बतूता का जूता - सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

बतूता का जूता – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

इब्न बतूता, पहन के जूता
निकल पड़े तूफान में।

थोड़ी हवा नाक में घुस गई,
थोड़ी घुस गई कान में।

Batuta Ka Jutaकभी नाक को, कभी कान को,
मलते इब्न बतूता।

इसी बीच में निकल पड़ा,
उनके पैरों का जूता।

उड़ते-उड़ते जूता उनका,
जा पहुँचा जापान में।

इब्न बतूता खड़े रह गए,
मोची की दूकान में।

∼ सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

आपको सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता “बतूता का जूता” कैसी लगी – आप से अनुरोध है की अपने विचार comments के जरिये प्रस्तुत करें। अगर आप को यह कविता अच्छी लगी है तो Share या Like अवश्य करें।

यदि आपके पास Hindi / English में कोई poem, article, story या जानकारी है जो आप हमारे साथ share करना चाहते हैं तो कृपया उसे अपनी फोटो के साथ E-mail करें। हमारी Id है: submission@sh035.global.temp.domains. पसंद आने पर हम उसे आपके नाम और फोटो के साथ यहाँ publish करेंगे। धन्यवाद!

Check Also

World Heart Day Information, History, Greetings, Banners, Theme

World Heart Day Information, Date, History, Theme, Greetings & Banners

World Heart Day (WHD) is a campaign established to spread awareness about the health of …