महात्मा गाँधी का अंतिम अनशन: क्या थी उनकी माँगें

महात्मा गाँधी का अंतिम अनशन: क्या थी उनकी माँगें

Pak को दिला दिए 55 करोड़ रुपए, शरणार्थी हिन्दुओं / सिखों को भरी ठंड में मस्जिदों से निकाल सड़क पर ला दिया: गाँधी का अंतिम अनशन

महात्मा गाँधी की अन्य माँगें थीं – पुरानी दिल्ली में मुस्लिमों को स्वतंत्र रूप से घूमने-फिरने की व्यवस्था की जाए, पाकिस्तान से लौटने वाले मुस्लिमों को लेकर गैर-मुस्लिम कोई आपत्ति न जताएँ, रेलगाड़ियों में मुस्लिम निडर होकर यात्रा कर सकें, मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार नहीं किया जाए और हिन्दू शरणार्थियों को मुस्लिमों के इलाके में तभी बसाया जाए जब उनकी अनुमति मिले।

1947-88 का साल भारत की स्वतंत्रता के लिए याद किया जाता है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के भाषण ‘Tryst With Destiny‘ के लिए याद किया जाता है। भारत-पाकिस्तान विभाजन के लिए याद किया जाता है। महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) के अंतिम अनशन (Last Fast) और उनकी हत्या के लिए याद किया जाता है। लेकिन, क्या इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण ये नहीं है कि हम इन दो वर्षों में लाखों लोगों के नरसंहार की बात करें? विभाजन के समय हिन्दुओं / सिखों का नरसंहार हो या गाँधी की हत्या के बाद महाराष्ट्र में चितपावन ब्राह्मणों का कत्लेआम, ये सब क्यों भुला दिया जाता है?

महात्मा गाँधी भारत की आज़ादी के समय पश्चिम बंगाल में थे। 9 सितंबर, 1947 को वो दिल्ली पहुँचे और उनकी नजर में दिल्ली ‘लाशों का शहर’ हो गया था। जनवरी 1948 में वो अपने जीवन के अंतिम उपवास पर बैठे। उनकी माँगें क्या थी, वो जान लीजिए। उनकी माँग थी कि सांप्रदायिक सौहार्दता बनाई रखी जाए और हिन्दू-मुस्लिम एक होकर रहें। वैसे ये पहली बार नहीं था क्योंकि इससे पहले भी दो बार वो तथाकथित हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए उपवास पर बैठ चुके थे।

जनवरी 1948 में महात्मा गाँधी का अंतिम अनशन: जानिए क्या थी उनकी माँगें

उस समय जब जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित हिंसा हो रही थी, महात्मा गाँधी को सिर्फ दिल्ली के मुस्लिमों की चिंता सता रही थी। उनका कहना था कि मुस्लिम दिल्ली में सुरक्षित नहीं हैं। मौलाना आज़ाद से मिल कर उन्होंने अपना अनशन तोड़ने के लिए कुछ शर्तें रखीं – मेहरौली के ख्वाजा बख्तियार दरगाह पर हर साल लगने वाले मेले (उर्स) का शांतिपूर्ण आयोजन हो, दिल्ली में जिन 100 मस्जिदों को शरणार्थी कैंपों में बदल दिया गया है – उन्हें पूर्व की स्थिति में लाया जाए।

इसके अलावा उनकी अन्य माँगें थीं – पुरानी दिल्ली में मुस्लिमों को स्वतंत्र रूप से घूमने-फिरने की व्यवस्था की जाए, पाकिस्तान से लौटने वाले मुस्लिमों को लेकर गैर-मुस्लिम कोई आपत्ति न जताएँ, रेलगाड़ियों में मुस्लिम निडर होकर यात्रा कर सकें, मुस्लिमों का आर्थिक बहिष्कार नहीं किया जाए और हिन्दू शरणार्थियों को मुस्लिमों के इलाके में तभी बसाया जाए जब उनकी अनुमति मिले। इसका सीधा अर्थ है कि महात्मा गाँधी का ये आमरण अनशन मुस्लिमों के लिए था।

रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकारों की मानें तो महात्मा गाँधी भी यही समझते थे कि देश की राजधानी की परिभाषा ही मुस्लिमों से शुरू होती है और यहाँ की कलाकृतियाँ, साहित्य, संगीत और मेडिकल विज्ञान तक पर मुस्लिमों की छाप है। उन्होंने सितंबर 1947 में दिल्ली पहुँच कर हिन्दुओं और मुस्लिमों को ज्ञान दिया कि वो मुस्लिमों को बराबर के नागरिक की तरह रहने दें, दास बना कर नहीं। उन्होंने पाकिस्तान जाकर वहाँ हिन्दुओं और सिखों के लिए प्राण त्यागने की बातें की, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

