उस वन का नाम जूही वन था। यह कोई साधारण वन नहीं था। यहां के अधिकांश जानवर खेती करके अपना जीवनयापन करते थे। कोई सब्जियां उगाता था, कोई गन्ना, तो कोई फल। सभी मेहनत से काम करते और आपस में मिल-जुल कर रहते थे।
कुछ साल पहले की बात है। जूही वन में अचानक चोरियों की घटनाएं बढ़ने लगीं। कभी लालू लोमड़ को सब्जियां चोरी हो जातीं तो कभी कालू भालू के गन्ने गायब मिलते। खेतों में दिन-रात मेहनत करने वाले जानवर बहुत परेशान हो गए।
‘गिदी-पिदी’ बन गए अच्छे: गोविंद शर्मा
सबने मिलकर एक चौकीदार भी रखा और खुद भी पहरा देने लगे, लेकिन चोर पकड़ में नहीं आए।
असली परेशानी यह थी कि चोर बाहर से नहीं, बल्कि जूही वन के ही निवासी थे। कोई ठोस सबूत न होने के कारण किसी पर आरोप लगाना मुश्किल था। फिर भी, अधिकतर लोगों को गिदी और पिदी नामक दो गीदड़ भाइयों पर संदेह था।
उसी समय गर्मी की छुट्टियों में लालू लोमड़ के रिश्ते का एक भाई पतलू उससे मिलने जूही वन आया।
लालू लोमड़ ने पतलू को पूरी समस्या बताई। पतलू ने ध्यान से सब सुना और बोला, “अगर चोर इसी वन के हैं, तो आज रात मैं खुद खेत पर पहरा दूंगा।”
पतलू को इस इलाके की अच्छी जानकारी थी। वह जानता था कि लालू लोमड़ को थोड़ी-सी जमीन पहाड़ी को तलहटी में भी है, जो बहुत उबड़-खाबड़ और बेकार पड़ी रहती थी।
उसी रात पतलू लालू लोमड़ के उस खेत पर गया जहां उसने खरबूजे उगा रखे थे जो अक्सर चोरी हो रहे थे। वह अपने साथ एक पुराना लेकिन मजबूत कागज और कुछ रंगीन पैन ले गया। खेत की मेड़ पर बैठकर उसने एक नक्शा बनाया और उसे खरबूजों की बेलों के बीच एक खरबूजे के नीचे दबा दिया।
इसके बाद वह चुपचाप घर लौट आया। पतलू को जाते देख गिदी और पिदी चोरी के इरादे से खेत में घुस आए । पिदी ने अभी दो-चार खरबूजे ही तोड़े थे कि उसकी नजर उस कागज पर पड़ी। उसने नक्शा उठाया और गिदी को दिखाया। चांदनी में नक्शे को देखकर गिदी की आंखें चमक उठीं। वह बोला, “यह तो किसी छिपे हुए खजाने का नक्शा है! छोड़ो खरबूजे, पहले खजाना ढूंढते हैं।”
अगले दिन दोनों भाई नक्शे की लकीरों का पीछा करते हुए लालू लोमड़ को तलहटी वाली जमीन पर पहुंचे। गिदी ने कहा, “यहीं कहीं खजाना दबा है। अच्छा हुआ लालू ने इस जमीन में खेती नहीं की।”
पिदी को चिता हुई, “अगर हम यहां खुदाई करेंगे तो सबको शक हो जाएगा।” गिदी हंस पड़ा, “चिता मत करो, मैं सब संभाल लूंगा।”
दोनों लालू लोमड़ के पास पहुंचे। गिदी ने बड़ी चालाकी से कहा कि वे मेहनती साबित होना चाहते हैं और तलहटी वाली जमीन को समतल करना चाहते हैं। लालू लोमड़ ने पहले तो उन्हें आलसी कहकर मना कर दिया, लेकिन पतलू ने बीच में आकर कहा कि बदले में सिर्फ दो वक्त का अनाज दे दिया जाए।
गिदी और पिदी दिन-रात मेहनत करने लगे। शुरू में वन के जानवर उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन धीरे-धीरे जब जमीन समतल होने लगी तो सबकी राय बदल गई। दो महीने की कड़ी मेहनत से खेत पूरी तरह तैयार हो गया लेकिन दोनों को वहां कोई खजाना नहीं मिला जिससे वे बड़े निराश और खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे।
पतलू की छुट्टियां खत्म होने वाली थीं। उसके जाने से पहले पंचायत में गिदी-पिदी को एक हजार रुपए ईनाम में दिए गए। दोनों की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने सबके सामने अपनी चोरी स्वीकार की और कहा, “जिसे आप हमारी हिम्मत और मेहनत बता रहे हैं वह तो हमारा लालच था परंतु हमें यह अकल आ गई है कि हमें मेहनत करके ही खाना कमाना चाहिए। दिन भर की मेहनत के बाद सूखी रोटी में जो स्वाद आता है, वह चोरी के पैसों से खरीदे गए पकवानों में भी नहीं आता है। आप लोग जो चाहे सजा हमें दे सकते हैं।”
पतलू ने कहा, “तुम अपनी सजा भुगत चुके हो।”
लालू लोमड़ने मुस्कराते हुए कहा, “अब यह जमीन एक साल के लिए तुम्हारी है।”
पश्चाताप के आंसू अब खुशी में बदल चुके थे।
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