जैसे-जैसे बढ़ती उम्र के साथ-साथ बालों का सफेद होना तय होता है, ठीक उसी प्रकार पुरुषों में पौरुष ग्रंथि का बढ़ना भी निश्चित है। कुछ एक को इस ग्रंथि की बढ़ोतरी का पता भी नहीं चलता है, लेकिन कुछ की इस बढ़ोतरी से जीवन-शैली ही बदल जाती है। दवाइयाँ खाते रहने से कोई लाभ नहीं मिलता और समस्या से छुटकारा पाने के लिए कराई गई सर्जरी से भी कोई विशेष लाभ नहीं मिलता। लेकिन जीवन-शैली बदलने से और ठीक भोजन प्रबंधन से समस्या को नियंत्रित करने में बहुत मदद मिलती है।
पौरुष ग्रन्थि की वृद्धि: Prostate Enlargement
समस्या क्या है:
मूत्राशय (bladder) के ठीक नीचे जहाँ मूत्रमार्ग (urethra) आरम्भ होता है, वहाँ पर पौरुष ग्रंथि होती है। इस ग्रंथि के ऊपर की ओर मूत्राशय है तो इसके नीचे मलाशय (rectum) स्थित है। यह ग्रंथि जब फैलती है, तब मूत्राशय से आरम्भ होने वाले मूत्रमार्ग को ऊपर की ओर धकेलती है। इसके कारण मूत्राशय को पूरी तरह खाली करने में कठिनाई होती है। एक अवधारणा बन जाती है कि मूत्राशय में पेशाब शेष बचा है।
इस अनुभूति के कारण मूत्राशय के नीचे की मांसपेशियों में सिकुड़न बढ़ जाती है। ये मांसपेशियाँ धीरे-धीरे कमजोर हो जाती हैं तथा काम करना धीमा कर देती हैं। इसके परिणामस्वरूप, मूत्राशय प्राकृतिक रूप से खाली नहीं हो पाता। मांसपेशियों की ताकत बनी रहे तो ग्रंथि की वृद्धि का पता भी नहीं लगता है। बार-बार पेशाब करने की क्रिया करते रहने से मांसपेशियों में कमजोरी आती है तथा वह मूत्राशय को ऊपर की ओर नहीं उठा पातीं। इसके कारण मूत्राशय खाली नहीं हो पाता। इस प्रकार पीड़ित व्यक्ति की पेशाब करने की हाजत बनी रहती है।
ध्यान देने योग्य है कि मेडिकल भाषा में इस रोग को BPH (Benign Prostatic Hyperplasia) कहते हैं। Benign का शाब्दिक अर्थ कैंसर नहीं है। Hyperplasia का अर्थ है “बढ़ोतरी”। यानी ग्रंथि की कोशिकाओं की वृद्धि बढ़ती उम्र के कारण पैदा हुई आम समस्या है। लेकिन यह समस्या कभी रोगी की ग्रंथि में कैंसर का कारण नहीं होती।
यह भी अनुभव किया गया है कि ग्रंथि का साइज छोटा है, यानी इतना बड़ा नहीं है, लेकिन पीड़ित व्यक्ति को परेशानी बहुत अधिक है। दूसरी ओर, किसी दूसरे व्यक्ति की ग्रंथि का साइज बहुत बड़ा होते हुए भी उसे परेशानी नहीं के बराबर होती है। इस प्रकार की अनुभूतियाँ यह सिद्ध करती हैं कि बीमारी शारीरिक ही नहीं, पीड़ित व्यक्ति की मानसिकता पर भी निर्भर करती है।
पुरुष की इस ग्रंथि का साइज तरुण अवस्था में मूँगफली के दाने के बराबर हो जाता है। जैसे-जैसे उसमें नर-हार्मोन (androgen) का विकास होता है, इसका बढ़ना कुछ समय के लिए रुक जाता है। लगभग 25 वर्ष की आयु में इस ग्रंथि की बढ़ोतरी दोबारा आरम्भ हो जाती है।
पौरुष ग्रंथि की बढ़ोतरी से छुटकारा दिलाने के लिए अब डॉक्टर लक्षणों की आवश्यकता के अनुसार इलाज करने की सलाह देते हैं। अमेरिका आदि देशों में इसके इलाज की सबसे उत्तम रणनीति सतर्क निगरानी (watchful waiting) को माना गया है। इसका अर्थ है कि सर्जरी या किरण-पात (radiation) – दोनों ही अवस्थाओं में रोगी की हालत सुधारने की बजाय खराब अधिक हुई है। दवाइयों के दुष्परिणाम पीड़ा को और बढ़ाते हैं। इसका अर्थ है कि पीड़ित व्यक्ति को इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए चिकित्सक की सहायता की बजाय अपनी जीवन-शैली में बदलाव लाकर समाधान ध्यान दें कि ग्रंथि का साइज छोटा है, यानी इतना बड़ा नहीं है, लेकिन पीड़ित व्यक्ति को परेशानी बहुत अधिक है। कोई विकल्प न बचने पर ही सर्जरी की सलाह दी जाती है। सर्जरी द्वारा रुकावट डालने वाली कोशिकाओं को बिजली के करंट द्वारा खत्म कर दिया जाता है। कैंसर की अवस्थाओं में किरणपात करते हैं या फिर ग्रंथि को ही शरीर से बाहर निकाल देते हैं।

