क्षमा समान न तप, सुख नहीं संतोष समान।
तृष्णा समान नहीं व्याधि कोई, ईर्ष्या न दया समान॥
संतोष से परम सुख है। महर्षि पतंजलि ने संतोष को चित्त-वृत्तियों को निर्मल और अनुशासित करने के उपाय के रूप में सम्मिलित किया है। उन्होंने नैतिक बल को प्राप्त करने के पाँच नियम बताए हैं, जिनमें से एक है – संतोष।
संतोष से परम सुख है: संतुष्टि – मन का तृप्त हो जाना
संतोष वैराग्य का नहीं, बल्कि अनुराग का भाव है। संतोष का शाब्दिक अर्थ है संतुष्टि, मन का तृप्त हो जाना। हमारे समय की भी परिस्थितियाँ हैं, उन्हें स्वीकार करना ही मन का प्रसन्न रहना है। अमूमन नज़र आता है कि जब हम दूसरों से तुलना करते हैं। तुलना की आदत पर अंकुश, संतोष प्राप्ति की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
जीवन में जो, जैसा मिले, उसी से प्रसन्न रहने का भाव संतोष है। संतोष जीवन का दैवीय गुण है, जो व्यक्ति और समाज दोनों के लिए हितकर है। आज के आपाधापी भरे युग में संतोष का महत्व और अधिक बढ़ गया है। ईर्ष्या, द्वेष, हिंसा, छल-प्रपंच में लिप्त मनुष्य के पास अपार भौतिक साधन हैं, फिर भी वह भीतर से अशांत रहता है। आज यदि संसार में सबसे अधिक धनी व्यक्ति बन जाए, लेकिन संतोष ऐसा गुण है जो आज भी सामाजिक सुख-शांति का आधार बन सकता है।
असंतोष और लालसा ने आज मानवीय मूल्यों को उपेक्षित कर दिया है। ये चारों ओर अशांति बढ़ा रहे हैं। वह स्वयं अधिक से अधिक धन कमाकर संसार का सबसे अमीर व्यक्ति बनना चाहता है। यश, ओहदा और ज्ञान की दौड़ जीवन का उद्देश्य बन गए हैं। इच्छाओं का अंत नहीं। तृष्णा कभी शांत नहीं होती और असंतुष्टि की दौड़ कभी खत्म नहीं होती। जो किसी भी तरह की दौड़ में लगे रहते हैं, वे कभी संतुष्ट नहीं रह सकते।
स्वर्ण पदक एक अद्भुत चीज़ है। यदि इसके बिना कोई संतुष्ट नहीं हो तो पाकर भी संतुष्ट नहीं हो सकता। वास्तव में, वह सुखद है, जो संतुष्ट है।
मनुष्य महत्त्वाकांक्षी प्राणी है। वह जीवन-पर्यन्त अपनी इच्छाओं की पूर्ति में लगा रहता है। जैसे ही एक इच्छा की पूर्ति होती है, दूसरी इच्छा उसके मन में जन्म ले जाती है। ये इच्छाएँ उसके दुःख का कारण बनती हैं।
उपचार है ‘संतोष’। संतोष से सुख और शांति मिलती है। संत कबीर ने कहा है:
गो धन, गज धन, बाजि धन
और रतन धन खान,
जब आवे संतोष धन,
सब धन धूरि समान॥
और यह वास्तविकता है कि जब हम संतुष्ट होते हैं, तब शांत रहते हैं। महाभारत में बताया गया है कि अप्राप्य वस्तु के लिए चिंता न करना, प्राप्य वस्तु में सम रहना – यही संतोष है।
महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं रह सकता। अधिक से अधिक पाने की लालसा ईर्ष्या, द्वेष, अशांति, तनाव, बेचैनी और असंख्य रोगों को जन्म देती है। हमें आत्म-चिंतन करना होगा, जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलना होगा, मन की साधना करनी होगी। इससे संतोष प्राप्त होगा। संतोष बहुत सुख है। लालच के वशीभूत होकर व्यक्ति दिन-रात अधिकाधिक पाने का प्रयत्न करने लगता है। मन की यह चंचलता कभी समाप्त होने वाली नहीं है। इससे असंतुष्टि पैदा होती है, जो मनुष्य की अनेकता को नष्ट कर चलने के लिए उकसाती है। संतोषी व्यक्ति की कामनाओं का अंत हो जाता है और वह आनंदमय जीवन व्यतीत करने लगता है।
संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा:
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