हे सांझ मइया – शलभ श्रीराम सिंह

शंख फूंका सांझ का तुमने
जलाया आरती का दीप
आंचल को उठा कर
बहुत धीमे
और धीमे
माथ से अपने लगा कर
सुगबुगाते होंठ से इतना कहा–
हे सांझ मइया…

और इतने में कहा मां ने–
बड़का आ गया
बहन बोली : आ गये भइया।
और तुमने
गहगहाई सांझ में
फूले हुए मन को संभाले
हाथ जोड़े,
फिर कहा…
हे… साँझ… मइया…

∼ शलभ श्रीराम सिंह

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