पानी का मोल: बलजिंदर मान की लोकप्रिय पंजाबी बाल-कहानी हिंदी में

पानी का मोल: बलजिंदर मान की लोकप्रिय पंजाबी बाल-कहानी हिंदी में

आज सुबह-सुबह हरबीर जब अपने डैडी के साथ सैर करके घर को वापस लौट रहा था तो उसने देखा कि गली की नालियों में साफ पानी की बाढ़ आई हुई है।

अभी वे अपने घर वाली गली की तरफ मुड़े ही थे कि उन्होंने देखा कि कुछ लोगों ने पानी के सरकारी सप्लाई वाले नल खुले छोड़े हुए हैं और वे खुद अभी सोए पड़े हैं। हैरी ने पूछा, “डैडी जी यह पानी क्यों बह रहा है?”

पानी का मोल: शिक्षाप्रद पंजाबी कहानी हिंदी में

“बेटे, तुमने देखा नहीं। मोहल्ले वाले नल खुले छोड़कर सोए पड़े हैं। उन्हें तो बिल्कुल भी मालूम नहीं कि वे नल सुबह उठकर भी चला सकते हैं।” डैडी ने बेटे को सारी बातें समझाते हुए कहा।

“हमारे सर तो कहते हैं कि पानी का उपयोग हमेशा संयम से करना चाहिए। उन्होंने तो यह भी बताया कि हाथ-मुंह धोने के लिए मग का प्रयोग करना चाहिए। नल खुले छोड़कर अगर मुंह धोएंगे तो एक बाल्टी पानी बेकार बह जाएगा, जबकि हम लोगों को सिर्फ एक मग पानी की ही जरूरत है।” हैरी ने अपने अध्यापक की नसीहत को याद किया।

“हां बेटे, तुम्हारे अध्यापक ने यह बात बिल्कुल सही ही कही है। साथ ही नहाते वक्त जरूरत के अनुसार बाल्टी भरकर नल बंद कर देना चाहिए। पानी को व्यर्थ गंवाना कोई समझदारी नहीं।”

जब वे थोड़ा और आगे गए तो राजू के घर की टंकी भर चुकी थी और पानी बाहर गिर रहा था। पानी नाली से बाहर आकर सड़क पर भी बह रहा था। घर वालों को इसकी कोई फिक्र नहीं थी।

हरवीर ने हैरान होकर कहा, “डैडी जी! देखो इधर क्या हालत बन गई है। इन्होंने तो टंकी में ‘बॉल’ भी नहीं लगाया ताकि टंकी भरकर खुद बंद हो जाए। इन्हें तो पानी के मूल्य का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं।”

कुछ महीने गुजरने के बाद कहर की गर्मी पड़ने लगी। लोगों के घरों में लगे हैंड पंप खराब होने लगे। कारीगरों ने बताया कि पृथ्वी का पानी सूख रहा है, अब ये और गहरे करके लगाने पड़ेंगे जिससे खर्चा भी बहुत आएगा। यह बात सुन कर गांव वासियों को चिंता सताने लगी। जिनके पास गहरे पंप लगाने के लिए पैसे नहीं थे, वे सरकारी पानी की सप्लाई पर निर्भर हो गए थे।

हरवीर ने अपने भाई तनवीर को भी पानी को संयम से उपयोग करना सिखा दिया था। वह अपने नहाने वाले पानी को नाली में बहने की बजाय अपने किचन गार्डन में लगाता। कभी भी पानी को फिजूल न जाने देता। वह माता जी को भी कहता कि हर रोज फर्श की धुलाई न करें बल्कि सिर्फ पोंछा ही लगाएं। इस तरह उसने सारे परिवार को जल ही जीवन है और इसे अमृत मान कर उपयोग करने की बात समझा दी थी।

तेज गर्मी और ओवरलोड से सरकारी मोटर खराब हो गई। अब सारे मोहल्ले के लिए पानी की समस्या खड़ी हो गई थी।

कोई कहीं से और कोई कहीं और से पीने लायक पानी लाने में जुटा हुआ था। घरों की औरतों को भी सारे काम भूल गए थे और वे आधा समय पानी ढोने में लगाने लगी थीं। इस तरह सारा जीवन ठप्प होकर रह गया था।

हरवीर ने अपने मित्रों को इकट्ठा करके समझाया, “दोस्तो अगर हम पानी के उपयोग के प्रति सजग न हुए तो हमारी हालत इससे भी बदतर हो जाएगी। हमें इसका प्रयोग बहुत संयम से करना चाहिए और इसे नालियों में फिजूल बहा देना भी उचित नहीं है।”

वह राजू के घर बैठा इसी समस्या पर चिंतन कर रहा था। इतने में राजू का बेटा पानी ढूंढता हुआ घड़े के पास पहुंचा तो वह घड़ा खाली देखकर चक्कर खाकर गिर पड़ा। हरवीर ने अपने घर से पानी की बोतल लाकर उसे पानी पिलाया तो वह होश में आया। सारा परिवार उसके इर्द-गिर्द खड़ा था।

हरवीर बोला, “अंकल जी आपने तो अपनी टंकी में पानी व्यर्थ बहने से रोकने के लिए ‘बॉल’ भी नहीं लगाया। आपने कभी सोचा है कि ऐसी टंकियों से कितना पानी नालियों में बह कर व्यर्थ जाता है।”

“हां बेटे हमने तो यह बात कभी सोची ही नहीं। हम आज ही टंकी में बॉल लगवाएंगे। अब हमें पानी के मूल्य का ज्ञान हो गया है।”

~ लेखक: बलजिंदर मान [अनुवाद: डॉक्टर अमरजीत कौंके]

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