पता ही नहीं: कृष्ण बिहारी 'नूर' के चुनिन्दा शायरी

पता ही नहीं: कृष्ण बिहारी ‘नूर’ की चुनिन्दा शायरी

२९ अगस्त १९५४ को पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की बांसगाँव तहसील (अब खजनी) अन्तर्गत ग्राम कुण्डाभरथ में जन्म। कानपुर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम. ए. किया। सन १९६८-६९ से लेखन की शुरुआत हुई। पहली कहानी सन १९७१ में प्रकाशित। तबसे सैकड़ों रचनाएँ हिन्दुस्तान के प्रमुख समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं में प्रकाशित। अनेक प्रकार की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं के सदस्य और इमारात में हिन्दी के विकास में संलग्न। संप्रति संयुक्त अरब इमारात के अबूधाबी नगर में अध्यापन के व्यवसाय में हैं।

जिन्दगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं

इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

जिंदगी मौत तेरी मंज़िल है
दूसरा कोई रास्ता ही नहीं

जिंदगी अब बता कहाँ जाएँ
ज़हर बाज़ार में मिला ही नहीं

जिस के कारण फसाद होते हैं
उसका कोई अता पता ही नहीं

कैसे अवतार कैसे पैगंबर
ऐसा लगता है अब खुदा ही नहीं

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे
झूठ की कोई इंतहा ही नहीं

चाहे सोने के फ्रेम में जड़ दो
अइना झूठ बोलता ही नहीं

अपनी रचनाओं में वो जिंदा है
‘नूर’ संसार से गया ही नहीं

~ कृष्ण बिहारी ‘नूर’

कृष्णबिहारी ‘नूर’ का जन्म लखनऊ के ग़ौसनगर मुहल्ले में बाबू कुंजबिहारीलाल श्रीवास्तव के यहाँ 8 नवंबर, 1925 को हुआ। जून 1947 में उनका विवाह शकुन्तला देवी से हुआ। 19 जुलाई, 1982 को नूरसाहब की धर्मपत्नी का निधन हुआ। उनका दाह-संस्कार कानपुर में गंगा किनारे किया गया। धर्मपत्नी के निधन ने नूरसाहब में टूटन तो पैदा की, लेकिन उनके भीतर तेज़तर होते जा रहे शायरी के दरिया को और प्रवाहमान बनाया। 30 मई 2003 को प्रातः 10 बजे ग़ाज़ियाबाद के यशोदा हास्पिटल में आँत के आपरेशन के दौरान नूरसाहब का निधन हो गया।

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