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प्रतिशोध - नारी उत्पीड़न की कहानी

प्रतिशोध – नारी उत्पीड़न की कहानी

दूर से आती आवाज़ को कभी गौर से सुनना नहीं पड़ा और जो सामने था उसकी स्पष्ट आवाज़ कभी कानों में आई नहीं। क्या, क्यों और कैसे शब्दों का कोई अर्थ नहीं रह गया था। किसी शान्त नदी के किनारे या उफ़नते समुद्र के ज्वर भाटे उसे एक सा ही सुकून देते थे। उसे खुद भी नहीं पता होता कि उसकी पहचान क्या थी और अपने अस्तित्व की खोज तो उसने जैसे दनिया को जानने और समझने के साथ ही शुरू कर दी थी। पर दुनिया वालों ने उसे एक नाम दे दिया था “गौरी”।

नाते रिश्तेदारों के नाम पर घर में एक बूढ़े काका थे जो उसके लिए तो सब कुछ थे पर वो उनके लिए कुछ नहीं। सुबह से गाय – भैसों की सानी तैयार करने के साथ ही उसके पैरों में भी मानो विधाता ने चक्कर बाँध दिए थे। शायद उसे बचपन से ही जानवरों के बीच में रखते हुए काका ने भी अपनी ही एक गाय के नाम पर बिना कोई माथा पच्ची करे उसका पड़ोसियों के चीखने चिल्लाने पर नाम रख ही दिया था और कभी उसे फिर इंसान की श्रेणी में नहीं रखा।

जैसा कि आम तौर पर होता हैं कि हमेशा अपनी थाली से ज्यादा घी पड़ोसी की थाली में दिखाई देता हैं वैसे ही अपने घर की बातों को ढकने की कोशिश और दूसरे के जीवन की बखिया उधेड़ने में जो परम आनंद कुछ लोगो को आता हैं वो शायद सारे संसार की दौलत पाकर भी नहीं आ सकता। गाँव की चौपाल से लेकर बरगद के पेड़ के नीचे हुक्का गुडगुडाते लोग जिनकी उम्र हरी नाम भजने की थी वो गौरी की ही चर्चा करते रहते। अब अगर और किसी की बहु बेटी बारे में इतना रस लेकर चर्चा करते तो कान के नीचे झन्नाटेदार झापड़ खाना पड़ता पर उस बेचारी का तो इस भरे पूरे संसार में ऐसा कोई न था जो उसकी ढाल बनकर आगे आता। प्रत्यक्ष में सभी उससे सहानभूति रखते और उसके दिन रात जानवरों की तरह काम करने पर अफ़सोस जताते पर हर आदमी जानता था कि ये दुःख काका के पास मुफ्त की नौकरानी पाने का हैं जो इन बदनसीबों के हिस्सों में नहीं आया।

घर से पत्नी की गाली खाकर पीठ झुकाकर निकलते और सड़क पर आते ही शेर बनने का स्वांग रचने में तो ये सभी महानुभव इतने माहिर हो गए थे रंगमंच के कलाकार भी इनके आगे पानी भरते नज़र आते। उधर वो दुबली पतली गौरी को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं था। अगर कभी कोई औरत आते – जाते उस पर ताना मारती या कटाक्ष भी करती तो वो अनसुना करके आगे बढ़ जाती थी। क्योंकि वो जानती थी कि सभी के मन में उसके और उसके माता पिता के बारे में जानने की उत्सुकता रहती थी और बचपन से ही उसके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। नंगी पीठ लिए झोपड़ी के बाहर ठेले पर सोने से ही उसके बचपन की शुरुआत उसे याद हैं। जब उसके कानों में पड़ता कि कोई नन्ही बच्ची गुड़िया के लिए मचली और उसने रो रोकर सारा घर सर पे उठा लिया और हारकर उसकी माँ को दो कोस दूर जाकर गुड़िया लाकर बच्ची को देना ही पड़ी तभी उसने खाना खाया तो वो घंटो बकरी चराते हुए सोचती कि क्या होती हैं “जिद”। शायद जिद प्यार से ही पैदा हुई होगी या प्यार ही जिद के माता पिता होंगे क्योंकि अगर कभी उसका मन सड़क पर बिकती गुड की ढेली खाने का किया तो बदले में उसे काका की लाठी ही मिली और फिर वो भूसे के कमरे के अँधेरे कोने में अपनी गन्दी फटी फ्राक से आँसूं पोंछते हुए फूट फूट कर रोती रहती। जब सड़कों पर वो निकलती थी तो गली मोहल्ले के सारे बच्चे उसे गन्दी परकटी कहकर चिढ़ाते थे क्योंकि उसके बाल हमेशा काका ही जैसे तैसे काट देते थे और सड़क के कूड़ेदान से पड़ी हुई गन्दी फटी फ्राक उसके लिए ले आते थे।

जब कभी उसका मन काका से दूर कही भाग जाने का होता तो सड़क के किनारे पर बना शिव जी के मंदिर के बाहर भीख मांगता अँधा धनिया, जो उसका ही हम उम्र था याद आ जाता। धनिया के पास आँखें नहीं थी पर दुनिया उसने आँख वालों से भी बेहतर तरीके से देख ली थी। धनिया अँधा होने के साथ गरीब भी था और ये समाज की नज़रों में सबसे बड़ा अभिशाप था। जहाँ जान पहचान भी जात, नौकरी और खेती बाड़ी भी पूछ के ही की जाती हो वहाँ पर कौन उस बेसहारा बच्चे से बात करता। मगर गौरी के आँसूं केवल अँधा धनिया ही देख पाता और पोंछ पाता। गौरी बचपन से ही जान गई थी कि शिवलिंग के अलावा अगर उसे किसी के आगे रोना हैं तो वो केवल धनिया ही हैं जो हमेशा उसे समझाता कि कैसे काम ना करने पर उसकी सौतेली माँ ने गरम चिमटे से उसकी आँखे फोड़कर उसे घर से बाहर निकाल दिया था और गौरी यह सुनकर सिहर जाती। जब वह धनिया का दुःख सुनती तो उसे अपना दुःख कम महसूस होता और वो यहाँ वहाँ से जैसा भी संभव हो पाता उसके लिए रोटी का प्रबंध कर देती। कब वो जवान हो गई ये भी उसे पता नहीं चल पाया। बचपन का दुःख उसके साथ ही बड़ा हो गया और आँसूं और ज्यादा बहने के अभ्यस्त हो गए। इन दो बातों के अलावा उसे कभी कुछ समझ में नहीं आया कि जवानी किसे कहते हैं और बचपन कैसे बीतता हैं।

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