मुझे जंडियालागुरु जाना था। जब बस स्टैंड पहुंचा तो पता चला कि बस कर्मचारियों की हड़ताल चल रही है। लगभग सवा घंटा इंतजार करने के बाद भी हड़ताल खत्म होने के कोई आसार नहीं दिखे। मजबूर होकर मैं बस स्टैंड से बाहर आ गया।
बाहर एक टैक्सी चालक आवाज लगा रहा था, “जिसने अमृतसर जाना हो, आ जाइए।”
मैं उसके पास गया और कहा, “मुझे जंडियालागुरु जाना है।” उसने किराया बताया। मुझे ठीक लगा, इसलिए मैं गाड़ी में बैठ गया। रास्ते में मुझे फोन आया। पता चला कि मुझे जंडियालागुरु नहीं, उससे लगभग पांच-सात किलोमीटर आगे मानावाला जाना है।
जैसे ही टैक्सी जंडियालागुरु पहुंची, चालक बोला, “भाई साहब, उतर जाइए। आपकी मंजिल आ गई।”
सोच का अंतर: उदय चंद्र लुदरा
मैंने कहा, “भाई साहब, आप तो अमृतसर जा ही रहे हैं। मानावाला तो रास्ते में ही पड़ेगा। मुझे वहीं उतार दीजिए।”
वह तुरंत बोला, “किराया तो जंडियालागुरु तक का तय हुआ था। आगे जाना है तो अलग किराया लगेगा।”
उसकी बात सुनकर मैं कुछ क्षण चुप रह गया। बात केवल पांच-सात किलोमीटर की नहीं थी, सोच की थी। मुझे मजबूर होकर वहीं उतरना पड़ा।
उसी समय बरसों पुरानी एक घटना याद आ गई। मुझे गुरदासपुर में अपने एक मित्र से मिलने जाना था, जो गांव के स्कूल में अध्यापक थे। बस अड्डे से उनके गांव तक तांगे से जाना पड़ता था।
मैं तांगे में बैठा तो तांगे वाले ने पूछा, “बाबूजी, गांव में किसके घर जाना है?”
जब मैंने अपने मित्र का नाम बताया तो उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
“अच्छा, आप मास्टर जी के घर जा रहे हैं! मैं भी उन्हीं से पढ़ा हूं। घर की गरीबी के कारण चौथी कक्षा से आगे पढ़ नहीं सका, लेकिन मास्टर जी का बड़ा उपकार है मुझ पर।”
कुछ ही देर में हम मेरे मित्र के घर पहुंच गए।
मैंने जेब से पैसे निकालते हुए पूछा, “भाई, कितना किराया हुआ?”
वह मुस्कुराकर बोला, “बाबूजी, आप हमारे गांव के मेहमान हैं। मेहमानों से भी कहीं किराया लिया जाता है? हां, यह जरूर बता दीजिए कि वापस कब जाना है।”
मैंने कहा, “शाम को लौटूंगा।”
वह बोला, “तो मैं यहीं मिलूंगा। चाहे एक सवारी कम बैठा लूंगा, लेकिन आपको बस अड्डे तक छोड़कर आऊंगा। और किराए की बात फिर मत कीजिए।”
उसकी बात सुनकर मैं भावुक हो गया।
तांगे वाले की आमदनी बहुत अधिक नहीं थी। फिर भी उसके भीतर अपनापन था, सम्मान था और रिश्तों की गर्माहट थी। आज साधन बढ़ गए हैं, लेकिन संवेदनाएं छोटी होती जा रही हैं।
एक समय था, जब गांव में किसी का दामाद आता था तो लोग यह नहीं कहते थे कि वह फलां व्यक्ति का दामाद है। वे गर्व से कहते थे, “यह पूरे गांव का दामाद है।”
शायद इसी भावना ने हमारे समाज को सदियों तक जोड़े रखा। आज जरूरत इस बात की है कि हम केवल पैसों के रिश्ते न बनाएं, बल्कि इंसानों से इंसानियत का रिश्ता जोड़ें। लाभ कमाना गलत नहीं, लेकिन संवेदनाएं खो देना निश्चित ही घाटे का सौदा है।
आइए, हम यह संकल्प लें कि केवल ‘पैसे का पुत्र’ नहीं, बल्कि ‘इंसानियत का पुत्र’ बनेंगे। दूसरों की मजबूरी को अवसर नहीं, बल्कि सहायता का अवसर समझेंगे।
‘अपनी मिट्टी पर चलने का सलीका सीखो, किसी के संगमरमर पर चलोगे तो फिसल जाओगे।’
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