समय की शिला - शंभुनाथ सिंह

समय की शिला – शंभुनाथ सिंह

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए।

किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूँद पानी
इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी के
गई घुल जवानी, गई मिट निशानी।

विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाए, गगन ने गिराए।

शलभ ने शिखा को सदा ध्येय माना,
किसी को लगा यह मरण का बहाना
शलभ जल न पाया, शलभ मिट न पाया
तिमिर में उसे पर मिला क्या ठिकाना?

प्रणय-पंथ पर प्राण के दीप कितने
मिलन ने जलाए, विरह ने बुझाए।

भटकती हुई राह में वंचना की
रुकी श्रांत हो जब लहर चेतना की
तिमिर-आवरण ज्योति का वर बना तब
कि टूटी तभी शृंखला साधना की।

नयन-प्राण में रूप के स्वप्न कितने
निशा ने जगाए, उषा ने सुलाए।

सुरभि की अनिल-पंख पर मोर भाषा
उड़ी, वंदना की जगी सुप्त आशा
तुहिन-बिन्दु बनकर बिखर पर गए स्वर
नहीं बुझ सकी अर्चना की पिपासा।

किसी के चरण पर वरण-फूल कितने
लता ने चढ़ाए, लहर ने बहाए।

∼ डॉ. शंभुनाथ सिंह

About Shambhunath Singh

डॉ. शंभुनाथ सिंह (17 जून 1916 – 3 सितम्बर 1991) एक प्रसिद्ध हिन्दी लेखक, स्वतंत्रता सेनानी, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता थे। इनका जन्म गाँव रावतपार, जिला देवरिया, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे नवगीत आंदोलन के प्रणेता माने जाते हैं। नवगीत के प्रतिष्ठापक और प्रगतिशील कवि शंभुनाथ सिंह का हिंदी कविता में विशेष स्थान है। उनकी कविताएँ नई बौद्धिक चेतना से संपृक्त हैं। मानवजीवन की आधुनिक विसंगतियों का प्रभावशाली चित्र अंकित करने में वे अद्वितीय है। प्रकाशित कृतियाँ— रूप रश्मि, माता भूमिः, छायालोक, उदयाचल, दिवालोक, जहाँ दर्द नीला है, वक़्त की मीनार पर (सभी गीत संग्रह)। संपादित— नवगीत दशक-1 , नवगीत दशक-2, नवगीत दशक-3 तथा नवगीत अर्द्धशती का सम्पादन।

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