तब तक ही पत्थर का डर है
आँगन–आँगन जलता जंगल
द्वार–द्वार सर्पों का पहरा
बहती रोशनियों में लगता
अब भी कहीं अँधेरा ठहरा।
जब तक यह बालू का घर है
तब तक ही लहरों का डर है
टहनी–टहनी टंगा हुआ है
जख्म भरे मौसम का चेहरा
गलियों में सन्नाटा पसरा।
जब तक यह काज़ल का घर है
तब तक ही दागों का घर है
धरती पल–पल दहक रही है
जर्रा–जर्रा पिघल रहा है
चांद सूर्य को कोई अजगर
धीरे–धीरे निगल रहा है।
जब तक यह बारूदी घर है
तब तक चिनगारी का डर है।
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