डॉ मुल्ला आदम अली की कविताओं का संग्रह: Dr. Mulla Adam Ali Short Hindi Poems Collection

डॉ मुल्ला आदम अली की कविताओं का संग्रह: Dr. Mulla Adam Ali Short Hindi Poems Collection

डॉ. मुल्ला आदम अली एक प्रतिष्ठित हिंदी लेखक, ब्लॉगर और साहित्यकार हैं। वह आंध्र प्रदेश के गैर-हिंदी भाषी क्षेत्र से होने के बावजूद हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और बाल साहित्य में अपने योगदान के लिए जाने जाते हैं। आप उनके Official Website पर उनकी रचनाएँ पढ़ सकते हैं।

डॉ मुल्ला आदम अली की कविताओं का संग्रह

  1. जंगल ये जंगल – वनों की कटाई पर कविता
  2. प्रकृति और मनुष्य – प्रकृति के लिए लिखी गयीं हिंदी
  3. न कर छेड़खानी – पर्यावरण संरक्षण के विषय पर
  4. प्रकृति की मुस्कान – पर्यावरण के विषय पर
  5. प्रभात का संदेश
  6. प्रकृति बिना मनुष्य – प्रकृति हमारी सच्ची मित्र है
  7. ऋतुओं के संग-संग – ऋतुओं पर आधारित कविता
  8. भागती ज़िंदगी की चुप्पी – फ़ोन के विषय पर
  9. मोबाइल में कैद ज़िंदगी – मोबाइल और उसमें कैद बचपन
  10. बचपन की वो गलियाँ – बचपन की यादों पर
  11. धरती माँ की पुकार – मातृभूमि पर बाल-कविता
  12. एक बीज की आत्मकथा – बीज के अपने मुँह से सुनिये उसकी कहानी
  13. नदी की व्यथा – एक नदी की आत्मकथा
  14. आख़िरी चिड़िया – वनों की कटाई के कारण जंगलों के साथ-साथ पक्षी भी हो रहे गायब
  15. हवा की शिकायत – वायु प्रदूषण पर कविता
  16. पहाड़ का धैर्य – पहाड़ो को हो रही क्षति के विषय पर आधारित कविता
  17. मिट्टी की महक – मिट्टी के महत्व और जीवन से उसके गहरे जुड़ाव को दर्शाती यह कविता
  18. चाँद की चिट्ठी – आसमान में चमकते चाँद की शीतलता और उसके रूपों का वर्णन

जंगल ये जंगल – वनों की कटाई पर कविता (01)

जंगल ये जंगल, हरियाली का घर,
पेड़ों की छाया, नदियों का स्वर।
पंछी जो चहके, जैसे गीत गाएँ,
हर कोना बोले, बस शांति सुनाएँ।

झरनों की बातें, फूलों की खुशबू,
धरती की गोदी में सजी है सबू।
हिरन की छलांगें, मोर की अदा,
प्रकृति का ये रूप है सबसे जुदा।

नीम, पीपल, साल, बबूल,
खड़े हैं प्रहरी बन, रहते हैं कूल।
जानवर, पक्षी, कीड़े भी यहाँ,
सबका है हिस्सा, सबका है जहां।

पर खतरे में है अब ये जादू भरा,
मानव की लालच ने इसे भी मारा।
कटते हैं पेड़, सिमटती हैं राहें,
घटती हैं साँसें, मिटती हैं चाहें।

संभालो इसे, बचालो इसे,
जंगल की पुकार को सुनो ज़रा।
ये सांसें हैं अपनी, ये जीवन का रंग,
जंगल ये जंगल, है धरती का संग।

प्रकृति और मनुष्य – प्रकृति के लिए लिखी गयीं हिंदी (02)

प्रकृति थी माँ जैसी, निस्वार्थ दी सब कुछ,
हरियाली, नदियाँ, आकाश का खुला रुख।
फूलों की हँसी, चाँदनी की चुप बातें,
हर साँस में बसी थीं उसकी सौगातें।

