समझिए भारत और दुनिया भर में क्यों शुरू हुई इसे हटाने पर बहस
सेफ हार्बर एक ऐसा कानूनी संरक्षण है, जिसके तहत इंटरनेट प्लेटफॉर्म अपने यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट या उनकी गतिविधियों के लिए स्वतः जिम्मेदार नहीं माने जाते। भारत में यह सुरक्षा आईटी एक्ट 2000 की धारा 79 के तहत दी गई है।
क्या है ‘सेफ हार्बर’ कानून, जिसके तहत फेसबुक-गूगल को मिल रखी है छूट?
प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो को फेसबुक से कुछ दिनों के लिए हटाए जाने पर संसदीय समिति ने मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग को 3 दिन में माफ माँगने को कहा है। समिति ने कहा है कि अगर जुकरबर्ग माफी तय वक्त में नहीं माँगते हैं तो फेसबुक अपनी सेफ हार्बर सुरक्षा रद्द किया जा सकता है।
दरअसल अब मेटा, गुगल जैसे प्लेटफॉम सिर्फ मध्यस्थ ही भूमिका में ही नहीं रहे हैं, ये इससे आगे बढ़ कर कंटेंट को रोकने, बढ़ावा देने जैसे काम भी करने लगे हैं। ऐसे में इनकी जवाबदेही भी बढ़ जाती है।
पीएम मोदी के वीडियो का मामला
सूचना और आईटी समिति ने चेतावनी दी है कि अगर 3 दिनों के अंदर उसकी बात पर अमल नहीं किया गया तो फेसबुक की सेफ हार्बर सुरक्षा को रद्द करने पर सरकार विचार कर सकती है। इससे फेसबुक के अधिकारियों को आपराधिक अभियोजन का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि ऐसा करने पर कंपनी के अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज किया जा सकता है।
यह विवाद पीएम मोदी के 23 जुलाई 2026 के देर रात जारी किए गए वीडियो को लेकर शुरू हुआ है। इसे पीएम मोदी ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था और बाद में फेसबुक पर इसे शेयर किया गया। ये वीडियो सेल्फी शैली में बनाई गई थी। इसे फेसबुक पर 5 घंटे के लिए ‘गायब’ कर दिया गया था।
इस मामले में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे की अध्यक्षता में सूचना और आईटी समिति बनाई गई जिसने मेटा, एक्स, गुगल और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के अधिकारियों के साथ बैठक की। इसमें मेटा के अधिकारियों ने माना की ये तकनीकी गड़बड़ी की वजह से पीएम मोदी का वीडियो प्लेटफॉर्म से कुछ देर के लिए हट गया था। अधिकारियों ने इसके लिए खेद जताया, लेकिन समिति और सरकार ने खेद जताने को नाकाफी माना।
सूचना प्रौद्योगिकी और संचार समिति ने पीएम के वीडियो को हटाए जाने को ‘लोकतंत्र पर हमला’ करार दिया और कहा है कि मेटा इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करे। इसके अलावा जुकरबर्ग खुद माफी माँगें और वह भी 3 दिनों के भीतर।
सेफ हार्बर क्या है?