रोग निवारण के लिए निम्नलिखित चार मुख्य लक्षणों पर पीड़ित व्यक्ति का समान रूप से ध्यान होना चाहिए:
- ग्रंथि की वृद्धि एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। ग्रंथि की बढ़ोतरी से अधिक समस्या मूत्राशय की सतह पर की मांसपेशियों (Detrusor muscles) में आई कमजोरी होती है। इसके लिए श्रोणी प्रदेश (Pelvic muscles) को सक्रिय करें। इसके लिए मुख्य क्रियाएँ हैं: मूलबंध, सेतुबन्ध आसन, गुदा को अंदर की ओर दबाकर ऊपर की ओर खींचना तथा केगल क्रियाएँ (Kegel exercises) यथा अश्विनी मुद्रा आदि करना लाभदायक होता है।
- पौरुष ग्रंथि मलाशय के ठीक ऊपर होती है। मलाशय में यदि मल रहेगा, तो ग्रंथि ऊपर उठ जाएगी और उसके ऊपर स्थित मूत्र-मार्ग को ऊपर की ओर धकेल देगी। अतः कब्ज न हो, इसके लिए सुपाच्य और रेशेदार भोजन करें। मलाशय साफ रखने से पीड़ित व्यक्ति की समस्या घट जाती है।
- बार-बार पेशाब के लिए जाना पीड़ित व्यक्ति की मानसिकता पर निर्भर करता है। इसके लिए मूत्राशय को प्रशिक्षित करने का अभ्यास करें। अपना नियम बनाएँ तथा हाजत के अनुसार पेशाब करने न जाकर समयानुसार पेशाब करने जाएँ। उदाहरण के लिए, नियम बनाएँ कि आधे घंटे के अंतर तक पेशाब करने जाएँ। इस अंतर को आगे बढ़ाने का अभ्यास लगातार करते रहें। यह प्रबंधन इस समस्या पर विजय पाने में सभी दवाइयों से अधिक मदद करता है।
- पेशाब करते समय यूरोपियन टॉयलेट के कमोड पर बैठकर अपनी एड़ियों को हल्का-सा ऊपर उठाकर रखें। पेशाब करते हुए अपने सामने वाले पानी के नल को थोड़ा-सा खोल दें। मन को शांत रखें।
इस ग्रंथि को नियंत्रित करने का सबसे कारगर तरीका पीड़ित व्यक्ति की जीवन-शैली में परिवर्तन लाना ही होता है। इनमें मुख्य हैं:
- प्रतिदिन कम-से-कम 30 मिनट आसन या सैर अवश्य करें। आसनों में लगभग सभी आसन पौरुष ग्रंथि के लिए लाभदायक होते हैं, लेकिन गरुड़ासन, सूर्य नमस्कार, जानुशिरासन, सुप्त वज्रासन, उत्थान पादहस्तासन, शलभासन, हलासन, सर्वांगासन अधिक लाभकारी होते हैं।
- पौरुष ग्रंथि पीड़ित व्यक्ति के शरीर से जिंक का संग्रह करती है। अतः भोजन में 15 मिलिग्राम जिंक प्रतिदिन अवश्य होना चाहिए। जिंक सबसे अधिक पेठे के बीजों में होता है। अन्य बीज, जैसे कि मूँगफली, बादाम, अखरोट, शकरकंदी आदि में भी पाया जाता है। मेथी और अलसी भी लाभदायक हैं।
- उबले या संसाधित टमाटर की चटनी के प्रोटीन रक्त में लाइकोपिन (Lycopene) को बढ़ाता है, जिससे शरीर को जिंक मिलता है। इस प्रोटीन का शरीर में अवशोषण मोनोसैच्युरेटेड फैट (monounsaturated fats), यानी बीजों से प्राप्त तेल में टमाटर को पकाकर ही हो पाता है।
- न्यूनतापूरक आहार (supplementary food) का कम प्रयोग करें। खनिज लवण (trace minerals) या विटामिन की पूर्ति प्राकृतिक आहार से ही पूरी होनी चाहिए।
- अपने भोजन और भोजन करने के तरीकों को सुधारें। मोटापा, कब्ज और कुपचन से बचें। भोजन में रेशे की मात्रा बढ़ाएँ तथा स्वस्थ वसा (omega-3 foods) को ज्यादा स्थान दें।
- पानी पीने के तरीके को सुधारते हुए सोने से तीन घंटे पहले पानी बंद करें तथा कोशिश करें कि रात को पानी नहीं पीना पड़े।
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