पहाड़ों की गोदी में झूला झुलाता था,
नदी की लहरों से गीत सुनाता था।
बादल भी बरसते थे सुख-दुख समझकर,
पेड़ भी लगते थे जैसे साया बनकर।

पर मनुष्य ने क्या किया, किस ओर चला?
लोभ में अंधा हुआ, सब कुछ जला चला।
पेड़ कटे, नदियाँ सूखी, मिट्टी भी रूठी,
प्रकृति की ममता पर चल गई छूटी।

अब गर्मी में तपती हैं साँसें यहाँ,
आँधियाँ कहती हैं – “तूने क्या किया?”
बारिश भी डरती है अब गिरने से,
धरती भी कांपती है फिर बिखरने से।

फिर भी प्रकृति चुप है, न गुस्सा, न घाव,
अब भी वो देती है जीवन की छांव।
बस इंसान को समझना होगा अब,
प्रकृति को बाँधो मत, दो उसको सब।

चलो फिर से बोएँ बीज प्रेम के,
संवेदनाओं से सींचें हर एक पेड़ के।
प्रकृति और मनुष्य का हो फिर मिलन,
यही हो धरती पर सच्चा जीवन।

न कर छेड़खानी – पर्यावरण संरक्षण के विषय पर हिंदी कविता (03)

न कर छेड़खानी तू धरती से प्यारे,
ये पेड़ हैं जीवन के सच्चे सहारे।
नदियों की धारा, पवन की रवानी,
सब कहते हैं — “मत कर बेइमानी।”

हरियाली ओढ़े ये धरती सुहानी,
तेरे ही कल की है ये राजधानी।
फूलों की हँसी, पंछियों की ज़बानी,
चुपचाप कहती है — “न कर मनमानी।”

जब तूने काटे वन, उजाड़े पहाड़,
प्रकृति ने दिखाए अपने विकराल वार।
सूखा, बाढ़, आँधी, जलती धूप,
ये उसके आँसू हैं, उसका है रूप।

साँसें भी थमने लगीं हैं अब धीरे,
गरम हो रही हैं हवाएँ क़सके घेरे।
ये तूफ़ान, ये धुंध, ये बीमारियाँ,
तेरी ही करतूतों की हैं कहानियाँ।

अब भी समय है, रुक जा ज़रा,
लगा दे हर कोने में हरियाली का तारा।
संभाल ले इस घर को, सहेज ले जीवन,
वरना खो देगा सबकुछ तू एक दिन।

न कर छेड़खानी इस प्रकृति से यार,
ये ही तेरा कल है, यही तेरा संसार।

प्रकृति की मुस्कान – पर्यावरण के विषय पर हिंदी बाल कविता (04)

सुबह की पहली किरण में जो चमक है,
वो है प्रकृति की मुस्कान की झलक है।
ओस की बूंदों में मोती से भाव,
हर पत्ती पर लिखे हैं उसके सुखदाव।

फूलों की खिलखिलाहट, पंछियों की तान,
हर कोना करता है उसका गुणगान।
हरियाली की चादर, नदियों का गान,
ये सब हैं उसकी प्यारी पहचान।

पेड़ जब लहराते हैं मंद-मंद हवा में,
लगता है जैसे माँ हो दुआ में।
चाँदनी रातें हों या बरसात की बूँदें,
प्रकृति हँसती है, हर दर्द को बुनते।

कभी इन्द्रधनुष बन के आसमान सजाए,
कभी पर्वतों पर बर्फ की चादर बिछाए।
रेत की कहानी हो या समुद्र की तान,
हर रूप में छलके उसकी मुस्कान।

पर जब होता है उस पर वार,
कटते हैं जंगल, बहता है प्यार।
तब उसकी आँखों में दर्द उतर आता है,
मुस्कान भी जैसे चुपचाप छिप जाता है।

चलो फिर से खिलाएँ उसकी वो मुस्कान,
बचाएँ पेड़, नदियाँ और हर प्राण।
प्रकृति को दें हम अपना सम्मान,
ताकि सदा बनी रहे उसकी मुस्कान।

प्रभात का संदेश – कविता (05)

