गली में कुछ लोग दिखाई दे रहे थे। उनके हाथों में लकड़ी जैसा कुछ था। रोहन खिड़की से यह सब देख रहा था। उसने चुपचाप बिजली जलाई, लेकिन बिजली नहीं आई। वह बुदबुदाया, “बिजली को भी अभी ही जाना था।” उसी समय बादल गरजने लगे और खराब ट्यूब लाइट की तरह आसमान में बिजली चमकने लगी।
“हो न हो, ये लोग चोर-लुटेरे हैं,” वह डर के मारे फिर बुदबुदाया।
कच्छा गैंग: गोविन्द भारद्वाज
आज सुबह ही उसके पापा-मम्मी गाँव गए थे। उसके चाचा का फ़ोन आया था कि उसके दादाजी की तबीयत खराब है, इसलिए परीक्षा के चलते रोहन को घर पर अकेला छोड़कर जाना पड़ा था।
रोहन हिम्मत करके जाली से उनकी हरकतों पर नज़र रखे हुए था। उसने अपने कमरे में रखा लकड़ी का डंडा अपने हाथ में थाम रखा था।
बिजली कभी-कभी इतनी ज़ोर से चमकती कि गली में सब कुछ साफ़-साफ़ दिखाई दे जाता।
अचानक उसने देखा कि वे लोग उसके घर की तरफ ही आ रहे हैं। जैसे ही बिजली चमकी, रोहन ने देखा कि एक आदमी के हाथ में एक शीशी है।
“इस शीशी में क्या हो सकता है?” उसने खुद से सवाल किया। फिर कुछ सोचकर चुटकी बजाते हुए बोला, “ये चोर हैं और इनकी शीशी में तेल है—सरसों या तिल का।”
खिड़की से उसने फिर गौर से देखने की कोशिश की। उसे इंतज़ार था तो बस बिजली चमकने का। उसी समय बादल फिर गरजे और बिजली चमकी। उसने देखा कि उन्होंने अपने कपड़े उतार दिए थे और केवल घुटनों तक कच्छे पहने हुए थे।
“अरे, ये तो कच्छा गैंग है… जो बदन पर तेल लगाकर चोरी करते हैं, ताकि जब कोई उन्हें पकड़ने की कोशिश करे तो वे फिसलकर निकल जाएँ,” वह चौंककर बोला।
बारिश शुरू हो चुकी थी। चोरों का दिखना बंद हो गया था। उसे कुछ भी साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था। उसकी धड़कन तेज़ हो गई, लेकिन उसने ठान लिया था कि अगर कच्छा गैंग उसके घर में घुसने की कोशिश करेगी, तो वह उन्हें मज़ा ज़रूर चखाएगा।
अचानक उसे दरवाज़े की तरफ से खुसर-फुसर की आवाज़ आने लगी। रोहन को पूरा यक़ीन हो गया कि यही गैंग उसके घर में आने वाली है। उसने तुरंत एक तरकीब सोची और पूरी तरह तैयार हो गया।
अगले ही पल दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ आई।
“कौन है?” उसने हिम्मत करके पूछा।
“मैं हूँ, चौधरी अंकल,” सामने से जवाब आया।
“अरे, ये कच्छा गैंग तो बहुत चालाक है… हमारे पड़ोसी चौधरी अंकल की आवाज़ भी निकाल लेती है,” वह धीरे से बोला।
“अच्छा अंकल जी, अभी दरवाज़ा खोलता हूँ।” रोहन ने दरवाज़ा खोला।

दरवाज़ा खुलते ही आगंतुक तेज़ी से अंदर घुसा, लेकिन फिसलकर ज़ोर से गिर पड़ा।
“अरे रोहन, यह अँधेरे में क्या बिखेर रखा है…?” गिरने वाले ने कराहते हुए पूछा।
“कौन, चौधरी अंकल…?” रोहन ने उन्हें उठाते हुए पूछा।
“हाँ भई, मैं ही हूँ। दरवाज़ा खुलने से पहले ही मैंने अपने बारे में बता दिया था, फिर पूछ रहे हो?” अंकल ने जवाब दिया।
“सॉरी अंकल… मैं सोच रहा था कि कच्छा गैंग घर में आ गई है। इसलिए मैंने घर में रखी कुछ छोटी-छोटी शीशियों को खाली करके यहाँ तेल फैला दिया था, ताकि चोर घुसते ही फिसल जाएँ और मैं उन पर लकड़ी के डंडे से प्रहार कर सकूँ,” रोहन ने उन्हें सोफ़े पर बैठाते हुए कहा।
उसी समय बिजली आ गई।
“अरे, यह क्या अंकल! आप… और इस हालत में?” रोशनी होते ही रोहन ने पूछा।
“हाँ बेटा, कच्छा गैंग को पकड़ने के लिए गली के कुछ लोग उन्हीं के अंदाज़ में उन्हें पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। पिछले कुछ दिनों से उनकी हलचल काफ़ी बढ़ गई है,” चौधरी अंकल ने बताया।
“फिर तो आप मुझे डराने ही आए थे,” रोहन ने मुस्कुराते हुए कहा।
“नहीं, ऐसी बात नहीं है। तुम्हारे पापा का फ़ोन आया था कि तुम अकेले हो, इसलिए तुम्हें संभालने आ गया था। लेकिन तुम तो बड़े बहादुर निकले। कच्छा गैंग से निपटने की पूरी तैयारी कर रखी है। और अच्छा हुआ – तुम्हारा फ़ॉर्मूला मुझ पर ही काम आ गया। मॉक ड्रिल हो गई यह तो,” चौधरी अंकल ने अंदरूनी चोट पर हाथ रखते हुए कहा।
रोहन अब निश्चिंत होकर अपने कमरे में सोने चला गया।
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