भोजन हमारे शरीर का ईंधन है। सही भोजन हमें लंबे समय तक ऊर्जा देता है, जबकि कुछ खाद्य पदार्थ तुरंत ऊर्जा तो प्रदान करते हैं, लेकिन जल्द ही थकान और कमजोरी भी पैदा कर देते हैं। इसका मुख्य कारण उनमें फाइबर और पोषक तत्वों की कमी होती है। ज्यादा चीनी और मैदा से बने खाद्य पदार्थ – जैसे पास्ता, सफेद ब्रेड, कैंडी, कुकीज़ और मिठाइयाँ – “सरल कार्बोहाइड्रेट” कहलाते हैं। इनमें फाइबर लगभग न के बराबर होता है। जब हम इन्हें खाते हैं तो इनमें मौजूद चीनी तेजी से रक्त प्रवाह में पहुँच जाती है और शरीर को तुरंत ऊर्जा देती है। लेकिन फाइबर की कमी के कारण यह ऊर्जा टिक नहीं पाती और थोड़ी देर में रक्त शर्करा का स्तर तेजी से गिर जाता है। परिणामतः, हमें बार-बार भूख लगती है और हम जरूरत से ज्यादा तथा गलत भोजन कर लेते हैं।
खाद्य पदार्थ जो शरीर की ऊर्जा खत्म करते हैं
इसी तरह कुछ पेय पदार्थ भी शरीर की ऊर्जा और सेहत को नुकसान पहुँचाते हैं। स्पोर्ट्स या एनर्जी ड्रिंक्स, रेगुलर सोडा, पैक्ड जूस और गैसयुक्त पेय (aerated drinks) में अत्यधिक चीनी और अम्ल पाए जाते हैं। इनका लगातार सेवन कई गंभीर समस्याएँ उत्पन्न कर सकता है, जैसे – मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज, दाँतों की सड़न, फैटी लिवर, हृदय रोग, हड्डियों का कमजोर होना, प्रजनन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव, पाचन संबंधी गड़बड़ियाँ।
इसलिए यह जरूरी है कि हम ऐसे खाद्य और पेय पदार्थों का सेवन सीमित करें और इसके बजाय प्राकृतिक, पोषक और फाइबरयुक्त भोजन को प्राथमिकता दें। यही आदत हमें लंबे समय तक सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखेगी।
वास्तव में कई खाद्य पदार्थ ऐसे होते हैं, जो शरीर के लिए जरूरी और लाभकारी तो हैं, लेकिन अगर इन्हें अति मात्रा में या गलत तरीके से खाया जाए तो नुकसानदेह होते हैं। संक्षेप में मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- नमक: नमक की अधिकता से उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और किडनी प्रभावित होती है। लेकिन नमक शरीर के लिए आवश्यक है। अतः दिनभर में 5 ग्राम, लगभग 1 चम्मच, से ज्यादा हानिकारक हो सकता है।
- फलों का जूस: प्रतिदिन पीने से शरीर में शुगर की अधिकता, डायबिटीज और मोटापा आता है। ताजे फलों का जूस पीने की बजाय पूरा फल खाएँ। सब्जियों का जूस पीना अंत में हानिकारक ही सिद्ध होता है।
- ड्राई फ्रूट्स और बीज: पोषक तत्वों से भरपूर हैं, लेकिन अधिक मात्रा और लंबे समय तक खाने से गैस, पाचन संबंधी रोग हो सकते हैं। इनमें मौजूद कोलेस्ट्रॉल के कारण ग्लूकोज, कब्ज और दस्त का कारण बन जाता है। इनको सीमित मात्रा में खाएँ और बीच-बीच में विराम दें।
- आलू का हरा भाग: इसमें विषैले तत्व (सोलेनिन) होते हैं, इसलिए इसे हटा देना चाहिए। इसके सेवन से पेट में ऐंठन, भ्रम या तंत्रिका संबंधी समस्याएँ हो जाती हैं। आँतों में सूजन और कटाव भी होता है।
- जायफल: इसमें मिरिस्टिसिन नामक यौगिक अधिक होता है, जो ज्यादा खाने पर हानिकारक है। पेट में इसकी अधिक मात्रा से मतिभ्रम, चक्कर आना, मतली, उल्टी तथा दिल की धड़कन तेज होने जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इसका सेवन वर्जित है।
- कड़वे बादाम: इनमें हाइड्रोजन सायनाइड नामक जहरीला पदार्थ पाया जाता है। कच्चे 20 – 25 बादाम की मात्रा ही जानलेवा हो सकती है।
- कच्चा राजमा: इसमें फाइटोहेमाग्लुटिनिन (लैक्टिन) नामक विष होता है, जिससे अफारा, उल्टी, दस्त और पेट दर्द होते हैं। लेकिन राजमा को अच्छी तरह पकाने पर यह नष्ट हो जाता है। अतः पकाने से पहले राजमा को लंबे समय तक भिगोएँ और अच्छी तरह पकाकर ही खाएँ।
- ब्राउन राइस: इनमें आर्सेनिक की मात्रा सफेद चावल से अपेक्षाकृत अधिक होती है। यह विषाक्त पदार्थ हृदय रोग और कुछ प्रकार के कैंसर के खतरे को बढ़ाता है। इसलिए पकाने से पहले लंबे समय तक भिगोकर और खूब अच्छी तरह धोकर ही पकाना चाहिए।
कुल मिलाकर, सीमित मात्रा, संतुलन और सही विधि से पकाना ही हर खाद्य पदार्थ को लाभकारी बनाता है।

असंगत भोजन (विरुद्ध आहार):
वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आयुर्वेद के अनुसार विरुद्ध आहार अर्थात् असंगत भोजन वह है, जिसमें दो ऐसे खाद्य पदार्थ एक साथ खाए जाएँ, जो आपस में रासायनिक या पाचन संबंधी दृष्टि से मेल न खाते हों। आधुनिक पोषण विज्ञान भी यह मानता है कि कुछ खाद्य संयोजन शरीर में पाचन-प्रक्रिया को बाधित कर सकते हैं और हानिकारक उप-उत्पाद (toxic metabolites) बना सकते हैं। ऐसे संयोजनों से दीर्घकाल में पाचन विकार, एलर्जी, त्वचा रोग, हृदय रोग और प्रतिरक्षा तंत्र की कमजोरी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- दूध और खट्टे फल: खट्टे फलों, जैसे संतरा, मौसमी, नींबू आदि में पाया जाने वाला साइट्रिक एसिड दूध के प्रोटीन (केसीन) को पेट में फाड़ देता है। इस प्रक्रिया से दूध फटकर पचने में कठिन हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप, आँत में फर्मेंटेशन, गैस, सूजन और अपच जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
- दूध और नमक: दूध में मौजूद प्रोटीन और खनिज नमक के साथ मिलने पर असंतुलन उत्पन्न कर देते हैं। इससे इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और पाचन-तंत्र पर तनाव बढ़ता है। आँतों में सूजन, त्वचा संबंधी रोग, जैसे एक्ने (पिंपल्स), सफेद दाग, खुजली, एग्जिमा, ब्लड प्रेशर और हृदय रोग, बालों का झड़ना भी इस संयोजन से जुड़ी समस्याएँ मानी जाती हैं।
- दूध और दालें / विशिष्ट सब्जियाँ: उड़द और मसूर की दाल में ऑक्सलेट की मात्रा तथा कुछ अन्य पाए जाने वाले प्रोटीन और तत्व दूध के साथ मिलकर पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं। ऑक्सलेट की मौजूदगी किडनी में पथरी का कारण बनती है। मूली और कटहल जैसे खाद्य पदार्थ भी दूध के साथ गैस, अपच तथा लिवर में सोरायसिस जैसे रोग पैदा करते हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से, ये संयोजन आँत में ज्यादा अम्लीय वातावरण पैदा करते हैं, जिससे पेट संबंधी दिक्कतें बढ़ जाती हैं। इसलिए सलाह दी जाती है कि दूध को हमेशा अकेले और खाली पेट पिया जाए। - शहद और घी: आयुर्वेद के अनुसार, शहद और घी को समान मात्रा में मिलाना विष के समान प्रभाव डालता है। शहद में क्लॉस्ट्रिडियम बोटुलिनम नामक बैक्टीरिया के बीजाणु (spores) पाए जा सकते हैं, जो अनुचित स्थिति, जैसे गर्म पदार्थ या दूध, दही के साथ सेवन में सक्रिय होकर स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचा सकते हैं। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि शहद को उच्च तापमान पर गर्म करने से उसमें मौजूद कुछ एंजाइम और एंटीऑक्सीडेंट नष्ट हो जाते हैं तथा हाइड्रोक्सीमेथाइल फर्फरल (HMF) नामक हानिकारक यौगिक बन सकता है। इसलिए शहद को कभी भी गर्म चीजों के साथ या अत्यधिक गर्मी के मौसम में नहीं लेना चाहिए।
आधुनिक शोध और आयुर्वेद – दोनों यह मानते हैं कि कुछ खाद्य पदार्थ पौष्टिक होने के बाद भी अगर इनका खाद्य संयोजन किया जाए, जैसे दूध और खट्टे फल, शहद और घी, दूध और नमक इत्यादि, तो शरीर में असंतुलन और रोगों का कारण बन जाते हैं। अतः सही खान-पान संयोजन का पालन करना ही स्वास्थ्य संरक्षण का सबसे सरल उपाय है।
हमारे शरीर के अनेकों रोगों का सीधा संबंध और कारण खाया जाने वाला भोजन है। गहराई से देखा जाए तो पाचन संस्थान हमारे दैनिक जीवन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। साधक स्वयं अनुभव करते होंगे कि अगर पाचन संस्थान में कोई गड़बड़ी पैदा हो जाती है, तब निराश हो जाते हैं और बात-बात पर झुंझलाते हैं। ठीक विपरीत, यदि पाचन प्रणाली अच्छी तरह से कार्य करती है तो ज्यादा आशावादी और प्रसन्नचित्त दिखाई पड़ते हैं। स्वादहीन, नीरस तथा अनुपयुक्त तरीके से बनाए गए भोजन से भूख बढ़ने की बजाय मर जाती है तथा मुँह की लार और आमाशय ग्रंथियाँ रसों का समुचित स्राव नहीं करतीं। भोजन पवित्रता-पूर्वक बनाया जाए तथा भगवान का चिंतन करते हुए प्रसाद-बुद्धि से ग्रहण किया जाए तो ऐसा भोजन सुपाच्य और सात्त्विक होता है।
Kids Portal For Parents India Kids Network