सेफ हार्बर सुरक्षा एक ऐसा कानूनी संरक्षण है, जिसके तहत इंटरनेट प्लेटफॉर्म (Intermediaries) अपने यूजर्स द्वारा पोस्ट किए गए कंटेंट या उनकी गतिविधियों के लिए स्वतः जिम्मेदार नहीं माने जाते। भारत में यह सुरक्षा आईटी एक्ट 2000 की धारा 79 के तहत दी गई है।
इसका मतलब यह नहीं कि प्लेटफॉर्म कानून से ऊपर हैं, बल्कि इसका मतलब है कि यदि वे केवल प्लेटफॉर्म हैं और कानून का पालन करते हैं, तो उन्हें हर यूजर के हर काम के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता। यानी सेफ हार्बर कानूनी रूप से वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म्स को कानूनी दायित्वों से बचाती है, ताकि यूजर के साझा किए गए कंटेंट के लिए उसे उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सके।
दरअसल यह ऑनलाइन नेविगेशन को प्रोत्साहित करने के लिए इंटरनेट के शुरुआती सालों में शुरू किया गया था, जिससे प्लेटफॉर्म्स बेवजह की कानूनी पचड़ों से बच सकें। इस ख्याल से सेफ हार्बर सुरक्षा काफी अहम है, क्योंकि इसकी वजह से साइटों पर यूजर के द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के मामले में आपराधिक कार्रवाई नहीं हो सकती।
अमेरिका में सेफ हार्बर को संचार अधिनियम 1934 की धारा 230 के तहत शामिल किया गया। इसे 1996 में नए प्रावधान के साथ जोड़ा गया, जबकि भारत में इसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 79 के तहत जोड़ा गया है।
इसके मुताबिक, यदि कंपनियाँ भारत सरकार और कोर्ट के तय नियमों का पालन करती हैं, तो यूजर के गैरकानूनी पोस्ट के लिए उन्हें उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता और उन पर कोई केस नहीं होता है। हालाँकि भारत नए आईटी अधिनियम 2021 के संशोधन के जरिए आपत्तिजनक और डीपफेक कंटेंट को हटाने को लेकर सख्त है और इसके लिए 36 घंटे का वक्त मुकर्र की जाती है। भारतकी खबरें
प्रकाशक और मध्यस्थ में क्या अंतर है?
पब्लिशर यानी प्रकाशक वह होता है जो कंटेंट का चयन करता है, उसका संपादन करता है और उसका प्रकाशन करता है। जैसे कोई न्यूज चैनल या अखबार अपनी खबरें खुद बनाते हैं, संपादन करते हैं और दिखाते या छापते हैं। ऐसे स्थिति में उस कंटेंट के लिए वह खुद जिम्मेदार है। इसलिए झूठी खबर छपती या दिखाई जाती है तो उसकी जिम्मेदारी पब्लिशर की होती है।
वहीं Intermediary यानी मध्यस्थ की भूमिका अलग होती है। वह केवल प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराता है, जैसे- इंस्टाग्राम, फेसबुक, गुगल, एक्स, यूट्यूब, टेलीग्राम आदि के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल यूजर करते हैं यानी मध्यस्थ कंटेंट बनाते नहीं हैं, बल्कि यूजर्स द्वारा अपलोड किए गए कंटेंट को होस्ट करते हैं। इसी कारण इन्हें सेफ हार्बर मिलता है।
अब सवाल ये उठता है कि कंपनियाँ जब एग्लोरिदम के जरिए खास कंटेंट को तवज्जो देती है उसे आगे बढ़ाती है और पैसे कमाती है तो उनकी भूमिका सिर्फ मध्यस्थ की रहती है या वह प्रकाशक की तरह हो जाती है।
भारत में क्या नियम हैं?
