ह्र्दय परिवर्तन

ह्र्दय परिवर्तन

एक महात्मा थे। उन्होंने गेरुआ वस्त्र तो नही पहन रखा था परन्तु उनका मन अंतब्रह्मा शांति से परिपूर्ण था। अपने उधोग-धंधे के सिलसिले में रोज लोकल ट्रेन से लम्बी यात्राएं करते थे। उन दिनों ट्रेन में आज के जितनी भीड़-भाड़ नही रहती थी, फिर भी काफी चहल-पहल रहती थी मन ही मन वह सज्जन अपना जप, ध्यान इत्यादि करते थे। कई बार उस ट्रेन में चार-पांच शरारती बच्चे चढ़ते और खूब उत्पात मचाते थे। किसी को भी छेड़ देना, किसी का भी अपमान करना और सभी को परेशान करना उनका शुगल था।

वे युवक सदा महात्मा के सामने वाली सीट पर बैठते। कई बार वे अपशब्दों का प्रयोग भी करते थे। परन्तु महात्मा इन सब बातों से अविचल अपना शांत स्वभाव बनाए रखते थे। वह प्रभु से मन में प्रार्थना करते कि ये युवक सुधर जाए। जितनी ऊर्जा ताकत ये मौज-मस्ती में खर्च करते है उतनी यदि अच्छे कार्यो में लगाए तो इनके साथ-साथ समाज का भी भला होगा। महात्मा का दुर्गासप्तशती पर पूर्ण विश्वास था। वह जब गाडी में बैठते तो ‘या देवी सर्व भूतेषु..।‘ इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक अविरल जप करते थे। वह मन ही मन कहते की मां इस युवको को शांति दो और मुझे सबूरी दो जिससे मै और भी सहनशील हो सकू।

एक बार युवकों ने मधपान की अवस्था में ट्रेन में बहुत उत्पात मचाया और महात्मा को भी काफी परेशान किया। उन दिनों नवरात्रि का समय था। शाम को घर पहुंच कर युवको ने पुनः मधपान किया और सो गए। तब चारो युवको को सपने में महात्मा के दर्शन हुए। वह देवी से प्रार्थना कर रहे थे। देवी ने प्रसत्र होकर कहा की तुम जो भी मांगोगे वही वरदान मैं तुम्हे दूंगी। यदि तुम्हे कोई परेशान करता है और तुम उसको भस्म करने का वरदान मांगो तो वे कल तुरंत भस्म हो जाएंगे। चारो युवको को अपना नाम सुनाई दिया तो वे घबराकर नींद से जाग गए। आपस में एक-दूसरे को पूछने पर ज्ञात हुआ कि सभी को एक जैसा ही सपना आया था।

अगले दिन चारों युवको ने उस महात्मा के पास जाकर उनके चरण छूकर क्षमा की प्रार्थना की। युवकों ने कहा की हमनें आपको कितना सताया पर अपने सब कुछ शांत चिंत से सहन किया। हम आपके शिष्य बनना चाहते हैं। हमें कल रात एक सपना आया था। महात्मा के पूछने पर उन्होंने कहा की हम हाथ जोड़ते है, आप हमें शाप देकर भस्म नहीं करना। हम तो आपकी चरण धूलि के बराबर है।

तब महात्मा ने पूछा कि अपने सपने में क्या देखा? तब उनमे से एक कहने लगा की हमनें आपको मातेश्वरी से यह प्रार्थना करते देखा कि हे मातेश्वरी, देवी आप शान्त रूप से इन युवको का मन बदल दो। महात्मा सिर्फ मुस्कुरा दिए। उन्होंने कुछ कहा नही, उपदेश भी नहीं दिया, डांटा तक नही। सिर्फ उन्होंने अपने अंदर सहनशीलता और सदभाव बनाए रखा। जिन्होंने भी यह दृश्य देखा वे महात्मा के साथ बैठ कर भजन करने लगे।

शिक्षा: एक सज्जन परुष भी यदि हमारे बीच रहेंगे तो उनके कंपन हमारे अंदर आएंगे और हम भी सज्जन बन जाएंगे।

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