किताबों के पैर: क्या किताबें सच्ची में चलती हैं - रोचक बाल-कहानी

किताबों के पैर: क्या किताबें सच्ची में चलती हैं – रोचक बाल-कहानी

किताबों के पैर: दादा-दादी, पापा-मम्मी, भाई-बहन और सबके प्यारे बब्बू जी, सभी घर में ही थे। सभी अपने-अपने कामों में लगे थे। कोई पुस्तक पढ़ रहा था, कोई खेल रहा था। अचानक दादा जी ने देखा बब्बू जी का एक भाई किताब को पैर लगा रहा था।

हां, बब्बू जी के बारे में बताना तो रह ही गया। घर का सबसे छोटा सदस्य, अभी स्कूल जाने तो लगा था पर कभी-कभी ही। क-ख-ग सीखना शुरू कर दिया था। गिनती भी आने लगी थी। अपनी टॉफी-चॉकलेट खुद ही गिन लेता था। क्रिकेट खेलते समय किस भाई ने रन ज्यादा बनाए, यह भी समझ जाता था। जब दादाजी ने देखा कि उसके एक भाई ने किताब को पैर लगा रखा है।

किताबों के पैर: गोविंद शर्मा की रोचक हिंदी बाल-कहानी

उन्होंने कहा, “नन्नू, किताब से अपना पैर हटाओ। किताब को पैर नहीं लगाते हैं।”

नन्नू ने फौरन पैर हटा लिया। वह या दादा जी कुछ बोलें, उससे पहले ही बब्बू जी बोल पड़े, “हां, किताबों को पैर नहीं लगाने चाहिए क्योंकि उनके तो पहले से ही पैर होते हैं।”

यह सुनकर सब हंस पड़े। दादा जी ने पूछा, “किताबों के पैर होते हैं? भई आप भी कभी-कभी अच्छा मजाक कर लेते हैं।”

“मैं मजाक कर रहा हूं?” बब्बू जी ने हैरानी से पूछा।

“और नहीं तो क्या। आपने अभी-अभी यही कहा है न कि किताबों के पैर होते हैं।”

“कहा तो यही है।”

“अच्छा बताओ, कितने पैर होते हैं एक किताब के – हम इंसानों की तरह 2 या जानवरों की तरह 4 या कीड़ों की तरह 8, 12 या ज्यादा।”

“यह मैं कैसे बता सकता हूं कि कितने होते हैं। मुझे पैर दिखाई कहां देते हैं।”

“फिर कैसे कहते हो कि पैर होते हैं।”

बब्बू जी सोचने लगे तो सब समझे कि वह गलती महसूस कर रहे हैं पर नहीं, बब्बू जी ने सबकी तरफ देखते हुए सवाल किया, “अच्छा बताइए पैर किस काम आते हैं?”

सब अपने-अपने जवाब देने लगे, “मोजे-जूते पहनने के काम आते हैं। फुटबॉल खेलने के काम आते हैं। साइकिल के पैडल चलाने के काम आते हैं। हम पैरों से नाचते हैं। पैरों में पायल पहनी जाती है … ”

“रुको, पैर सबसे पहले चलने के काम आते हैं।” यह दादा जी ने कहा।

बब्बू जी इस जवाब पर खुश हो गए।

“यही है पैरों का काम? हम पैरों से ही चलते हैं। हमारी तरह किताबें भी पैरों से चलती हैं। वे यहां-वहां ही नहीं, दूर-दूर तक चली जाती हैं। मैं यह रोजाना देखता हूं, आप सब भी देखते हैं। आप तो उनके पीछे-पीछे भी जाते हैं, उनके साथ आंख मिचौली भी खेलते हैं।”

सब हैरानी से देख कर सोच रहे थे कि आज यह महाशय कैसी बातें कर रहे हैं। उनके इस तरह देखने से बब्बू जी न हैरान हुए, न परेशान। बोले, “मैं रोज देखता हूं। कभी दीदी कहती है – अरे मैंने अपनी हिन्दी की किताब यहां रखी थी, वह कहां चली गई?

कभी भैया कहते हैं मेरी आर्ट्स की बुक कहां चली गई? मैंने तो उसे अपनी मेज पर रखा था। बाद में वह बुक मिलती है ड्राइंग रूम में। वहां कैसे गई? चलकर ही तो गई न? चलने का काम पैरों का। उस दिन दीदी शनिवार को गणित की पुस्तक सारे घर में ढूंढ रही थीं। सारा घर छान मारा। गणित की वह पुस्तक सोमवार को स्कूल में मिली। इतनी दूर चलकर ही तो गई।”

बब्बू जी की इस बात का किसी को जवाब नहीं सूझ रहा था। बब्बू जी बोले, “ऐसी बात नहीं कि किताबों के ही पैर होते हैं, और चीजों के भी होते हैं, पर दिखाई नहीं देते। जैसे पापा अक्सर कहते हैं – अरे, मैंने स्कूटर की चाबी यहां रखी थी, वह कहां चली गई। मम्मी कहती हैं … ।”

तभी दादा जी बोले, “ठहरो, मैं भी कभी-कभी यह कहता हूं, आज का अखबार कहां चला गया, मेज पर रखा मेरा चश्मा कहां चला जाता है, पर वास्तव में उनके पैर नहीं होते हैं और न ही वे चीजें कहीं चलकर जाती हैं। यह तो हमारी अपनी गलती होती है कि हम अपनी किताब या किसी और चीज को इधर-उधर रख देते हैं और भूल जाते हैं। फिर उसे ढूंढते हुए कहते हैं कि वह कहां चली गई। ऐसा सबसे ज्यादा करता है तुम्हारा भैया चीनू … अरे वह अभी तो यहां था, अब कहां चला गया?”

“हां, दादा जी, वह तो कहीं चलकर ही गया है क्योंकि उसके तो पैर हैं और दिखाई भी देते हैं।”

इस बार सब हंस पड़े। बब्बू जी की पीठ प्यार से थपथपाते हुए दादा जी ने कहा, “आपने नई बात पकड़ी है। हमें किताबों को पैर नहीं लगाना चाहिए। हमें उन्हें अपने पैर देकर दूर या पास जहां भी जरूरत हो पहुंचाना चाहिए। यह भी कि अपनी किताबें सही जगह रखें ताकि उनके कहीं चली जाने की झूठी शिकायत न करें।”

~ गोविंद शर्मा

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