गिल्ली-डंडा: बच्चों ने खेलते खेलते पकड़वाया खतरनाक आतंकवादी

गिल्ली-डंडा: बच्चों ने खेलते खेलते पकड़वाया खतरनाक आतंकवादी

लाली एक बड़ी ही नटखट लड़की थी। उसे लाल कपड़े पहनना बहुत पसंद था, इसलिए सभी उसे लाली कहकर बुलाते थे। उसके आस-पड़ोस में मंजित, सोनक, छुटकी और जयदीप भी रहते थे। वे सभी साथ-साथ खेलते और हमेशा एक-दूसरे का साथ निभाते थे।

गिल्ली-डंडा: गोविंद भारद्वाज

एक दिन लाली हिंदी का पाठ पढ़ रही थी। पाठ का नाम था ‘हमारे पारंपरिक खेल‘। पाठ पढ़ते समय उसके मन में विचार आया कि बच्चे अब पुराने और उपयोगी खेलों को भूलते जा रहे हैं। वह मन ही मन बुदबुदाई कि अब वह देश के पुराने खेल ही खेला करेगी।

शाम को जब उसके दोस्त घर आए तो उसने कहा, “देखो भाई, अब हम क्रिकेट, फुटबॉल और वीडियो गेम जैसे खेल नहीं खेलेंगे।” यह सुनकर मंजित ने हैरानी से पूछा, “ये क्या लाली, खेलना कोई बुरी बात थोड़ी है?” लाली ने जवाब दिया, “अरे, मैं तो सिर्फ महँगे और विदेशी खेल बंद करने की बात कर रही हूँ।”

छुटकी बोली, “दीदी, ये तो सब लोग खेलते हैं, लेकिन तुम कौन-सा खेल खेलना चाहती हो?” लाली ने मुस्कराकर कहा, “जो खेल हमारे बड़े-बुज़ुर्ग खेलते थे, जैसे खो-खो, कबड्डी, गिल्ली-डंडा, आइस-पाइस और लट्टू।”

जयदीप बोला, “गिल्ली-डंडा… यह खेल बड़ा मज़ेदार है। मैंने इसके बारे में एक कहानी में पढ़ा है।” यह सुनकर लाली उन सभी को साथ लेकर अपने पापा के दोस्त की कारपेंटर की दुकान पर गई और उनसे गिल्ली-डंडा बनाने को कहा।

कुछ देर बाद जयदीप ने बताया कि गिल्ली-डंडा मिल तो गया है, लेकिन खेलने की जगह चाहिए। तब सभी बच्चे मोहल्ले के पास खुली जगह में खेलने चले गए। खेल शुरू हुआ और लाली ने सबको इसके नियम भी समझाए। उसने सबके सामने खड़े होकर गिल्ली की तीखी नोक पर ज़ोरदार डंडा मारा। गिल्ली उछलकर इतनी दूर जा गिरी कि किसी को दिखाई नहीं दी। सभी बच्चे उसे ढूँढने लगे।

सोनक गिल्ली को ढूँढते-ढूँढते एक बेकरी के पीछे चला गया। उसी दौरान उसे कुछ अजीब-सी हलचल दिखाई दी। पीछे एक आदमी ज़मीन में कुछ छुपा रहा था। सोनक ने पहले तो ध्यान से सब देखा और फिर वापस आ गया।

“मिला क्या?” छुटकी ने पूछा। सोनक गंभीरता से बोला, “गिल्ली तो नहीं मिली, लेकिन जासूस बनने का मौका ज़रूर मिल गया।” उसने दोस्तों को उस संदिग्ध व्यक्ति के बारे में बताया।

लाली बोली, “चलो अपने मोहल्ले वालों को बताते हैं।” सोनक बोला, “नहीं, सीधे पुलिस स्टेशन चलते हैं।” जयदीप ने पूछा, “वहाँ हम बच्चों की बात कौन सुनेगा?” सोनक ने जवाब दिया, “सुनेंगे मेरे दोस्त… वहाँ मेरे दूर के रिश्ते के चाचा हैं, और वह भी थानेदार हैं।”

सभी बच्चे पुलिस स्टेशन पहुँचे। वहाँ उन्हें इंस्पेक्टर चाचा मिल गए। सोनक ने उन्हें आने का कारण विस्तार से बताया। इंस्पेक्टर चाचा अपनी टीम के साथ जीप में बैठकर बच्चों को लेकर उस बेकरी की ओर रवाना हो गए।

सोनक ने वह जगह बताई जहाँ वह आदमी कुछ छुपा रहा था। पुलिस को वहाँ ज़मीन खुदी हुई दिखाई दी। जब खुदाई की गई तो गड्ढे के अंदर से ऐसा सामान निकला, जिसे देखकर सभी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

इंस्पेक्टर ने बताया कि वह व्यक्ति एक खतरनाक आतंकवादी था, जिसने बम बनाने की सामग्री वहाँ छुपा रखी थी। बच्चों की सूझ-बूझ और समझदारी के कारण वह आतंकवादी पकड़ा गया और एक बड़ी अनहोनी टल गई।

इंस्पेक्टर चाचा ने बच्चों से कहा कि अब वे घर लौट जाएँ और किसी को इस घटना के बारे में कुछ न बताएँ, क्योंकि अभी बहुत-सी औपचारिकताएँ बाकी थीं। सभी बच्चों ने एक साथ कहा, “ठीक है अंकल”।

छुटकी बोली, “हमारी गिल्ली तो मिली ही नहीं।” इस पर इंस्पेक्टर चाचा मुस्कराए और बोले, “लाओ बेटा, तुम्हें सबके लिए नए गिल्ली-डंडे दिलवाता हूँ।” यह सुनकर सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े।

~ गोविंद भारद्वाज, अजमेर

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