सुबह की प्रकृति है एक कोमल गीत,
हर किरण में बसता है जीवन का मीत।
ओस की बूँदें, जैसे मोती हों धरती पर,
हवा भी चलती है प्रेम की लहर भर।

पंछी चहचहाते हैं स्वागत में प्रभात का,
फूलों से महकता है आँगन दिन के साथ का।
सूरज मुस्काता है पहाड़ियों के पार,
मानो कहता हो — “जग जा अब संसार।”

पेड़ों की शाखों पर नाचते हैं सपने,
हर पत्ता कहता है — “चलो कुछ अपने।”
नदी की कल-कल भी गुनगुनाती है बात,
जैसे कोई माँ सुना रही हो सौगात।

सुबह की ये प्रकृति, शांत, पावन, नई,
हर दिल में भरती है उम्मीदें कई।
जो समझ सके इसकी मौन ज़बान,
उसे मिल जाए जीवन का वरदान।

प्रकृति बिना मनुष्य – प्रकृति हमारी सच्ची मित्र है, जो हमें जीवन, शुद्ध हवा और सुंदरता देती है (06)

बिना मनुष्य के भी थी प्रकृति संपूर्ण,
नदियाँ बहती थीं, थी हरियाली पूर्ण।
पेड़ों की शाखें लहराती थीं मुक्त,
न था कोई शोर, न जीवन था रुग्ण।

पंछी गाते थे अपने ही सुर में,
फूल मुस्काते थे मंद-मंद गुरुर में।
नदियाँ बहती थीं अपनी ही चाल,
धरती थी शांत, आकाश था विशाल।

सूरज उगता था बिना किसी पुकार,
चाँदनी बिखरती थी हर एक द्वार।
जंगलों में था जीवन अनेक रूप,
हर प्राणी था अपने धर्म के अनूप।

फिर आया मनुष्य, विज्ञान का ज्ञान,
पर भूला वो अपनापन, छोड़ बैठा पहचान।
कटे पेड़, बुझे झरने, सन्नाटा छा गया,
प्रकृति थी वहीं, पर कुछ छूटता गया।

अब सोचो — क्या प्रकृति को ज़रूरत है हमारी?
या हमें है ज़रूरत उसकी, साँसों की सारी?
बिना मनुष्य के भी वो थी मुस्कान,
पर बिना प्रकृति के, कहाँ है इंसान?

ऋतुओं के संग-संग – ऋतुओं पर आधारित कविता (07)

सर्दी आई तो बर्फीली चुप्प थी,
हवाओं में ताजगी, रातें ठिठुरती थीं।
हर पेड़ की शाखें बर्फ से ढकी थीं,
सर्दी में भी प्रकृति की मुस्कान अज्ञात थी।

फिर वसंत आया, रंगों का महकता जादू,
फूलों ने अपनी चुप्पियाँ तोड़ी, सब हुआ नयापन।
पक्षी फिर से गाने लगे, हवा में बहकने लगे,
हर कोने में बसी एक नई ताजगी, एक नई उमंग।

गर्मी आई, सूरज ने दिखाया चेहरा तीखा,
धरती तपती रही, जलती लहरें, छांव की दीखा।
पानी की खोज में सृष्टि थी व्याकुल,
फिर भी गर्मी ने दिया एक अलग जीवन का उल्लास।

बारिश आई, बादल घने हो गए,
धरती ने भी अपनी प्यास बुझाई, सागर हुए।
झरने बहे, तालाब भी सजे,
हर कण में प्रकृति ने अपना प्रेम दिया, सबके हिस्से।

ऋतुओं के संग-संग जीवन भी बदला,
प्रकृति ने हमें हर रंग से सजा लिया।
हर मौसम की अपनी एक कहानी है,
हर मौसम से ज़िंदगी को एक नयी राह मिली है।

सर्दी, वसंत, गर्मी, बारिश की राहें,
इनकी धड़कन में बसी हैं जीने की चाहें।
हम भी इनसे कुछ सीखें, जीवन की तरह,
ऋतुओं के संग-संग, बढ़ें हम हर समय।