हिन्दुओं को खुद को दोषी मानने के लिए मजबूर करने के प्रयास में महात्मा गाँधी उनसे पूछते थे कि क्या तुमलोग 4 करोड़ मुस्लिमों का विनाश कर दोगे? उनका कहना था कि मुस्लिमों का हिन्दू धर्म में धर्मांतरण भी उनका ‘नरसंहार’ ही होगा। महात्मा गाँधी अपने 78वें जन्मदिन पर देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल से यही कह रहे थे कि आज मुझे कोई नहीं सुनता है, मैं ज़िंदा ही क्यों हूँ? उनकी चिंता थी कि मुस्लिमों के बाद अब ईसाईयों का क्या होगा।

कितनी अजीब बात है न कि नवंबर 1947 में आयोजित कॉन्ग्रेस के एक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए महात्मा गाँधी ने कहा कि न तो भारत केवल हिन्दुओं का है और न पाकिस्तान केवल मुस्लिमों का। जबकि पाकिस्तान का जन्म ही इस्लाम के आधार पर हुआ था, मजहब के आधार पर हुआ था। उनका दावा था कि चाँदनी चौक से मुस्लिमों की दुकानें हटा दी गई हैं और दिल्ली में 130 मस्जिदों में तोड़फोड़ हुई है। 12 जनवरी, 1948 को महात्मा गाँधी ने अगले दिन से आमरण अनशन की घोषणा की।

महात्मा गाँधी इस बात से भी नाराज़ थे कि भारत अब पाकिस्तान को ‘उसके हिस्से के रुपए’ क्यों नहीं दे रहा। 13 जनवरी, 1948 को सवा 11 बजे महात्मा गाँधी ने अपना आमरण अनशन शुरू किया, जो उनके जीवन का अंतिम था। बाहर पीड़ित हिन्दू भी विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, महात्मा गाँधी के खिलाफ नारे लग रहे थे। 15 जनवरी को ऐलान किया गया था कि महात्मा गाँधी का आमरण अनशन अल्पसंख्यकों के लिए है, भारत के भी और पाकिस्तान के भी।

शरणार्थी हिन्दू सड़क पर आ गए, लेकिन गाँधी को थी मुस्लिमों की चिंता

तब तक भारत सरकार भी पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने के लिए तैयार हो गई थी। 18 जनवरी, 1948 को महात्मा गाँधी ने अपना अनशन खतम कर दिया। उससे पहले डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से मिल कर सभी धर्मों के नेताओं ने वादा किया था कि दिल्ली में मुस्लिमों को कुछ नहीं होगा। नेहरू सरकार किसी तरह इस अनशन को खत्म कराना चाहती थी, जिसमें वो कामयाब रही। महात्मा गाँधी का कहना था कि ये उनका सबसे बड़ा अनशन था। उससे पहले वो ‘राष्ट्रवाद के नाम पर हिंसा’ के खिलाफ भी अनशन कर चुके थे।

नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे अपनी पुस्तक ‘गाँधी वध क्यों’ में लिखते हैं कि मस्जिदों से जिन शरणार्थियों को हटाने की बात गाँधी कर रहे थे, वो सभी हिन्दू थे। गोपाल ने बताया है कि ठंड और बारिश में उन्होंने अपनी आँखों से ठिठुरते हुए हिन्दुओं को बाहर निकलते हुए देखा। उन्होंने ही ‘बिरला हाउस’ के बाहर जाकर नारे लगाए, लेकिन गाँधी ने उनकी एक न सुनी। गोपाल गोडसे इस बात से नाराज़ थे कि महात्मा गाँधी ने अपने अनशन में पाकिस्तान सरकर के लिए कोई शर्त क्यों नहीं रखी?

अपनी पुस्तक ‘Freedom At Midnight (आज़ादी आधी रात को)’ में फ्रेंच लेखक डोमिनोक लापिएर्रे (Dominique Lapierre) लिखते हैं कि अनशन के दौरान महात्मा गाँधी पाकिस्तान जाने का प्रबंध कराने में भी लगे हुए थे और इसके लिए मुंबई के कपास दलाल जहाँगीर पटेल की मदद ले रहे थे। लेकिन, जिन्ना ने गाँधी पर अविश्वास जताते हुए मना कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि गाँधी के कारण ही उन्हें कभी कॉन्ग्रेस छोड़नी पड़ी थी। 55 करोड़ रुपए मिलने की घोषणा के बाद जिन्ना तैयार हो गए और गाँधी सीमा से पैदल पाकिस्तान जाने का मन बना लिया।

वो लिखते हैं कि कैसे महात्मा गाँधी ने अनशन के दौरान उन्हें देखने आए माउंटबेटन दंपति के स्वागत करते हुए कहा था, “अच्छा तो जब मुझे अनशन करना पड़ता है, तब पहाड़ मुहम्मद के पास आता है।” उद्योगपति घनश्याम दास बिरला ने गाँधी को समझाया भी कि पाकिस्तान को राशि हस्तानांतरित करने के परिणाम ठीक नहीं होंगे, लेकिन गाँधी नहीं माने। उनका मानना था कि इस रुपए से पाकिस्तान हथियर खरीदेगा। लेकिन, महात्मा गाँधी की जिद के कारण भारत सरकार को तैयार होना पड़ा।

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