भारत में सेफ हार्बर को हटाया भी जा सकता है। यदि कोई प्लेटफॉर्म गैरकानूनी गतिविधि की जानकारी मिलने के बाद भी कार्रवाई नहीं करता है, तो उसका सेफ हार्बर सुरक्षा हटाया जा सकता है। कोर्ट या सरकार के आदेश का पालन नहीं करता या साइबर अपराध को बढ़ावा देता है तो उसका सेफ हार्बर सुरक्षा खत्म किया जा सकता है। भारतकी खबरें
इसका निर्णय सरकार या कोर्ट के आदेश पर हो सकता है। इसके अलावा अगर कोई प्लेटफॉर्म खुद कंटेंट को इस तरह नियंत्रित करने लगे और पैसे कमाने लगे जैसा पब्लिशर करते हैं, तो उसकी सेफ हार्बर सुरक्षा खत्म की जा सकती है। ऐसे में उस प्लेटफॉर्म की ‘कानूनी सुरक्षा कवच’ खत्म हो सकती है।
भारत में आईटी रूल्स 2021 के तहत बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को कई जिम्मेदारियाँ दी गई हैं। प्लेटफॉर्म्स को गवर्नेंस अफसर नियुक्त करना जरूरी है। अगर कोई शिकायत की गई है तो उसे समय पर निपटाना जरूरी है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों के साथ सहयोग करते हुए अगर जरूरत पड़े तो कंटेंट हटाना जरूरी है। बड़े साइबर क्राइम से जुड़ी जानकारी देना भी जरूरी है।
सिर्फ इसलिए नहीं कि अपराध इंस्टाग्राम, फेसबुक या दूसरे प्लेटफॉर्म पर शुरू हुआ। इसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जैसे किसी व्यक्ति ने इंस्टाग्राम पर दोस्ती की और बाद में ऑफलाइन जाकर धोखाधड़ी की, तो प्राथमिक जिम्मेदारी आरोपित की ही होगी। लेकिन यदि शिकायत मिलने के बाद भी प्लेटफॉर्म कार्रवाई न करे, फर्जी अकाउंट बार-बार चलने दे। कोर्ट के आदेश की अनदेखी करे, तो उसके खिलाफ कानूनी एक्शन हो सकता है।
ये पहला मौका नहीं है जब भारत सरकार और किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म के बीच विवाद हुआ हो। इससे पहले भी एक्स, व्हाट्सएप, गुगल और मेटा के साथ कई बार विवाद हुए हैं। आपत्तिजनक कंटेंट हटाने के आदेश से लेकर फेक न्यूज, राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भी कई बार विवाद सामने आए। शाहीन बाग से लेकर किसान आंदोलन में कंटेंट पर सवाल उठे। सरकार द्वारा आईटी नियमों का पालन करने को लेकर कई विवाद सामने आए।
प्रधानमंत्री मोदी के कथित एआई जनरेटेड और मॉर्फ्ड वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाए जाने के मामले में जुलाई 2026 में हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने मेटा इंडिया के हेड अरुण श्रीनिवास और कई सोशल मीडिया यूजर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। पुलिस अब यह जाँच कर रही है कि ऐसे डीपफेक और भ्रामक कंटेंट को रोकने के लिए मेटा ने क्या किया। प्लेटफॉर्म के पास कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम क्यों मौजूद नहीं था।
इसी तरह केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी के मामले में भी हुआ। उनके परिवार पर E-20 पेट्रोल की वजह से लाभान्वित होने वाला डीपफेक एआई जेनरेटेड वीडियो बनाए गए। इसको लेकर उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने गडकरी को मेटा, एक्स गुगल समेत उन सभी प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति दी। साथ ही इन प्लेटफॉर्म्स को सभी ऐसे लिंक हटाने का आदेश दिया।
कई मामलों में कंपनियों ने अदालत का रुख किया, जबकि सरकार ने कहा कि भारत में काम करने के लिए यहां के कानूनों का पालन करना सभी प्लेटफॉर्म के लिए जरूरी है।
सेफ हार्बर को लेकर दुनियाभर में कई विवाद
