हृदय रोग कारक - उच्च कोलेस्ट्रॉल: Heart Disease Prime Factor - High Cholesterol

हृदय रोग कारक – उच्च कोलेस्ट्रॉल: Heart Disease Prime Factor – High Cholesterol

कोलेस्ट्रॉल के बिना शरीर के अनेकों आवश्यक कार्य पूरे नहीं हो सकते। लेकिन इसकी अधिक मात्रा कई जोखिम भरी चिकित्सीय समस्याओं को जन्म देती है। एक स्वस्थ व्यक्ति में कुल कोलेस्ट्रॉल 200 mg/dl से कम, खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) 100 mg/dl से कम तथा अच्छा कोलेस्ट्रॉल (HDL) पुरुषों में 50 mg/dl और महिलाओं में 40 mg/dl से अधिक होना चाहिए।

रक्त में कोलेस्ट्रॉल की अधिकता हृदय रोग के अन्य जोखिम कारकों की जड़ है। इसके कारण उच्च रक्तचाप, मधुमेह और मोटापा जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं। शरीर के सुचारु कार्य के लिए कोलेस्ट्रॉल आवश्यक है, किंतु इसकी अधिकता धमनियों में जमकर रक्त में मौजूद अन्य पदार्थों के साथ मिलकर वसायुक्त चिपचिपा पदार्थ बनाती है। यह धीरे-धीरे धमनियों की दीवारों पर परत के रूप में जम जाता है।

अच्छा और खराब कोलेस्ट्रॉल:

अच्छा कोलेस्ट्रॉल (HDL) रक्त में जमा अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को लिवर तक ले जाकर धमनियों को साफ रखने का कार्य करता है। इससे हृदय रोगों का खतरा कम होता है, रक्त में थक्के बनने से रोकथाम होती है और सूजन से लड़ने में भी सहायता मिलती है। लेकिन यह प्रक्रिया सीमित मात्रा में होती है।

वहीं, खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) की अधिक मात्रा धमनियों की दीवारों पर परत (plaque) बनाती है। ये परतें धमनियों को संकीर्ण और कठोर कर देती हैं, जिससे रक्त प्रवाह बाधित होता है और दिल के दौरे या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

एक अन्य पदार्थ – ट्राइग्लिसराइड्स भी रक्त में पाए जाने वाली वसा का एक प्रकार है। इसकी मात्रा 150 mg/dl तक सामान्य मानी जाती है। इसकी अधिकता शरीर में कुपचयन (metabolic imbalance) और सूजन पैदा करती है। खराब कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स – दोनों की अधिकता हृदय रोगों का प्रमुख कारण होती है।

धमनियों पर प्रभाव:

खराब कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स की अधिक मात्रा धमनियों में परतें बनाती है। इससे रक्त संचार धीमा हो जाता है और हृदय शरीर को ऑक्सीजन युक्त रक्त पर्याप्त मात्रा में पंप नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप, हृदय कमजोर होकर सही ढंग से काम नहीं कर पाता।

शरीर ऐसे हार्मोन छोड़ता है, जो रक्त वाहिकाओं को और अधिक संकुचित कर देते हैं। इससे गुर्दे अधिक तरल पदार्थ और नमक को धारण करने लगते हैं, जिससे रक्तचाप बढ़ता है और हृदय पर अधिक दबाव पड़ता है। इसके कारण हाथ, पैर, टखने, फेफड़े तथा अन्य अंगों में तरल पदार्थ जमा हो जाता है, जिसे कंजेस्टिव हार्ट फेल्योर कहा जाता है।

रक्त वाहिकाओं पर कोलेस्ट्रॉल का प्रभाव:

रक्त वाहिकाओं की भीतरी और नाजुक परत, जिसे एंडोथेलियम कहा जाता है, कोलेस्ट्रॉल से क्षतिग्रस्त हो जाती है। सफेद रक्त कोशिकाएं इन वाहिकाओं की रक्षा के लिए सक्रिय होती हैं, परंतु कोलेस्ट्रॉल और कोशिकाओं की क्रिया मिलकर धमनी की दीवारों पर परत बना देती है। इससे धमनियां संकरी और सूजनयुक्त हो जाती हैं, जिससे रक्त प्रवाह और धीमा हो जाता है।