भागती ज़िंदगी की चुप्पी – फ़ोन के विषय पर बेहतरीन कविता (08)

काँच की दीवारों में कैद है अब जीवन,
भीड़ में रहकर भी है हर दिल अकेला मन।
मोबाइल की स्क्रीन में खो गई है बात,
आँखों से आँखों की वो सच्ची मुलाकात।

हर पल की है जल्दी, हर साँस में दौड़,
पर भीतर से है खाली, जैसे टूटी हो डोर।
विज्ञान ने दिए हैं सुविधा के साधन,
पर छीन लिए अपनापन, रिश्तों के बंधन।

बचपन अब खेलता नहीं मिट्टी में,
वो भी उलझा है किसी ऐप की लिपटी में।
चिड़ियों की चहचहाहट अब सुनाई कहाँ देती है,
कानों में तो बस नोटिफिकेशन बजती है।

प्रकृति पुकारती है, पर हम सुन नहीं पाते,
शहर की चकाचौंध में सब स्वर खो जाते।
धुआँ, ट्रैफिक, भागमभाग की कहानी,
आधुनिक जीवन है, पर बहुत कुछ है बेमानी।

आओ ज़रा रुकें, साँस लें गहराई से,
थोड़ा जिएँ खुद के लिए सच्चाई से।
तकनीक ज़रूरी है, पर दिल भी ज़रूरी,
वरना ये जीवन रह जाएगा अधूरी।

मोबाइल में कैद ज़िंदगी – मोबाइल और उसमें कैद बचपन पर बाल-कविता (09)

एक वक्त था जब बातें दिल से होती थीं,
चिट्ठियों में भावनाएँ खुल के रोती थीं।
अब उंगलियों की हरकत में बसी है दुनिया,
मोबाइल में सिमट गई हर रिश्तों की बुनिया।

सुबह जागते ही स्क्रीन पर नज़र,
रात सोने से पहले वही आख़िरी सफ़र।
घर में सब हैं, पर बात कोई नहीं,
साथ होकर भी साथ कोई नहीं।

खुशियाँ अब इमोजी में बयां होती हैं,
“कैसे हो?” बस स्टेटस से जान ली जाती हैं।
तस्वीरें खिंचती हैं हर पल, हर घड़ी,
पर असली मुस्कान कहीं खो गई बड़ी।

बच्चा हो या बूढ़ा, सब इसमें व्यस्त,
मोबाइल है राजा, और हम उसके दास।
चलते-चलते भी झुकी रहती है गर्दन,
जैसे दुनिया अब है बस उसकी धरपन।

मोबाइल ज़रूरी है, ये मानते हैं हम,
पर उससे ऊपर भी है जीवन का राग-संगम।
थोड़ी बातें, थोड़ी मुलाकातें ज़रूरी हैं,
इन मशीनों से ज़्यादा रिश्ते ज़रूरी हैं।

चलो कभी बिना मोबाइल के भी जिएं,
अपने अपनों से कुछ पल खुलके कहें।
जीवन को फिर से महसूस करें साफ,
मोबाइल में नहीं, दिल में हो असली ग्राफ।

बचपन की वो गलियाँ – बचपन की यादों पर हिंदी बाल-कविता (10)

बचपन की वो गलियाँ, वो मिट्टी की खुशबू,
नंगे पाँव दौड़ना, बारिश में भीगना खूब।
कंचे, लट्टू, पतंगों की उड़ान,
हर खेल में छुपा था कोई अनजान गुमान।

न किताबों का बोझ, न जिम्मेदारियाँ भारी,
हर दिन था उत्सव, हर शाम थी प्यारी।
रूठना मनाना, फिर गले लग जाना,
बिना मतलब के भी घंटों बतियाना।

माँ की गोद में दुनिया बस जाती थी,
पिता की उँगली थाम, हिम्मत आ जाती थी।
एक चॉकलेट पर हो जाती थी दीवानगी,
छोटे-छोटे ख्वाबों में बसती थी ज़िंदगी।

