कुँआरी मुट्ठी: कन्हैया लाल सेठिया वीर रस कविता

कुँआरी मुट्ठी: कन्हैया लाल सेठिया वीर रस कविता

War has an important role in Nation building. A nation that has not experienced war becomes weaker. War ensures peace. This is the perspective on war provided by the well-known poet Kanhaiyalal Sethia.

कुँआरी मुट्ठी: कन्हैया लाल सेठिया

युद्ध नहीं है नाश मात्र ही
युद्ध स्वयं निर्माता है,
लड़ा न जिस ने युद्ध राष्ट्र वह
कच्चा ही रह जाता है,
नहीं तिलक के योग्य शीश वह
जिस पर हुआ प्रहार नहीं,
रही कुँआरी मुट्ठी वह जो
पकड़ सकी तलवार नहीं,

हुए न शर्तशत घाव देह पर
तो फिर कैसा साँगा है,
माँ का दूध लजाया उसने
केवल मिट्टी राँगा है,
राष्ट्र वही चमका है जिसने
रण का आतप झेला है,
लिये हाथ में शीश, समर में
जो मस्ती से खेला है,

उन के ही आदर्श बचे हैं
पूछ हुई विश्वासों की,
धरा दबी केतन छू आये
ऊँचाई आकाशों की,
ढालों भालों वाले घर ही
गौतम जनमा करते हैं,
दीर्नहीन कायर क्लीवों में
कब अवतार उतरते हैंऋ
नहीं हार कर किन्तु विजय के
बाद अशोक बदलते हैं

निर्दयता के कड़े ठूँठ से
करुणा के फल फलते हैं,
बल पौरुष के बिना शान्ति का
नारा केवल सपना है,
शान्ति वही रख सकते जिनके
कफन साथ में अपना है,
उठो. न मूंदो कान आज तो
नग्न यथार्थ पुकार रहा,
अपने तीखे बाण टटोलो
बैरी धनु टंकार रहा।

कन्हैया लाल सेठिया

महाकवि श्री कन्हैयालाल सेठिया राजस्थानी भाषा के प्रसिद्ध कवि है। उनका जन्म राजस्थान के चूरु जिले के सुजानगढ़ शहर में हुआ। उनकी कुछ कृतियाँ है: रमणियां रा सोरठा, गळगचिया, मींझर, कूंकंऊ, लीलटांस, धर कूंचा धर मंजळां, मायड़ रो हेलो, सबद, सतवाणी, अघरीकाळ, दीठ, क क्को कोड रो, लीकलकोळिया एवं हेमाणी। आपको २००४ में पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा १९८८ में ज्ञानपीठ के मूर्तिदेवी साहित्य पुरास्कार से भी सम्मानित किया गया है। बचपन में जब से आँखें खोलीं एक गीत कानों में अक्सर सुनाई देता था। ई तो सुरगा नै सरमावै, ई पै देव रमन नै आवे ………. धरती धोराँ री। ७वीं कक्षा में आया तो एक कविता कोर्स में पढी। ‘अरे घास री रोटी ही जद बन बिलावडो ले भाग्यो ………।

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