हैं जनम लेते जगत में एक ही‚ एक ही पौधा उन्हें है पालता। रात में उन पर चमकता चांद भी‚ एक ही–सी चांदनी है डालता। मेह उन पर है बरसता एक–सा‚ एक–सी उन पर हवाएं हैं वहीं। पर सदा ही यह दिखाता है समय‚ ढंग उनके एक–से होते नहीं। छेद कर कांटा किसी की उंगलियां‚ फाड़ देता है किसी का …
Read More »परमगुरु – अनामिका
मैं नहीं जानती कि सम्य मेरी आँखों का था या मेरे भौचक्के चेहरे का, लेकिन सरकारी स्कूल की उस तीसरी पाँत की मेरी कुर्सी पर तेज प्रकाल से खुदा था– ‘उल्लू’ मरी हुई लाज से कभी हाथ उस पर रखती, कभी कॉपी लेकिन पट्ठा ऐसा था– छुपने का नाम ही नहीं लेता था ! धीरे–धीरे हुआ ऐसा– खुद गया मेरा वह …
Read More »तुमको रुप का अभिमान – रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’
तुमको रुप का अभिमान, मुझको प्यार का अभिमान! तुम हो पूर्णिमा साकार, मैं हूँ सिंधु–उर का ज्वार! दोनो का सनातन मान, दोनो का सनातन प्यार! तुम आकाश, मैं पाताल, तुम खुशहाल, मैं बेहाल; तुमको चाँदनी का गर्व, मुझको ज्वार का अभिमान! तुमको रुप का अभिमान, मुझको प्यार का अभिमान! मुझको तो नहीं मालूम किस दिन बँध गए थे प्राण, कैसे …
Read More »कौन जाने – बालकृष्ण राव
झुक रही है भूमि बायीं ओर‚ फिर भी कौन जाने‚ नियति की आँखें बचाकर‚ आज धारा दाहिने बह जाए! जाने किस किरण–शर के वरद आघात से निर्वर्ण रेखाचित्र यह बीती निशा का रँग उठे कब‚ मुखर हो कब मूक क्या कह जाए! ‘संभव क्या नहीं है आज?’ लोहित लेखनी प्राची क्षितिज की कर रही है प्रेरणा या प्रश्न अंकित? कौन …
Read More »फिर क्या होगा – बालकृष्ण राव
फिर क्या होगा उसके बाद? उत्सुक हो कर शिशु ने पूछा माँ, क्या होगा उसके बाद? ‘रवि से उज्ज्वल शशि से सुंदर नव किसलयदल से कोमलतर वधू तुम्हारी घर आएगी उस विवाह उत्सव के बाद’ पल भर मुख पर स्मित की रेखा खेल गई, फिर माँ ने देखा कर गंभीर मुखाकृति शिशु ने फिर पूछा ‘क्या उसके बाद?’ ‘फिर नभ …
Read More »मुझको सरकार बनाने दो – अल्हड़ बीकानेरी
जो बुढ्ढे खूसट नेता हैं, उनको खड्डे में जाने दो, बस एक बार, बस एक बार, मुझको सरकार बनाने दो। मेरे भाषण के डंडे से भागेगा भूत गरीबी का, मेरे वक्तव्य सुनें तो झगड़ा मिटे मियां और बीवी का। मेरे आश्वासन के टानिक का एक डोज़ मिल जाए अगर, चंदगी राम को करे चित्त पेशेंट पुरानी टी बी का। मरियल …
Read More »मेरे राम जी – अल्हड़ बीकानेरी
चाल मुझ तोते की बुढ़ापे में बदल गई बदली कहां है मेरी तोती मेरे राम जी बहुएँ हैं घर में‚ मगर निज धोतियों को खुद ही रगड़ कर धोती मेरे राम जी फँसी रही मोह में जवानी से बुढ़ापे तक तोते पे नज़र कब होती मेरे राम जी पहले तो पाँच बेटी–बेटों को सुलाया साथ अब सो रहे हैं पोती–पोते …
Read More »सूरज डूब चुका है – अजित कुमार
सूरज डूब चुका है‚ मेरा मन दुनिया से ऊब चुका है। सुबह उषा किरणों ने मुझको यों दुलराया‚ जैसे मेरा तन उनके मन को हो भाया‚ शाम हुई तो फेरीं सबने अपनी बाहें‚ खत्म हुई दिन भर की मेरी सारी चाहें‚ धरती पर फैला अंधियारा‚ रंग बिरंगी आभावाला सूरज डूब चुका है‚ मेरा मन दुनिया से ऊब चुका है। फूलों …
Read More »शीशे का घर – श्रीकृष्ण तिवारी
जब तक यह शीशे का घर है तब तक ही पत्थर का डर है आँगन–आँगन जलता जंगल द्वार–द्वार सर्पों का पहरा बहती रोशनियों में लगता अब भी कहीं अँधेरा ठहरा। जब तक यह बालू का घर है तब तक ही लहरों का डर है टहनी–टहनी टंगा हुआ है जख्म भरे मौसम का चेहरा गलियों में सन्नाटा पसरा। जब तक यह …
Read More »सूने घर में – सत्यनारायण
सूने घर में कोने कोने मकड़ी बुनती जाल। अम्मा बिन आंगन सूना है बाबा बिन दालान‚ चिठ्ठी आई है बहिना की सांसत में है जान‚ नित नित नये तकादे भेजे बहिना की ससुराल। भइया तो परदेस बिराजे कौन करे अब चेत‚ साहू के खाते में बंधक है बीघे भर खेत‚ शायद कुर्की जब्ती भी हो जाए अगले साल। ओर–छोर छप्पर …
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