ना मोबाइल, ना नेट का जाल,
फिर भी दिलों में था सच्चा हालचाल।
अब तो बचपन जैसे कहीं खो गया है,
वो मासूम हँसी, बस यादों में रह गया है।

काश लौट आए वो पल सुहाने,
जहाँ न था दिखावा, न झूठे बहाने।
बस दिल से जिया करते थे हम,
बचपन था जैसे खुद में एक मौसम।

धरती माँ की पुकार – मातृभूमि पर सुंदर बाल-कविता (11)

धरती माँ आज बहुत उदास है,
सूनी उसकी हर एक साँस है।
कहीं कटते वन, कहीं सूखी धार,
सुनो मनुष्य! उसकी करुण पुकार।

जिस आँचल में जीवन पलता था,
हर मौसम हँसकर खिलता था।
वही आँचल अब फटा हुआ है,
हर सपना जैसे बिखरा हुआ है।

नदियाँ रोती हैं चुपके-चुपके,
पहाड़ खड़े हैं सहमे-सहमे।
पक्षी ढूँढ़ें अपना आशियाना,
कहाँ मिलेगा उनको ठिकाना?

धुआँ निगल रहा नीला अम्बर,
जलता जाता है वन का अंतर।
लोभ की आग में अंधा इंसान,
भूल गया धरती का सम्मान।

धरती माँ फिर भी मौन खड़ी है,
ममता उसकी आज भी बड़ी है।
हर मौसम में देती उपहार,
फिर भी सहती रहती प्रहार।

आओ मिलकर प्रण यह लें,
हर आँगन में पौधे रोपें।
जल, जंगल और भूमि बचाएँ,
जीवन के सच्चे गीत सुनाएँ।

धरती माँ फिर मुस्काएगी,
हरियाली फिर लौट आएगी।
जब प्रेम से उसको अपनाएँगे,
तभी भविष्य सुरक्षित पाएँगे।

एक बीज की आत्मकथा – बीज के अपने मुँह से सुनिये उसकी कहानी (12)

मैं एक नन्हा-सा बीज था,
मुट्ठी भर मिट्टी में सिमटा था।
न कोई पहचान, न कोई नाम,
बस जीवन का था एक पैगाम।

धरती माँ ने गोद में सुलाया,
बारिश ने आकर मुझे जगाया।
सूरज ने किरणों का हाथ बढ़ाया,
पवन ने मुझको गीत सुनाया।

धीरे-धीरे अंकुर फूटा,
जीवन ने फिर नया रूप लूटा।
नन्ही पत्तियाँ मुस्काईं मेरी,
हर सुबह बनी नई सवेरी।

काँटों ने भी राह दिखाई,
आँधियों ने हिम्मत सिखलाई।
धूप ने तपकर शक्ति दी,
संघर्षों ने सच्ची भक्ति दी।

आज मैं एक विशाल वृक्ष हूँ,
जीवन का सच्चा साक्ष्य हूँ।
थके पथिक को छाया देता,
भूखे को मीठा फल देता।

पंछी मेरे घर में गाते,
बच्चे हँसते, झूले झूल जाते।
मेरी शाखों पर बसती आशा,
मुझमें धड़कती जग की भाषा।

मैंने सीखा जीवन का सार,
देना ही सबसे बड़ा उपहार।
जो खुद मिट्टी में मिल जाता है,
वही संसार को हरियाली दे जाता है।

इसलिए हे मानव! इतना जान,
छोटा मत समझ किसी की पहचान।
एक बीज में छिपा है वन सारा,
उसी से महके जग यह हमारा।

नदी की व्यथा – एक नदी की आत्मकथा (13)

मैं पर्वत की गोदी से निकली,
निर्मल जल की धारा बन निकली।
कल-कल करती गीत सुनाती,
धरती की प्यास सदा बुझाती।

खेतों में हरियाली लाई,
सूखी मिट्टी में जान जगाई।
पशु-पक्षी सब मेरे अपने,
सबके जीवन से जुड़े थे सपने।

कभी मुझे गंगा कहकर पूजा,
कभी माँ कहकर शीश नवाया।
पर धीरे-धीरे बदल गया मन,
स्वार्थ ने छीन लिया अपनापन।

कूड़े-कचरे से भर दी काया,
ज़हर का मुझको घूँट पिलाया।
कारखानों का काला पानी,
बन बैठा मेरी दुखभरी कहानी।

मछलियाँ तड़प-तड़प मरती हैं,
लहरें भी अब आँसू भरती हैं।
किनारे सूने, मौन हवाएँ,
किससे अपनी पीर सुनाएँ?

