सपनों का अंत नहीं होता – शिव बहादुर सिंह भदौरिया

सपने जीते हैं मरते हैं
सपनों का अंत नहीं होता।

बाँहों में कंचन तन घेरे
आँखों–आँखों मन को हेरे
या फिर सितार के तारों पर
बेचैन उँगलियों को फेरे–
बिन आँसू से आँचल भीगे
कोई रसवंत नहीं होता।

सोने से हिलते दाँत मढ़ें
या कामसूत्र के मंत्र पढ़ें
चाहे खिजाब के बलबूते
काले केशों का भरम गढ़ें–
जो रोके वय की गतिविधियाँ
ऐसा बलवंत नहीं होता।

साधू भी कहाँ अकेले हैं
परिवार नहीं तो चेले हैं
एकांतों के चलचित्रों से
यादों के बड़े झमेले हैं–
जिसमानी मन के मरे बिना
कोई भी संत नहीं होता।

— शिव बहादुर सिंह भदौरिया

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