जीवन का दाँव – राजेंद्र त्रिपाठी

भाग दौड़ रातों दिन
थमें नहीं पाँव।
दुविधा में हार रहे
जीवन का दाँव।

हर यात्रा भटकन के नाम हो गई
घर दफ्तर दुनियाँ में इस तरह बँटे
सूरज कब निकला कब शाम हो गई
जान नहीं पाए दिन किस तरह कटे।
बेमतलब चिंताएँ
बोझ रहीं यार
रास्ते में होगी ही
धूप कहीं छाँव।

अपनी हर सुविधा के तर्क गढ़ लिये
चार अक्षर पढ़ करके ढीठ हो गये
झूठे आडंबर के खोल मढ़ लिये
ख्रतरों में कछुए की पीठ हो गए
प्रगतिशील होने को
शहर हुए लोग
शहरों के चक्कर में
छूट गया गाँव।

~ राजेंद्र त्रिपाठी

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