फिर भी बहना मेरा धर्म है,
जीवन देना ही मेरा कर्म है।
मैं आज भी यही पुकार रही,
मानवता को आवाज़ दे रही।

मुझको फिर से निर्मल कर दो,
मेरे जल को फिर अमृत कर दो।
नदियाँ बचेंगी तो कल बचेगा,
तभी तुम्हारा भविष्य सजेगा।

धरती फिर मुस्कान बिखेरेगी,
हर फसल खुशी से लहरेगी।
जब नदी बहेगी स्वच्छ, निश्छल,
तभी रहेगा जीवन उज्ज्वल।

आख़िरी चिड़िया – वनों की कटाई के कारण जंगलों के साथ-साथ पक्षी भी हो रहे गायब (14)

सुबह-सुबह जब सूरज जागा,
आकाश ने सुनहरा आँचल बाँधा।
मैं उड़ निकली पंख पसारे,
सपनों के अनगिन उजियारे।

कभी बसी थी हर इक डाली,
हर बगिया थी मेरी साली।
नीम, पीपल, बरगद, आम,
सब थे मेरे अपने धाम।

अब न जंगल, न वह ठिकाना,
कहाँ बनाऊँ अपना घराना?
कटते वन और बढ़ते शहर,
हर ओर दिखता धूल का कहर।

बच्चे अब पहचान न पाते,
मेरे गीत कहाँ सुन पाते?
मोबाइल की झिलमिल दुनिया,
भूल गई मेरी मधुर बुनिया।

मैं पूछ रही हूँ हर इंसान से,
क्या बैर था मेरी पहचान से?
मैंने तो बस गीत सुनाए,
जीवन के मधुर सुर सजाए।

यदि मैं भी इस जग से जाऊँ,
किसको अपना दर्द सुनाऊँ?
कौन सुनाएगा प्रभात का राग,
कौन मिटाएगा मन का विराग?

आओ फिर से वृक्ष लगाएँ,
सूने वन फिर से बसाएँ।
हर डाली पर जीवन आए,
हर आँगन चिड़िया मुस्काए।

याद रहे यह छोटी बात,
प्रकृति ही जीवन की सौगात।
जब तक पंखों की तान रहेगी,
धरती पर मुस्कान रहेगी।

हवा की शिकायत – वायु प्रदूषण पर कविता (15)

मैं शीतल पवन, प्रकृति की साँस,
जीवन का हूँ मधुर अहसास।
पहाड़ों से मैदानों तक,
ले जाती हूँ खुशियों की महक।

कभी फूलों की सुगंध सजाती,
कभी बादल को राह दिखाती।
धान की बालियाँ संग झूमती,
हर डाली को चूमती-घूमती।

पर अब मेरा मन घबराता है,
हर पल दम-सा घुट जाता है।
धुएँ की चादर ओढ़े नगर,
कैसे करूँ मैं अपना सफ़र?

कारखानों का काला धुआँ,
वाहनों का बढ़ता शोर यहाँ।
ज़हर घुला है मेरी चाल में,
दर्द भरा है हर एक ताल में।

बच्चे भी अब खाँस रहे हैं,
बूढ़े साँसें गिन रहे हैं।
नीला गगन धुँधला पड़ता,
हर मौसम अब बदला लगता।

मैं तो जीवन देने आई,
क्यों मुझमें विष तुमने मिलाई?
क्या इतना भी याद नहीं,
बिना हवा के जीवन कहीं?

