभा में भी विद्यालय के प्रधानाचार्य बच्चों को पानी को व्यर्थ न गंवाने की नसीहत देते रहते थे परन्तु फिर भी बच्चे पानी की टोंटियों को अक्सर खुला छोड़ देते। पानी पीते कम थे, व्यर्थ ज्यादा करते थे, बार-बार टोंटियों से पानी भरने चले रहते थे।

ग्रीष्म ऋतु में पानी की टंकी जल्दी खाली होने पर कई बार भरनी पड़ती थी। वैसे तो विद्यालय के बहुत से बच्चे बचाने पर ध्यान नहीं देते थे किन्तु धर्मेंद्र कुछ ज्यादा ही पानी व्यर्थ करता रहता था। वह हर बार पानी की टोंटियां खुली छोड़ देता था।

अध्यापक उसे बहुत बार समझा चुके थे परन्तु वह अध्यापकों की नसीहत पर कोई ध्यान नहीं देता था। जब भी कोई उसे पानी व्यर्थ न करने की बात कहता तो उसका एक ही जवाब होता, “धरती पर पानी की क्या कमी है, मेरे व्यर्थ करने से धरती पर कौन-सा पानी कम हो जाएगा!”

गर्मी से लोगों का दम निकल रहा था। विद्यालय में आधी छुट्टी खत्म हुई ही थी कि बच्चों की बोतलों में पानी खत्म हो चुका था। विद्यालय की सभी कक्षाओं में सूचना दी गई कि विद्यालय की पानी की टंकी खाली हो गई है। टंकी भरने वाली मोटर खराब हो गई है। पानी का प्रबंध करने में समय लग सकता है। पानी की टंकी खाली होने तथा मोटर खराब हो जाने की सूचना सुनकर बच्चों में घबराहट होने लगी थी। बच्चे प्यास से छटपटाने लगे और अध्यापक-अध्यापिकाओं से पानी पीने के लिए जाने के लिए कहने लगे लेकिन पानी तो वे तब लाते यदि टंकी में पानी होता। कई बच्चे अपने घर फोन करके पानी मंगवाने के लिए कह रहे थे।

कुछ विद्यालय की कैंटीन से पानी की बोतलें लाने के लिए कह रहे थे किन्तु एक घंटे के बाद सभी कक्षाओं में सूचना आ गई कि मोटर ठीक हो गई है और पानी की टंकी भर दी गई है। बच्चे अपनी पानी की बोतलें भर सकते हैं।

सभी बच्चों ने चैन की सांस ली और पानी से अपनी प्यास बुझाई। दूसरे दिन सुबह की प्रार्थना सभा में विद्यालय के प्रधानाचार्य ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा, “बच्चों, तुमने देख लिया कि पानी का हमारे जीवन में कितना महत्व है। एक दिन के पानी के संकट ने हमारे नाक में दम कर दिया जिस प्रकार धरती पर जनसंख्या बढ़ रही है भू-जल स्तर कम हो रहा है।”

“जल स्रोतों में भी पानी खत्म हो रहा है, उससे भविष्य में पानी का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है। इस धरती पर जब पानी ही नहीं होगा तो मनुष्य भी कैसे जीवित रह पाएगा।”

“इसलिए आप सबको पानी के एक दिन के संकट से सीख लेते हुए पानी बचाने के लिए अधिक से अधिक प्रयास करने चाहिएं।”

प्रधानाचार्य की बातों ने बच्चों को सोचने के लिए विवश कर दिया। सभी बच्चों ने मन ही मन पानी का सोच-समझ कर प्रयोग करने का फैसला लिया। धर्मेंद्र को भी अपनी भूल का एहसास हो गया था।

~ ‘एक दिन का पानी संकट‘ hindi story by ‘प्रिंसीपल विजय कुमार‘

Check Also

Dussehra Facebook Covers

Dussehra Facebook Covers: Vijayadashami Social Media Banners & Posters

Dussehra Facebook Covers: Dussehra, also known as Vijayadashami, is a major Indian festival celebrated on …