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होगा तभी दशहरा (विजय दशमी) - प्रकाश मनु

Dussehra Special Hindi Poem होगा तभी दशहरा (विजय दशमी)

किस्सा एक पुराना बच्चों, लंका में था रावण,
राजा एक महा-अभिमानी, काँपता जिससे कण-कण।

उस अभिमानी रावण ने था, सबको खूब सताया,
रामचन्द्र जब आये वन में, सीता को हर लाया।

झिलमिल झिलमिल सोने की, लंका पैरो पे झुकती,
और काल की गति भी भाई, उसके आगे रूकती।

सुन्दर थी लंका, लंका में सोना ही सोना था,
लेकिन पुण्य नहीं पापों का।

भरा हुआ दोना था, तभी राम आये बन्दर भालू की सेना लेकर,
साध निशाना सच्चाई का, तीर चलाया पैना।

लोभ पाप की लंका धूं – धूं जल कर राख हो गई,
दिए जले थे तब धरती पर, अनगिनत लाखों लाख।

इसलिए तो आज धूम है, रावण आज मरा था,
खाते शीश दस बारी – बारी, उतरा भार धरा का।

लेकिन सोचो, कोई रावण फिर छल ना  कर पाये,
कोई अभिमानी न फिर से काला राज चलाये।

तब होगी सच्ची दीवाली, होगा तभी दशहरा,
जगमग – जगमग होगा तब, फिर सच्चाई का चेहरा।

∼ प्रकाश मनु

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