तीन ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग

तीन ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग

प्रेरक प्रसंग २ –  माँ की सीख

ईश्वरचंद विद्यासागर के बचपन की यह एक सच्ची घटना है। एक सवेरे उनके घर के द्वार पर एक भिखारी आया। उसको हाथ फैलाये देख उनके मन में करुणा उमड़ी। वे तुरंत घर के अंदर गए और उन्होंने अपनी माँ से कहा कि वे उस भिखारी को कुछ दे दें। माँ के पास उस समय कुछ भी नहीं था सिवाय उनके कंगन के। उन्होंने अपना कंगन उतारकर ईश्वरचंद विद्यासागर के हाथ में रख दिया और कहा-” जिस दिन तुम बड़े हो जाओगे, उस दिन मेरे लिए दूसरा बनवा देना अभी इसे बेचकर जरूरतमंदों की सहायता कर दो।”

बड़े होने पर ईश्वरचंद विद्यासागर ने अपनी पहली कमाई से अपनी माँ के लिए सोने के कंगन बनवाकर ले गए और उन्होंने माँ से कहा- माँ! आज मैंने बचपन का तुम्हारा कर्ज उतार दिया । उनकी माँ ने कहा- “बेटे! मेरा कर्ज तो उस दिन उतर पायेगा, जिस दिन किसी और जरूरतमंद के लिए मुझे ये कंगन दोबारा नहीं उतारने होंगे। “

माँ की सीख ईश्वरचंद विद्यासागर के दिल को छू गयीं और उन्होंने प्रण किया कि वे अपना जीवन गरीब-दुखियों की सेवा करने और उनके कष्ट हरने में व्यतीत करेंगे और उन्होंने अपना सारा जीवन ऐसा ही किया।

महापुरूषों के जीवन कभी भी एक दिन में तैयार नहीं होते। अपना व्यक्तित्व गढ़ने के लिए वे कई कष्ट और कठिनाइयों के दौर से गुजरते हैं और हर महापुरूष का जीवन कहीं न कहीं अपनी माँ की शिक्षाओं से बहुत प्रभावित रहता है।

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