आओ फिर से वृक्ष लगाएँ,
धरती को फिर स्वर्ग बनाएँ।
निर्मल होगी मेरी रवानी,
फिर लौटेगी खुशियों की कहानी।

मैं फिर गीत सुनाऊँगी,
हर उपवन महकाऊँगी।
जब तुम मुझसे प्रेम करोगे,
जीवन का सम्मान करोगे।

पहाड़ का धैर्य – पहाड़ो को हो रही क्षति के विषय पर आधारित कविता (16)

मैं पर्वत हूँ, अडिग खड़ा हूँ,
सदियों से यहीं अड़ा हूँ।
धूप मिली तो धूप सही,
तूफ़ानों से भी डरा नहीं।

बर्फ़ गिरी तो मुस्काया मैं,
बारिश आई, गुनगुनाया मैं।
नदियों को जन्म दिया मैंने,
वन का जीवन जिया मैंने।

पक्षी मेरे मित्र पुराने,
बादल मेरे अपने दीवाने।
सूरज हर दिन मिलने आता,
चाँद मुझे लोरी सुनाता।

लेकिन अब मैं मौन हुआ हूँ,
भीतर से कमजोर हुआ हूँ।
पत्थर-पत्थर तोड़ा जाता,
सीना मेरा रोज़ छलनी होता।

खनन की गहरी चोटें खाकर,
मैं भी रोता हूँ छिप-छिपकर।
जंगल मेरे सूने होते,
झरने भी अब कम ही बहते।

फिर भी मैंने धैर्य न छोड़ा,
जीवन से रिश्ता न तोड़ा।
सिखलाता हूँ हर इंसान को,
मत हारो तुम तूफ़ानों से।

जो संकट में अडिग रहेगा,
वही सफलता तक पहुँचेगा।
धैर्य ही सबसे बड़ी शक्ति है,
यही जीवन की सच्ची भक्ति है।

आओ पर्वत का मान करें,
प्रकृति का सम्मान करें।
तभी सुरक्षित होगा कल,
तभी रहेगा जीवन सफल।

मिट्टी की महक – मिट्टी के महत्व और जीवन से उसके गहरे जुड़ाव को दर्शाती यह कविता (17)

मिट्टी की सौंधी-सी खुशबू,
मन में भर दे नई आरज़ू।
पहली बारिश की हर बूँद संग,
जाग उठता है जीवन का रंग।

इसी मिट्टी से तन है अपना,
इसी से जुड़ा हर एक सपना।
यहीं जन्म, यहीं पर खेला,
यहीं सजा जीवन का मेला।

कुम्हार के हाथों में आकर,
घड़ा बनी मैं रूप सँवारकर।
किसान के हल से मुस्काई,
अन्न बनकर जग को खिलाई।

शिल्पी ने मुझमें मूर्ति गढ़ी,
दीपक बन हर चौखट चढ़ी।
हर घर-आँगन मेरा नाता,
मुझसे ही जीवन का रिश्ता।

लेकिन आज मैं रोती हूँ,
अपने घाव स्वयं ढोती हूँ।
ज़हरीले रसायनों की मार,
छीन रही मेरी पहचान।

बंजर होती जाती धरती,
सूख रही जीवन की सरगम।
यदि मिट्टी बीमार हुई तो,
कैसे महकेगा यह उपवन?

आओ फिर जैविक राह चुनें,
धरती के घावों को हम बुनें।
मिट्टी को फिर माँ-सा मानें,
उसके ऋण को जीवन जानें।

मिट्टी केवल धूल नहीं है,
जीवन का मूल यही है।
जिसने इसका मान किया है,
उसने सच्चा सम्मान किया है।

चाँद की चिट्ठी – चमकते चाँद की शीतलता और उसके रूपों का वर्णन (18)

एक रात चुपके से चाँद ने,
भेजी मुझको एक चिट्ठी।
चाँदी जैसे उजले अक्षर,
भरी हुई थी उसमें सृष्टि।

लिखा – “मैं हर रात निकलता,
सबके मन का हाल समझता।
कहीं किसी की आँख नम है,
कहीं किसी का सपना कम है।