दुनिया भर में सेफ हार्बर को लेकर विवाद बढ़े हैं। अमेरिकी कानून के तहत सेक्शन 230 के तहत इंटरनेट कंपनियों को सेफ हार्बर सुरक्षा देता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मेटा, गुगल और एक्स पर फेक न्यूज फैलने देने, चुनावों को प्रभावित करने वाले कंटेंट को नहीं रोकने और हेट स्पीच मामले में पर्याप्त कार्रवाई नहीं करने के आरोप लगे। इसकी वजह से रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ने अलग-अलग कारणों से सेक्शन 230 में बदलाव की माँग की।
यूरोपियन यूनियन ने डिजिटल सर्विस एक्ट लागू किया था। इसके जरिए बड़े प्लेटफॉर्म को एल्गोरिद्म में पारदर्शिता रखना, गलत कंटेंट को फटाफट हटाना, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जैसे जिम्मेदारियाँ दी गई थी, यानी सेफ हार्बर के साथ-साथ उनकी जिम्मेदारियाँ भी काफी हैं।
अमेरिका और यूरोपीय संघ के बीच सेफ हार्बर समझौते के तहत डेटा ट्रांसफर को कंट्रोल करने का विवाद भी सामने आया। दरअसल यूरोपीय देशों की आपत्ति थी अमेरिकी एजेंसियाँ आसानी से यूरोप के नागरिकों के डेटा तक पहुँच सकती है यानी उनकी जासूसी हो सकती है। इस पर यूरोपीय संघ की कोर्ट में केस भी दर्ज हुए और इस दौरान कोर्ट ने भी माना कि अमेरिकी कानून यूरोप के नागरिकों की निजी जानकारियों के दुरुपयोग से सुरक्षा प्रदान नहीं करती हैं। इन विवादों के बाद 2015 में यूरोप ने सेफ हार्बर समझौते को रद्द कर दिया था।
ऑस्ट्रेलिया ने मेटा और गुगल से कहा कि यदि वे न्यूज कंटेंट से कमाई करते हैं, तो मीडिया संस्थानों को इसके लिए भुगतान करें। इसके बाद मेटा ने कुछ समय के लिए फेसबुक पर न्यूज शेयरिंग बंद कर दी थी। ये विवाद इसलिए सामने आया क्योंकि जब प्लेटफॉर्म मध्यस्थ की भूमिका में है तो वह प्रकाशक की तरह कंटेंट से कमाई कैसे कर सकता है।
इसके बाद ऑस्ट्रेलिया ने न्यूज कंटेंट के एवज में स्थानीय मीडिया संस्थान को भुगतान करने या डिजिटल विज्ञापन पर 2.5 फीसदी टेक्स चुकाने का प्रस्ताव दिया। कंपनियों को इससे बचने के लिए कम से कम 6 स्थानीय पब्लिशर के साथ बिजनेस समझौते करने होंगे। ये नियम उन प्लेटफॉर्म पर लागू होगा, जिसकी सालाना आय 250 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से अधिक है।
कनाडा ने ऑनलाइन न्यूज एक्ट 2023 लागू कर दिया। 22 जून 2023 को लागू होने के बाद मेटा ने फेसबुक और इंस्टाग्राम पर न्यूज उपलब्ध कराना काफी हद तक बंद कर दिया। दरअसल इस कानून के माध्यम से मेटा, गुगल जैसे प्लेटफॉर्म को शेयर किए जाने वाले न्यूज कंटेंट के लिए मीडिया आउटलेट्स को भुगतान करना अनिवार्य कर दिया गया।
इसके बाद इन प्लेटफॉर्म्स ने न्यूज कंटेंट शेयर करना ही बंद कर दिया। हालाँकि गुगल ने कनाडाई सरकार से समझौता कर पैसे देने की बात मानी, जिसके बाद गुगल पर प्रतिबंध टल गया, लेकिन मेटा पर कनाडा में बैन लगा हुआ है।
ऐसे में पूरी दुनिया इस सवाल से जूझ रही है कि इन प्लेटफॉर्म्स को सेफ हार्बर मिलना चाहिए या नहीं। अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अपने एल्गोरिद्म और कंटेंट रिकमेंडेशन की वजह से सिर्फ मध्यस्थ की भूमिका में ही नहीं रहीं हैं। ये इससे कहीं आगे बढ़ कर पब्लिशर की भूमिका भी निभाने लगी हैं।
अगर ये सिर्फ मध्यस्थ रहें तो उन्हें सेफ हार्बर मिलना चाहिए। लेकिन जब कौन-सा कंटेंट दिखेगा, किसे दिखेगा, किसे बढ़ावा मिलेगा और किससे कमाई होगी जैसी चीजें जुड़ जाती है, तो उनकी जिम्मेदारी भी बढ़नी चाहिए। पीएम मोदी के वीडियो का कुछ घंटों के लिए फेसबुक से हटना-हटाना भी इस तरह का ही मामला है।
Kids Portal For Parents India Kids Network