आज़ादी की उड़ान: एक गांव में दयाल नाम व्यक्ति रहता था। उसका नाम उसके स्वभाव से बिल्कुल उलट था। वह हर रोज आसपास के छोटे-छोटे बनों में जाता और वहां जाल फैलाकर दाना बिखेर देता। चुग्गा चुगने के लालच में पक्षी धीरे-धीरे जाल में फंसते जाते। कुछ दूर वृक्ष की छाया के तले बैठा दयाल मंद-मंद मुस्कुरा रहा होता। जाल में फंसे हुए पक्षियों को वह बाजार में जाकर बेच देता।
दयाल का एक लड़का था, शक्ति। शक्ति का मन पढ़ने को लालायित था लेकिन दयाल ने उसे छोटी आयु से ही स्कूल से हटा लिया। वह उसे भी अपने साथ वनों में ले जाने लगा। शक्ति का मन नहीं करता था कि वह अपने पिताजी की तरह मासूम पक्षियों को जाल में फंसाकर बाजार में जाकर बेचे लेकिन मजबूरी वश उसे अपने पिताजी का कहना मानना पड़ रहा था।
आज़ादी की उड़ान: डा. दर्शन सिंह ‘आशट’
वह अब बड़ा हो गया था। एक दिन शक्ति के पिताजी उससे बोले, “बेटा, तुम आज अकेले ही पक्षी पकड़ने के लिए जाओ। मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है।”
शक्ति क्या करता? उसने जाल उठाया और बन में चला गया। वहां उसने कुछ दाने बिखेरे और कुछ दूरी पर एक वृक्ष के नीचे बैठ गया।
जाल में एक मासूम तोती के दो बच्चे फंस गए। तोती परेशान होकर जाल के उपर मंडराती हुई अपने बच्चों को आजाद करवाने का प्रयास करने लगी। यह दृश्य देखकर शक्ति का मन परेशान और उदास हो गया। फिर पता नहीं उसके मन में क्या आई, उसने एक-एक करके जाल के सभी पक्षियों को मुक्त कर दिया।
शक्ति जब शाम को खाली जाल लेकर घर लौटा उसके पिताजी के तेवर बिगड़ गए, “यह क्या? खाली जाल?”
शक्ति बोला, “पिताजी, मैं मासूम पक्षियों को गुलाम बनाकर नहीं बेच सकता। उन्हें भी हमारी तरह आजादी चाहिए।”
दयाल एकदम सकते में आ गया, “क्या बकते हो? तुम मुझे समझाओगे कि आजादी क्या होती है और गुलामी क्या? यह काम नहीं करोगे तो खाओगे कहां से? हमारे पूर्वज यही काम करते आए है।”
शक्ति बोला, “लेकिन पिताजी, हमसे निर्धन लोग भी तो दूसरे काम करके अपना निर्वाह कर रहे हैं। फिर हमें दूसरे जीवों की जिंदगी से खेलने का क्या हक है? पिताजी सच बताऊं, आज जब एक तोती के दो मासूम बच्चे मेरे जाल में फंसे, मुझसे उनकी मां की हालत देखी नहीं गई। बच्चों और उनकी मां की चीखें सुनकर मेरी आंखों में पानी आ गया था।”
दयाल फिर चीखा, “तुम कायर हो, कमजोर मन वाले हो। पक्षियों को बेच कर हमें अच्छी आमदनी होती है। कोई दूसरा काम करके तुम घर का निर्वाह कर सकते हो क्या? बोलो?”
शक्ति धैर्य से बोला, “पिताजी, मेरे दोस्त हरपाल के पिताजी एक बढ़ई हैं। मैं उनसे खिलौने बनाने का काम सीख सकता हूं। आजकल मेले भी लग रहे हैं। में वहां जाकर खिलौने बेचकर पैसे कमा सकता हूं। पिताजी, मुझे विश्वास है कि आप पक्षियों को बेचकर जितने पैसे कमाते हैं, मैं उतने इस काम से कमा सकता हूं।”
दयाल एकदम बोला, “अच्छा? ऐसा है तो मुझे तेरी यह चुनौती भी स्वीकार है। देखता हूं, खिलौने बेचकर कितनी कमाई कर लेगा?”
शक्ति अपने दोस्त हरपाल से मिला और अपने मन की व्यथा कही। हरपाल के पिताजी ने शक्ति का दृढ़ निश्चय देखा। बह अलग- अलग किस्म में खिलौने तैयार करने लगा। शक्ति उनके पास बैठा हाथ बंटाता और सीखता रहता।
शक्ति लकड़ी के रंग-बिरंगे खिलौनों को एक बोरी में भरता और अपनी साईकिल पर लादकर बाजार में किसी उचित जगह पर जा बैठता। शाम तक उसके काफी खिलौने बिक जाते। एक शाम को दयाल बन से काफी पक्षी पकड़ कर लाया। कुछ समय के बाद शक्ति भी घर आया। वह पिछले तीन दिनों से मेले में जाकर खिलौने बेचता रहा था। हरपाल के पिताजी ने उसे तीन हजार रुपए दे दिए।
“पिताजी, लीजिए।” शक्ति ने पिताजी के हाथ पर तीन हजार रुपए रख दिए। दयाल अपने बेटे की तरफ देखता रहा।
दयाल उसे बगल में लेकर बोला, “बेटा, तुमने अपनी मेहनत और पसीने की कमाई से मेरी आंखें खोल दी हैं। तुम सच कहते थेकि किसी मासूम जीव को गुलाम बनाकर बेचने के अलावा किसी और ढंग से भी तो निर्वाह किया जा सकता है। अब मैं भी इस बारे सोचूंगा। बेटा, कई बार पिता भी गलत हो सकते हैं। क्या तुम मुझें माफ नहीं करोगे?

शक्ति पिताजी का हाथ पकड़ कर बोला, “पिताजी, क्यों शर्मिंदा कर रहे हो?” दयाल सभी पक्षियों को छत पर ले गया और शक्ति से बोला, “बेटा, अपने हाथों से इन्हें आजाद कर दो।”
शक्ति खुशी-खुशी पिंजरों में बंद पक्षियों को आजाद करने लगा। पीछे खड़े उसके माता-पिता जी मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
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