साल 1883 में इंडोनेशिया का क्राकाटोआ ज्वालामुखी (Krakatoa Volcano) फटा। इसे इतिहास की सबसे भयानक प्राकृतिक आपदाओं में गिना जाता है। इस विस्फोट ने केवल आसपास के क्षेत्रों को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम पर भी असर डाला।
क्राकाटोआ ज्वालामुखी का महाविस्फोट: Krakatoa volcano
26 और 27 अगस्त, 1883 को हुए लगातार विस्फोट इतने शक्तिशाली थे कि उनसे उठी सुनामी (विशाल समुद्री लहरें) ने 165 से अधिक गांवों को तबाह कर दिया। इस भीषण त्रासदी में 36,000 से अधिकलोगों की जान चली गई।
विस्फोट के दौरान ज्वालामुखी से निकली राख, गैस और चट्टानें लगभग 48 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच गईं। राख के घने बादलों ने आसपास के इलाकों में दो दिनों से अधिक समय तक सूरज की रोशनी को ढक दिया, जिससे दिन में भी अंधेरा छा गया।
इस विस्फोट की आवाज इतनी तेज थी कि इसे दुनिया की सबसे तेज दर्ज प्राकृतिक आवाज माना जाता है। इसकी गूंज 4,600 किलोमीटर दूर ऑस्ट्रेलिया और मॉरीशस तक सुनाई दी थी।
‘क्राकाटोआ’ विस्फोट का असर केवल कुछ दिनों तक ही नहीं रहा। ज्वालामुखी की राख पूरी दुनिया के वातावरण में फैल गई। इससे सूर्य की किरणें कम मात्रा में पृथ्वी तक पहुंचीं और अगले कुछ वर्षों तक पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 0.5 डिग्री सैल्सियस कम हो गया। कई देशों में सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग असामान्य रूप से गहरा लाल दिखाई देने लगा।

इस घटना ने वैज्ञानिकों को एक नई बात भी सिखाई। राख के महीन कण हजारों किलोमीटर दूर तक कैसे पहुंचे, इसका अध्ययन करने से वैज्ञानिकों को ‘जैट स्ट्रीम‘ (वायुमंडल की ऊंचाई पर बहने वाली तेज हवाओं) के बारे में बेहतर समझ मिली। आज मौसम का पूर्वानुमान लगाने में ‘जैट स्ट्रीम‘ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
साल 1927 में उसी स्थान पर समुद्र के भीतर से एक नया ज्वालामुखी उभरने लगा, जिसे ‘अनाक क्राकाटाऊ‘ (अर्थात् ‘क्राकाटोआ का पुत्र’) नाम दिया गया।
यह ज्वालामुखी आज भी सक्रिय है और वैज्ञानिक लगातार इसकी निगरानी करते रहते हैं।
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