हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर Hindi poem on Netaji Subhash Chandra Bose

हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर: हरजीत निषाद

हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर: हरजीत निषाद – सुभाष चंद्र बोस भारत के सबसे प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे. वह युवाओं के करिश्माई प्रभावक थे और स्वतंत्रता के संघर्ष के दौरान भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) की स्थापना और नेतृत्व करके ‘नेताजी‘ की उपाधि प्राप्त की। हालाँकि शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ गठबंधन किया गया था लेकिन विचारधारा में अंतर के कारण उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया था। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी में नाजी नेतृत्व और जापान में शाही सेना से सहायता मांगी ताकि भारत से अंग्रेजों को उखाड़ फेंका जा सके। सन 1945 में उनके अचानक लापता होने के बाद उनके अस्तित्व की संभावनाओं के विषय में विभिन्न सिद्धांत के अलग-अलग मत प्रचलित हुए।

हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर: हरजीत निषाद

परमवीर निर्भीक निडर,
पूजा जिनकी होती घर घर,
भारत मां के सच्चे सपूत,
हैं सुभाष चन्द्र बोस अमर।

सन अट्ठारह सौ सत्तानवे,
नेता जी महान थे जन्मे,
कटक ओडिशा की धरती पर,
तेईस जनवरी की शुभ बेला में।

देशभक्तों के देशभक्त,
दूरंदेश थे अति शशक्त,
नारा जय हिन्द का देकर बोले,
आजादी दूंगा तुम देना रक्त।

आजादी की लड़ी लड़ाई,
आजाद हिन्द फ़ौज बनाई,
जन जन को आगे ले आए,
तरुणाई को दिशा दिखाई।

अन्याय कभी न सहना है,
सुलह न उससे करना है,
अपराध है ऐसा कुछ करना,
नेता जी का यह कहना है।

~ हरजीत निषाद

भारतीय इतिहास में सुभाष चन्द्र बोस एक सबसे महान व्यक्ति और बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे। भारत के इतिहास में स्वतंत्रता संघर्ष के लिये दिया गया उनका महान योगदान अविस्मरणीय हैं। वो वास्तव में भारत के एक सच्चे बहादुर हीरो थे जिसने अपनी मातृभूमि की खातिर अपना घर और आराम त्याग दिया था। वो हमेशा हिंसा में भरोसा करते थे और ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता पाने के लिये सैन्य विद्रोह का रास्ता चुना।

उनका जन्म एक समृद्ध हिन्दू परिवार में 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में हुआ था। उनके पिता जानकी नाथ बोस थे जो एक सफल बैरिस्टर थे और माँ प्रभावती देवी एक गृहिणी थी। एक बार उन्हें ब्रिटिश प्रिसिंपल के ऊपर हमले में शामिल होने के कारण कलकत्ता प्रेसिडेंसी कॉलेज से निकाल दिया गया था। उन्होंने प्रतिभाशाली ढंग से आई.सी.एस की परीक्षा को पास किया था लेकिन उसको छोड़कर भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई से जुड़ने के लिये 1921 में असहयोग आंदोलन से जुड़ गये।

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