नया स्कूल: विद्यार्थी जीवन में अनुशासन के महत्व पर हिंदी बाल-कहानी

नया स्कूल: विद्यार्थी जीवन में अनुशासन के महत्व पर हिंदी बाल-कहानी

संदीप के पिता की नई नौकरी एक बड़े शहर में लगी थी। संदीप खुश था कि अब उसे बड़े शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ने का अवसर मिलेगा। मम्मी-पापा नए घर में जाने के लिए सामान पैक करने में व्यस्त थे और संदीप अपने दोस्तों को मिलने बाहर आया था।

उसने अपने दोस्तों को बताया कि वह अब बड़े शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ने जा रहा है। उसके दोस्त भी खुश हुए। मनीष ने उससे कहा, “यार तुम बताना वहां नया क्या है, हमें भी तो कुछ पता चले आखिर बड़े शहरों के स्कूल कैसे होते हैं।” संदीप ने फोन करने का वादा किया और घर आ गया।

नया स्कूल: प्रिंसीपल विजय कुमार – हिंदी बाल-कहानी

अगले दिन उनका सामान पैक हो चुका था। आज उसे मां के साथ ट्रेन में बैठकर जाना था। पिताजी सामान के ट्रक के साथ गाड़ी लेकर आने वाले थे। संदीप ने कहा, “पापा मैं आपके साथ गाड़ी में चलूंगा…।”

पापा ने कहा, “नहीं तुम्हें पहले मम्मी के साथ पहुंच कर उनकी थोड़ी मदद करवानी है।”

नए शहर में पहुंचकर पिताजी ने सबसे पहला काम उसे स्कूल की यूनिफॉर्म, किताबें वगैरा दिलवाने का किया। उसका एडमिशन उन्होंने पहले से ही करवा रखा था। आज सुबह संदीप पहली बार एक बड़ी स्कूल बस में बैठकर स्कूल जाने वाला था।

वह बहुत उत्साहित था। मन में कहीं संशय भी था कि नए दोस्तों के साथ उसकी दोस्ती कैसी रहेगी, स्कूल कैसा होगा। बस में बैठते ही आगे की सीट पर बैठे एक लड़के ने थोड़ा-सा सरक कर जगह दी, संदीप वहां पर बैठा, स्कूल आने तक उससे थोड़ी-बहुत बातचीत भी हुई। वह उससे आगे वाली कक्षा में था।

संदीप स्कूल पहुंचा, पिताजी भी वहां मौजूद थे। क्लास टीचर ने उसे अपने साथ क्लास में आने के लिए कहा। संदीप ने देखा की क्लास में टीचर के प्रवेश करने के बावजूद भी सब बच्चे खड़े नहीं हुए थे। कुछ अभी भी बातें ही कर रहे थे। टीचर ने सबको गुडमार्निंग कहा, जिसका जवाब आगे बैठे बच्चों ने ही दिया था। यह देखकर संदीप को कुछ अजीब-सा लग रहा था। पहला पीरियड इंगलिश विषय का था। वहां के सभी बच्चे इंगलिश बोलने में माहिर थे।

संदीप अपने पुराने स्कूल में दोस्तों के साथ तो हिंदी में ही बात करता था लेकिन इस स्कूल में तो उसे कोई भी अपनी भाषा में बात करता हुआ नजर नहीं आया। उसने देखा कि क्लास के दौरान बच्चे आपस में बातें कर रहे थे। कुछ बच्चे दूसरे विषयों के अपने बाकी होमवर्क को पूरा कर रहे थे।

यह सब संदीप के लिए कुछ नया था। उसने अपने पास बैठे लड़के से पूछा, “यहां आप लोग टीचर से डरते नहीं हो?”

“क्यों?” उस बच्चे ने उसे बड़ा बेरुखा-सा जवाब दिया।

“तुम भी जो तुम्हारी मर्जी हो, वह करो।” इस तरह एक सप्ताह निकल गया। संदीप स्कूल से आकर अपने स्कूल की सभी बातें मम्मी-पापा को भी बताता था। मां उसे समझती थी कि तुम अपनी समझदारी से हमेशा सही ही करना। स्कूल में अनुशासन रखना जरूरी होता है। देखो तुम्हारी कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए।

एक सप्ताह बाद तक संदीप की चार-पांच अच्छे लड़कों से दोस्ती हो गई थी।

उसके समूह में एक लड़की शिवानी भी थी जो बहुत होशियार और समझदार थी। एक दिन उसने उसे बताया था कि ये सब बच्चे अपने-अपने घर में बहुत लाडले हैं। अगर टीचर इनको कुछ भी कहती है तो उनके माता-पिता टीचर की प्रिंसीपल से शिकायत कर देते हैं। इसलिए इस स्कूल ने यह सिद्धांत बना रखा है कि किसी भी बच्चे से अन्यथा टोका-टाकी नहीं करते।

संदीप ने कहा, “इससे तो इनको स्कूल में अनुशासन के लिए किसी का डर ही नहीं होगा।” तब शिवानी ने कहा, “सब अपनी तरह से व्यवहार करते हैं, तुम्हें भी खुद ही निर्णय करना होगा कि तुमको किस पर ध्यान देना है।”

उस स्कूल की सबसे अच्छी बात यह थी कि टीचर्स बच्चों को बहुत ध्यान से पढ़ाते थे। जो बच्चे ध्यान देते थे, उनको बहुत अच्छी तरह से समझ आता था। कोई बच्चा यदि प्रश्न पूछता, तो टीचर उसे व्यक्तिगत तौर पर बहुत प्यार से समझाते थे। अक्सर शैतान और उद्दंड बच्चे दूसरे बच्चों को चिढ़ाते भी थे। पर संदीप ने निर्णय कर लिया था कि उसे उन बच्चों की बातों में नहीं आना।

उस दिन फोन पर संदीप ने अपने पुराने दोस्तों को इस नए स्कूल की कुछ बातें बताईं। कुछ दोस्तों का कहना था कि “चलो अब तुम्हें स्कूल का कोई डर तो नहीं रहा।”

संदीप सोच रहा था की छात्र जीवन में अनुशासन के लिए किसी तरह का दबाव अथवा डर होना भी जरूरी है। इसीलिए तो कहते हैं – अनुशासित जीवन के लिए स्कूल पहला कदम है।

उस दिन पापा स्कूल में मिलने आए, तो टीचर ने संदीप के व्यवहार की सराहना की और प्रिंसीपल सर तो अपनी परेशानी बता रहे थे कि आजकल के अभिभावक कैसी-कैसी शिकायत लेकर स्कूल में आ जाते हैं। अनुशासन से रहने के कारण संदीप से सभी खुश थे।

~ प्रिंसीपल विजय कुमार

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