उपवास: क्यों और कैसे – सभी जानते हैं कि लोग आहार-विहार की गलती से कई रोगों से पीड़ित हो जाते हैं। जरूरत से अधिक खाने, बिना चबाए जल्दी-जल्दी निगलने से, पर्याप्त मात्रा में जल, तत्व एवं आहार में रेशेदार भोजनों में सम्मिलित न होने के कारण अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। हमें कभी जुकाम, कभी सिर दर्द तथा कभी अन्य रोग हो जाया करते हैं। ये सूचित करते हैं कि शरीर का काम ठीक नहीं चल रहा है। इसी स्थिति के चलते रहने पर जवानी में ही बुढ़ापा आ जाता है। मुख सूखना, मलावरोध रहना, कन्धों पर झुर्रियाँ, स्वर में भारीपन, दाँत गिरना और सिर के बाल सफेद तथा स्वभाव में रूखापन आ जाता है। स्त्रियों में मासिक धर्म की अनियमितता रहने लगती है तथा प्रदर आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
उपवास: क्यों और कैसे – Fasting: Health Benefits of Fasting
यदि हम इन रोगों के कारणों पर विचार करें तो पता चलता है कि घरेलू झंझटों के कारण कार्यभार और चिंतन इतने रहते हैं कि समय पर खाने और समय पर शौच जाने तक की फुर्सत नहीं मिलती। अक्सर खाना बिना चबाये जल्दी-जल्दी निगल लिया जाता है, जो पेट में पहुँचकर सड़ जाता है। जब उसकी सड़न रक्त में पहुँचने लगती है तो अनेक रोग जन्म ले लेते हैं।
इन रोगों के लिए रोगी डॉक्टर के पास जाता है। वहाँ से दवाइयाँ के बोरे और आराम करने की हिदायत मिल जाती है। डॉक्टरों का रोगियों को खुश रखने के लिए यह कहना कि आप कार्याधिक्य के कारण बीमार पड़ गए हैं, प्रायः निराधार होता है। यह भी और ही चीज रहती है। अब प्राकृतिक चिकित्सकों ने यही फैसला किया कि गलत खान-पान के कारण आपका शरीर विष से भर गया है, जिससे मुक्ति के लिए उपवास आवश्यक है।
कट्टरपंथियों के दिमाग में यह घुसा हुआ है कि दिन में चार-पाँच बार खाना ही ठीक है। उनके मत में एक-दो दिन अथवा अधिक दिन का उपवास करना मृत्यु को बुलाना है। इस तरह की धारणा में परिवर्तन करना होगा। जिनका काम अभी चल रहा है, उनको तो जाने दीजिए, लेकिन जो अस्वस्थ हैं, उन्हें तो कुछ दिन के लिए भोजन को नमस्कार करना पड़ेगा। उसी के बाद धीरे-धीरे संतुलित भोजन पर आना होगा।
कठिनाइयाँ किन के लिए:
उपवास करने में दिक्कत का अनुभव तो जरूर होता है, लेकिन इससे घबराने एवं नहीं कि हम छोटे-छोटे उपवासों को भी करना छोड़ दें। मन में उपवास के लिए निश्चय होना चाहिए और साथ ही, पालन करने के लिए मन में उत्साह एवं श्रद्धा हो, ताकि उपवास करने में शरीर एवं मन पर कम से कम जोर पड़े।
धर्मग्रन्थों ने अपनी-अपनी पुस्तकों में उपवास के दिन नियत किए हैं। खास करके हिन्दुओं के यहाँ तो अनेक दिन, एकादशी आदि नियत हैं। किंतु जरूरी नहीं कि उन्हीं दिनों उपवास किया जाए। उपवास कभी भी अथवा किसी भी तिथियों व दिनों में किया जा सकता है।
उपवास का महत्व:
उपवास शुरू होने पर वजन घटने लगता है क्योंकि शरीर में शक्ति कायम रखने के लिए प्राण-शक्ति शरीर में संचित हुए भोजन को गलाती है। स्वाभाविक रूप से शरीर संचालन में जिन तत्त्वों का कम महत्व है, पहले उन्हीं पर उपवास का हमला होता है।
इस प्रकार, पहले-पहले मोटापे (वसा) पर ही उपवास आक्रमण होता है। अतिरिक्त चरबी के कारण ही हृदय मंद तथा शरीर कोढ़िल हो जाता है। नया भोजन न करने से शरीर में वसा का एकत्रीकरण नहीं होता। इसलिए बहुत दिनों की जमा हुई दूषित वसा जलने लगती है, जिससे मोटापा घटता है और शरीर स्वास्थ्य की ओर बढ़ता है।
उपवास के आवश्यक नियम:
उपवास में सुबह 1 कि.ग्रा. गुनगुना पानी का एनीमा अवश्य लें और गुदा के पिछले भाग को खूब भली-भाँति धोते रहें। ऐसा करने से जो पाचन-प्रणाली में सड़ा हुआ विष पुनः रक्त में मिलकर शरीर को और भी गंदा बना देता, क्योंकि कोई भोजन ठोस तो रहता नहीं कि अपने आप दस्त हो जाए। दिन भर में दो-तीन कि.ग्रा. पानी नींबू मिलाकर अवश्य पीते रहिए। दो-तीन दिन से अधिक बिना भूख मरे न लें। यदि उपवास से अधिक तकलीफ हो तो किसी भी फल, तरकारी का रस लेना चाहिए। फल, तरकारी ताज़ा होना जरूरी है।
