सहज ध्यान साधना: शरीर को स्थिर करने के पश्चात इन्द्रियों का बाहरी वस्तुओं से संपर्क तोड़ना ध्यान है। मन को नाशवान वस्तुओं व सांसारिक विषयों से हटा देना ध्यान है। मन को अपने मूल स्वभाव में ठहरने की आदत डालना ध्यान है। बुद्धि की निरपेक्षता अर्थात् तटस्थ भाव देना ध्यान है। चित्त पर जमा संस्कारों को हटाना ध्यान है। मन को निर्विषय कर देना ध्यान है। जब एक ध्यान का साधक स्थिरता, श्रद्धा, विश्वास, समर्पण, मन की तटस्थता, निरंतरता व एकाग्रता साधना के जीवन में धारण करता है तो उसके लिए ध्यान में स्थित होना सहज होने लगता है। ध्यान की बहुत-सी विधियाँ हैं। हम यहाँ सहज ध्यान साधना पर चर्चा करेंगे।
सहज ध्यान साधना: Effortless Meditation Practice
विधि:
पद्मासन या ध्यान के किसी अन्य आसन में बैठें। रीढ़ व गर्दन को सीधा करें। आँखें कोमलता से बंद कर लें। दोनों हाथों को जंघाओं के मध्य सर्वांजलि मुद्रा या घुटनों पर ज्ञान मुद्रा / चिन्मुद्रा में रखें।
धीरे-धीरे दोनों नासारन्ध्रों से गहरे लंबे श्वास लें व छोड़ें। शरीर व मन को शिथिल व तनाव रहित बनाएँ। श्वासों को सामान्य करें। यह अभ्यास लगभग एक मिनट तक करें।
- ओउम् का बोलकर जाप: दोनों भौंहों के मध्य में ध्यान लगाएँ। बोलकर ओउम् की ध्वनि लगभग प्रारम्भ करेंगे। ध्वनि एक-एक के अनुपात में लयबद्ध, मध्यम व एक स्वर में हो। श्वास भरें ‘ऊँ‘ उच्चारण करते हुए जाप आरम्भ करें। यह अभ्यास दो मिनट तक करते जाएँ।
- ओउम् का मानसिक जाप: अब ओउम् का मानसिक जाप करें। बिना ध्वनि किए ऊँ मंत्र का मानसिक रूप में अपने आप दो मिनट तक करते जाएँ।
- श्वासों को देखना: नासिका के अग्रभाग को सजगता का केन्द्र बना कर तटस्थ भाव से श्वास-प्रश्वास को निहारें। श्वास को लेने व छोड़ने में अपना कोई प्रयास न लगाएँ। दृष्टाभाव से श्वास-प्रश्वास के देखते रहने से धीरे-धीरे मन शांत होने लगेगा। यह अभ्यास एक मिनट तक करते जाएँ।
- विचार-दर्शन: आने-जाते विचारों को देखें। उनके अच्छे व बुरे कौन न देखें। विचार आते हैं तो आने दें। विचारों को रोकें मत। विचार जाते हैं तो जाने दें। दृष्टा भाव से विचारों को केवल देखते जाएँ। ऐसा करने पर धीरे-धीरे विचार कम होते जाएँगे। मन शांत होने लगेगा। यह अभ्यास एक मिनट तक करते जाएँ।
- आत्म-साक्षात्कार: धीरे-धीरे विचार कम होते हुए अन्त में एक चेतन्य ही रह जाएगा। एक ऐसी अवस्था, जहाँ केवल ज्ञान व स्थिरता के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं होगा। वहीं आप का वास्तविक स्वरूप है। इसे हम आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। कुछ समय इस अवस्था में ही स्थिर रहें। (दो मिनट)
- शुभ संकल्प: निस्वार्थ भाव से लोक-कल्याण के कार्य करने की भावना अपने मन में लाएँ। मन में भाव लाएँ कि सबका मंगल हो, सभी स्वस्थ रहें। सबका भला हो। इन भावों को बार-बार दोहराते हुए यह शुभ संकल्प लें कि मैं प्रतिदिन परोपकार का कार्य अवश्य करूँगा। (एक मिनट)
गहरा श्वास भरें। ओउम् की ध्वनि के साथ क्रिया को विराम दें। दोनों हाथों की उँगलियों को आँखों पर फेरते हुए आँखें खोलें।
नोट:
केंद्र में ध्यान का अभ्यास 10 मिनट का करवाएँ। निर्देश देने के बाद प्रत्येक अवस्था में शिक्षक शांत रहें। व्यक्तिगत साधना में धीरे-धीरे ध्यान के अभ्यास का समय बढ़ाते जाएँ।
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