किसी किसान की सूखी धरती,
किसी माँ की सूनी आँखें।
किसी सैनिक की जागती सीमा,
किसी बच्चे की भोली बातें।

मैंने देखा नगर की दौड़,
रिश्तों में बढ़ती खामोशी।
मोबाइल की जगमग दुनिया,
छीन रही मन की मधुरता।

पेड़ों से अब बातें करना,
नदियों का संगीत भी सुनना।
फूलों की मुस्कान पढ़ लेना,
पक्षियों का विश्वास न छीनना।

यदि धरती को स्वर्ग बनाना,
पहले मन को स्वच्छ बनाना।
प्रेम, दया और सत्य अपनाना,
हर प्राणी को अपना मानना।

मैं तो केवल राह दिखाता,
उजियारा बन साथ निभाता।
सच्चा चाँद तो मन के भीतर,
उसे कभी मत धूमिल करना।“

चिट्ठी पढ़कर मन भर आया,
जीवन का अर्थ समझ में आया।
प्रेम जहाँ हो, करुणा होगी,
वहीं सदा चाँदनी रहेगी।

~ डॉ. मुल्ला आदम अलीतिरुपति, आंध्र प्रदेश

शिक्षा : एम. ए., पी-एच.डी., बीएड., डिप्लोमा इन हिन्दी., AP-SET, विद्वान (हिन्दी)।

प्रकाशित पुस्तकें:

  1. हिन्दी कथा-साहित्य में देश-विभाजन की त्रासदी और साम्प्रदायिकता (पराग बुक्स प्रकाशन, दिल्ली)
  2. नन्हा सिपाही (बाल कहानी संग्रह) (विवेक पब्लिशिंग हाउस, जयपुर)

शीघ्र प्रकाश्य पुस्तकें:

  1. बालमन एक्सप्रेस (बाल कविताओं का रंगीन सफर)
  2. बचपननामा (विविध बाल साहित्यकारों की श्रेष्ठ कहानियाँ)
  3. बचपन बोलता है (विविध बाल साहित्यकारों की श्रेष्ठ कहानियाँ)
  4. चिकी की महागाथा (नहीं चिड़ियां की महान यात्रा) लघु-उपन्यास
  5. समय, समाज और साहित्य (समकालीन साहित्यिक निबंध-संग्रह)

रचनात्मक उपलब्धियां:

“हिन्दी कथा-साहित्य में देश-विभाजन की त्रासदी और साम्प्रदायिकता” (प्रकाशक – पराग बुक्स, दिल्ली), 2021, नन्हा सिपाही – बाल कहानी संग्रह (विवेक पब्लिशिंग हाउस, जयपुर), राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 24 लेख प्रकाशित, 30 से ज्यादा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार, 80 से ज्यादा राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय वेबिनार, कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, कहानियाँ प्रकाशित।

पुरस्कार / सम्मान:

एंटी करप्शन फाउंडेशन द्वारा “नेशनल एजुकेशन आइकन अवार्ड-2019”, सोसाइटी फॉर यूथ डेवलपमेंट द्वारा “स्वामी विवेकानन्द युवा सम्मान-2019”, नवसृजन कला, साहित्य एवं संस्कृति न्यास (पंजी.) दिल्ली द्वारा “नवसृजन हिन्दी रत्न सम्मान-2021”, हिन्दू वेलफेयर फाउंडेशन (भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त) द्वारा “राष्ट्रीय साहित्य श्री सम्मान-2021”, विश्व संवाद परिषद की ओर से हिन्दी साहित्य एवं काव्य सभा (प्रकोष्ठ) के लिए अवैतनिक प्रदेश अध्यक्ष (आंध्र प्रदेश) 2021।

संपर्क:

1/36 उंतकल, अनंतपुर जिला, आंध्र प्रदेश-515871

  • Website: www.drmullaadamali.com
  • Email: mullaadamali@gmail.com
  • Blog: www.drmullaadamali.com
  • YouTube: Dr. Mulla Adam Ali

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