रोजाना सुबह धूप में 15 से 30 मिनट नंगे बन्द रहने के बाद खूब मल-मल कर नहाना चाहिए ताकि शरीर से पसीने के रूप में निकला हुआ मल साफ होकर रोमकूप खुल जाएँ और स्वाभाविक रीति से साँस ले सकें और छोड़ सकें। अधिक से अधिक समय खुले मैदान में बिताना और गहरी साँस लेना चाहिए।
उपवास बनाम भूखे रहना:
लोग हमेशा समझने में गलती कर बैठते हैं कि रोग निवारक उपवास और भूखे रहना एक ही है। ये दोनों भिन्न हैं। जब शरीर की भोजन की आवश्यकता हो, उस समय भोजन न देना भूखे रहना है और शरीर में इकट्ठे हुए दूषित पदार्थों को निकालने के लिए भोजन छोड़ देना उपवास है। उपवास के बाद के सभी मल निकास मार्ग अर्थात् गुदा, त्वचा और फेफड़े पहले से कुछ गुणा शुद्धता और सक्रिय हो जाते हैं।
जब शरीर को बाहर से भोजन नहीं मिलता है तो शरीर में संचित भोजन का ही इस्तेमाल होने लगता है। इसलिए रोग निवारक उपवास जरूरत से अधिक दिनों तक जारी नहीं रखना चाहिए। अनावश्यक उपवास से शरीर तंतु कमजोर और नष्ट भी हो सकते हैं। कभी-कभी कमजोरी का अहसास हुआ होता है। यह कमजोरी विषाक्त द्रव्य से लदे हुए शरीर के कुछ हल्का और संतुलित होने की प्रक्रिया के कारण मालूम होती है। लेकिन उपवास के बाद नए तंतुओं में स्वाभाविक तेज आ जाता है और वे अधिक सशक्त हो जाते हैं।
गृहिणी उपवास के महत्व को समझ कर यदि उपवास करने पर राजी हो जाए तो उसे हर प्रकार की मदद देनी चाहिए। उपवास के संबंध में निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:
- उपवास के दिनों में रात को व्यक्ति को जल्दी से जल्दी सो जाना चाहिए और रात में अबाधित नींद लेनी चाहिए। साथ ही, यौन-संयम बरतना चाहिए।
- हमेशा अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए। ताजे फलों के अथवा तरकारी के रस पीना चाहिए। यदि मौसमी, नींबू, संतरा, टमाटर आदि अम्ल रस न पिए जा सकें तो इसके बदले एक गिलास गर्म पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर लेना चाहिए। लेकिन शहद मिला हुआ पानी दिन में केवल तीन ही बार लेना चाहिए। शेष समय शुद्ध जल अथवा फल या तरकारी का रस लें।
- यह स्मरण रखना चाहिए कि उपवास प्रथम दो-तीन दिन ही कष्टदायक होता है। कभी-कभी बुखार, मितली, सिर दर्द आदि होता है, लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं। यह उपद्रव अपने आप चले जाते हैं।
- एक उपवास पाँच से सात दिन का हो तो सर्वाधिक लाभ होता है।
- उपवास के बाद जूस, उबली सब्जी, दलिया लेना चाहिए तथा अन्न कम खाना चाहिए।
उपवास के बाद यदि संभव हो तो एक समय में एक ही खाद्य लेना चाहिए। उपवास समाप्ति सावधानी के साथ करें, खासकर पाचक तंत्र को तोड़ना चाहिए और धीरे-धीरे फल और दूध, फिर इसके बाद अपना भोजन। उसका क्रम इस प्रकार हो:
- सुबह: दूध या फल।
- दोपहर: गेहूँ समेत आटे की रोटी अथवा कण समेत (साबुत) चावल (unpolished), सलाद, तरकारी (पकी हुई)।
- शाम: यही भोजन रखना चाहिए और संभव हो तो केवल फल अथवा दूध रखें।
यह ख्याल रखें कि भोजन में 80% क्षार और 20% अम्ल होना चाहिए। अम्ल की मात्रा बढ़ने से रक्त पुनः अम्लमय हो जाता है और रोग का आक्रमण हो सकता है। ये अन्न: 40% फल, 35% हरी सब्जियाँ (कच्ची अथवा पकी हुई), 15% अन्न और 10% दूधजन्य खाद्य, सूखे मेवे आदि। यदि दूध का प्रबंध न हो सके तो दाल और सोयाबीन लेना चाहिए। इससे उत्तम प्रोटीन होता है। यदि मिल सके तो हरे मटर, चना, सेम आदि दालों के बदले लिए जा सकते हैं। इनका प्रोटीन श्रेष्ठ होता है।
जो लोग उपवास न कर सकें, उन्हें अवश्य ही एक समय में एक ही खाद्य लेना चाहिए। इससे शरीर शुद्ध तो नहीं होता लेकिन फिर भी शोधन का इसका अधिक सरल कोई जरिया नहीं है। कम से कम एक सप्ताह तो इस प्रकार अवश्य ही रहना चाहिए। इससे सरलता से अपने शरीर को सुंदर, स्वस्थ और सुडौल बना सकते हैं।
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