जिन कलियों को खिलते देखा
मृदु मारुत में हिलते देखा
प्रिय मधुपों से मिलते देखा
हो गया उन्हीं का आज दलन
देखो यह जग का परिवर्तन
रहती थी नित्य बहार जहाँ
बहती थी रस की धार जहाँ
था सुषमा का संसार जहाँ
है वहाँ आज बस ऊजड़ बन
देखो यह जग का परिवर्तन
था अतुल विभव का वास जहाँ
था जीवन में मधुमास जहाँ
था सन्तत हास विलास जहाँ
है आज वहाँ दुख का क्रंदन
देखो यह जग का परिवर्तन
जो देश समुन्नत–भाल रहे
नित सुखी स्वतंत्र विशाल रहे
जन–मानस–मंजु–कराल रहे
लो उनका भी हो गया पतन
देखो यह जग का परिवर्तन
~ ठाकुर गोपालशरण सिंह
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