इंसान की परख: विद्यार्थियों और बच्चों के लिए शिक्षा देती एक प्रेरक हिंदी कहानी

इंसान की परख: विद्यार्थियों और बच्चों के लिए शिक्षा देती एक प्रेरक हिंदी कहानी

इंसान की परख: एक धनी व्यक्ति का बटुआ बाजार में गिर गया। उसे घर पहुंच कर इस बात का पता चला। बटुए में जरूरी कागजों के अलावा कई हजार रुपए भी थे। फौरन ही वह मंदिर गया और प्रार्थना करने लगा कि बटुआ मिलने पर प्रसाद चढ़ाऊंगा, गरीबों को भोजन कराऊंगा आदि।

संयोग से वह बटुआ एक बेरोजगार युवक को मिला। बटुए पर उसके मालिक का नाम लिखा था इसलिए उस युवक ने सेठ के घर पहुंच कर बदुआ उन्हें दे दिया।

इंसान की परख: प्रेरक हिंदी कहानी

सेठ ने तुरंत बटुआ खोलकर देखा। उसमें सभी कागजात और रुपए यथावत थे। सेठ ने प्रसन्न होकर युवक की ईमानदारी की और उसे बतौर बता कुछ रुपए देने चाहे, जिन्हें लेने से युवक ने मना कर दिया।

इस पर सेठ ने कहा, अच्छा कल फिर आना। युवक दूसरे दिन आया तो सेठ ने उसकी खूब खातिरदारी की। इसका बाद युवक चला गया। युवक के जाने के बाद सेठ अपनी इस चतुराई पर बहुत प्रसन्न था कि वह तो उस युवक को रुपए देना चाहता था पर युवक बिना कुछ लिए सिर्फ खा-पी कर ही चला गया।

उधर युवक के मन में इन सबका कोई प्रभाव नहीं था, क्योंकि उसके मन में न कोई लालसा थी और न ही बटुआ लौटाने के आलावा और कोई विकल्प ही था।

सेठ बटुआ पाकर यह भूल गया कि उसने मंदिर में कुछ बचन भी दिए थे। सेठ ने अपनी इस चतुराई का अपने मुनीम और सेठानी से जिक्र करते हुए कहा, “देखो वह युवक कितना मूर्ख निकला। हजारों का माल बिना कुछ लिए ही दे गया।”

सेठानी ने कहा, “तुम उल्टा सोच रहे हो। वह युवक ईमानदार था। उसके पास तुम्हारा बटुआ लौटा देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। उसने बिना खोले ही बटुआ लौटा दिया। वह चाहता तो सब कुछ अपने पास हो रख लेता। तुम क्या करते? ईश्वर ने दोनों की परीक्षा ली। वह पास हो गया, तुम फेल। अवसर स्वयं तुम्हारे पास चल कर आया था, तुमने लालच के वश उसे लौटा दिया। अब अपनी गलती को सुधारों और जाओ उसे खोजो। उसके पास ईमानदारी की पूंजी है, जो तुम्हारे पास नहीं है। उसे काम पर रख लो।”

सेठ तुरंत ही अपने कर्मचारियों के साथ उस युवक की तलाश में निकल पड़ा। कुछ दिन बाद वह युवक किसी और सेठ के यहां काम करता मिला।

सेठ ने युवक की बहुत प्रशंसा की और बटुए वाली घटना सुनाई, तो उस सेठ ने बताया, “उस दिन उसने मेरे सामने ही जटुआ उठाया था। मैं तभी अपने गार्ड को लेकर इसके पीछे गया। देखा कि यह तुम्हारे घर जा रहा है। तुम्हारे दरवाजे पर खड़े हो कर मैंने सब कुछ देखा व सुना। फिर इसकी ईमानदारी से प्रभावित होकर इसे अपने यहां मुनीम रख लिया। इसकी ईमानदारी से मैं पूरी तरह निश्चित हूं।”

बटुए वाला सेठ खाली हाथ लेकर आया। पहले उसके पास कई विकल्प थे लेकिन उसने निर्णय लेने में देरी की। उसने एक विश्वासी पात्र खो दिया। युवक के पास अपने सिद्धांत पर अटल रहने का नैतिक बल था, उसने बटुआ खोलने के विकल्प का प्रयोग ही नहीं किया। युवक को ईमानदारी का पुरस्कार मिल गया। दूसरे सेठ के पास निर्णय लेने को क्षमता थी, उसे एक उत्साही, सुयोग्य और ईमानदार मुनीम मिल गया।

शिक्षा: Moral of the story

जिन वस्तुओं के विकल्प होते हैं, उन्हीं में देरी होती है। विकल्पों पर बिचार करना गलत नहीं है। लेकिन विकल्पों पर ही विचार करते रहना गलत है। हम ‘यह या वह’ के चक्कर में फंसे रह जाते हैं। विकल्पों में उलझकर निर्णय पर पहुंचने में बहुत देर लगाने से लक्ष्य की प्राप्ति कठिन हो जाती है।

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