गोविंद के पिता एक कस्बे में ट्रांसफर होकर आए थे। वह पशु चिकित्सालय में कर्मचारी थे। उन्होंने गोविंद को सरकारी स्कूल में सातवीं कक्षा में भर्ती करवा दिया।
गोविंद पढ़ाई में कुछ कमजोर था और चीजें देर से समझता था। उसे गणित तो ठीक से समझ ही नहीं आता था। उसकी इस कमजोरी के कारण कक्षा में छात्र उसका मजाक उड़ाते रहते और उसे ‘कमअक्ल‘ तथा ‘बुद्धू‘ कहकर चिढ़ाते रहते।
गोविंद का प्रयास: दिनेश विजयवर्गीय द्वारा रचित प्रेरक हिंदी बाल-कहानी
उसे पढ़ाने वाले शिक्षक भी उसकी पढ़ाई में उसके पिछड़ने से खुश नहीं रहते और उसे मन लगाकर पढ़ने को कहते। वे उसे समझने-सीखने की सुविधा भी देते, पर वह बड़ी मुश्किल से समझ पाता।
पहला टैस्ट हुआ तो उसके गणित और अंग्रेजी में पूरी कक्षा में सबसे कम नंबर आए।
उसने अपना प्रोग्रैस कार्ड अपने पिता को दिखाया। उन्होंने गोविंद को निराश न करते हुए उसे प्रेरणा दी और अधिक प्रयास करने को
कहा। ऐसे ही समय गुजरता गया।
अर्धवार्षिक परीक्षा हुई तो इस बार वह सभी विषयों में बस पास होने लायक नंबर लाकर पास तो हो गया, पर कक्षा में छात्र अब भी उसे चिढ़ाते, ‘ओ बुद्धू गोविंद! तुम जीवन में इसी तरह अटक-लटक कर नंबर लाने वाले बने रहोगे।’
उससे कोई दोस्ती करना भी पसंद नहीं करता था। अब वह चुप रहकर जब-तब अपनी बुद्धि को कोसता रहता।
एक बार कस्बे के एक बड़े मंदिर में एक संत आए हुए थे। वह प्रतिदिन लोगों को प्रवचन देते। लोग उनसे अपनी विभिन्न समस्याएं बताकर उनका समाधान पूछते।
एक दिन गोविंद के पिता भी उसे लेकर संत जी के पास गए और उनसे गोविंद की कमजोरी का कोई उपचार पूछने लगे। उन्होंने गोविंद से बातें कर उसकी परेशानी को समझने का प्रयास करते हुए उसके पिता से कहा, “रविवार को प्रातः इसे मेरे पास छोड़ देना। मैं इसकी समस्या का कोई समाधान निकालने का प्रयास करूंगा।”
रविवार को संत जी गोविंद को अपने साथ प्रातःकालीन भ्रमण पर ले गए। एक जगह कुछ महिलाएं कुएं से पानी भर रही थीं। संत जी गोविंद को कुएं पर ले गए और उसे पत्थर की पट्टी पर रस्सी की रगड़ से बने गड्ढे दिखलाए।
उन्होंने गोविंद से पूछा, “क्या तुम बता सकते हो कि इस कठोर पत्थर पर ये निशान कैसे बने?”
वह चुप रहा। संत जी ने उसे समझाया कि “जब-जब कुएं में रस्सी से बंधी बाल्टी डालकर पानी निकाला जाता है, तब-तब यह रस्सी इसी पत्थर की पट्टी को रगड़ती हुई नीचे से ऊपर आती है। बार-बार इस तरह रस्सी के ऊपर-नीचे आने-जाने की क्रिया के चलते इस कठोर पत्थर में भी धीरे-धीरे इस तरह के गड्डे हो गए।”
“यदि तुम भी इसी तरह रोज पढ़ाई को समझकर कड़ी मेहनत करोगे, तो तुम्हारी बुद्धि भी अन्य बच्चों की तरह तेज होने लगेगी। कहा भी गया है कि करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।”
संत जी ने उसे कुछ उपयोगी योगासन भी सिखाए।

गोविंद संत जी की शिक्षा से प्रभावित हुआ और वह अब रोज एकाग्रता और मेहनत से पढ़ाई करने के साथ योगाभ्यास भी करने लगा। कुछ ही दिनों में उसे लगने लगा कि अब वह पहले से बेहतर होने लगा है।
इस बार टैस्ट हुआ तो वह कई बच्चों से अच्छे नंबर लाकर शिक्षकों की प्रशंसा का पात्र बन गया।
अब गोविंद में आत्मविश्वास जागने लगा और उसने सुखद भविष्य के लिए कड़ी मेहनत से सदा के लिए नाता जोड़ लिया।
~ दिनेश विजयवर्गीय
करत-करत अभ्यास के, जड़मति होत सुजान। रसरी आवत-जात ते, सिल पर परत निशान॥
यह प्रसिद्ध दोहा कवि वृंद (वृंद-सतसई) द्वारा रचित है।
दोहे का अर्थ:
- करत-करत अभ्यास के: बार-बार लगातार प्रयास या अभ्यास करने से।
- जड़मति होत सुजान: कम समझ वाला या मूर्ख (जड़मति) व्यक्ति भी बुद्धिमान और चतुर (सुजान) बन जाता है।
- रसरी आवत-जात ते: जिस प्रकार कुएं से पानी खींचने वाली कोमल रस्सी के बार-बार आने-जाने से।
- सिल पर परत निशान: कठोर पत्थर (सिल) पर भी गहरे निशान पड़ जाते हैं।
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