धमनियों में बनी परतें अचानक फट सकती हैं, जिससे रक्त के थक्के बनते हैं। यह हृदयाघात या मस्तिष्क में स्ट्रोक का कारण बन सकता है।

तीन प्रमुख हृदय रोग:

खराब कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स से बनी परतें धमनियों को अवरुद्ध कर देती हैं, जिसके परिणामस्वरूप तीन प्रमुख जोखिम भरे हृदय रोग उत्पन्न होते हैं:

1. कोरोनरी धमनी रोग (CAD) या कोरोनरी हृदय रोग (CHD)

हृदय को रक्त पहुँचाने वाली वाहिकाएं अवरुद्ध हो जाती हैं, जिससे हृदय को पर्याप्त रक्त नहीं मिलता और वह कमजोर होकर काम करना बंद कर सकता है। यह हृदय रोग का सबसे आम रूप है तथा मृत्यु का प्रमुख कारण भी है।

2. परिधीय धमनी रोग (PAD)

यह पैरों और हाथों की धमनियों को प्रभावित करता है। रक्त प्रवाह धीमा होने के कारण इन अंगों में पर्याप्त रक्त नहीं पहुंच पाता। पीएडी और सीएडी—दोनों के जोखिम कारक समान होते हैं। जमा हुआ कोलेस्ट्रॉल शरीर के किसी भी हिस्से में रक्त वाहिकाओं को अवरुद्ध कर सकता है।

3. कैरोटिड धमनी रोग

कैरोटिड धमनियां मस्तिष्क को रक्त पहुंचाती हैं। एथेरोस्क्लेरोसिस की प्रक्रिया से ये धमनियां प्रभावित होती हैं, जिससे मस्तिष्क को पर्याप्त रक्त नहीं मिल पाता और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

हृदय रोग से बचाव के चार प्राकृतिक उपाय:

हृदय रोग शरीर में लंबे समय से चली आ रही प्रक्रियाओं और नसों में बने अवरोधों के कारण जानलेवा रूप ले सकता है। हाल के शोधों में, विशेषज्ञों ने चार प्राकृतिक तरीके सुझाए हैं, जिन्हें अपनाकर जीवन-शैली को सकारात्मक बनाया जा सकता है:

1. आहार

हृदय-स्वस्थ आहार में फल, सब्जियां, साबुत अनाज, हल्के प्रोटीन (विशेषकर ओमेगा-3 फैटी एसिड युक्त) शामिल करें। प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, मिठाई, संतृप्त और ट्रांस वसा का सेवन सीमित रखें। नमक और मसालों का प्रयोग भी संयमित मात्रा में करें।

2. व्यायाम

प्रतिदिन योगाभ्यास करें, जिसमें आसन और प्राणायाम शामिल हों। आकुंचन-संकुचन क्रियाओं से नसें और मांसपेशियां लचीली तथा मजबूत रहती हैं। प्रातः योग और सायंकाल सैर करना अर्थात् लाभकारी है। निष्क्रिय शरीर में धमनियों की परतें गहरी और अधिक जोखिमपूर्ण होती हैं।

3. नियमित और सुखद नींद

स्थिर नींद चक्र तनाव को नियंत्रित करने में मदद करता है और धमनियों पर प्रतिकूल प्रभाव को कम करता है। अनियमित या कम नींद से रक्तचाप, मधुमेह और एंडोथेलियम के कार्य प्रभावित होते हैं। प्रतिदिन एक ही समय पर सोने-उठने की आदत, शांत वातावरण और सोने से पहले डिजिटल स्क्रीन बंद करना नींद की गुणवत्ता सुधारता है।

4. इरादापूर्ण तनाव प्रबंधन

तनाव कम करने से धमनियों की आंतरिक सतह पर होने वाली हानिकारक रासायनिक प्रतिक्रियाएं घटती हैं। आसन, प्राणायाम, योगनिद्रा और ध्यान के नियमित अभ्यास से तनाव को नियंत्रित किया जा सकता है।

सभी प्रकार के नकारात्मक विचारों से दूरी बनाएं। चिंता और भय पैदा करने वाले विचार मन में आने लगें तो चार-पांच लम्बे, गहरे श्वास लें और अंतर्मुखी होकर ईश्वर से प्रार्थना करें कि ऐसे विचारों से नाता नहीं रखना है।

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