Yearly Archives: 2015

जहाँ मैं हूँ – बुद्धिसेन शर्मा

जहाँ मैं हूँ – बुद्धिसेन शर्मा

अजब दहशत में है डूबा हुआ मंजर, जहाँ मैं हूँ धमाके गूंजने लगते हैं, रह-रहकर, जहाँ मैं हूँ कोई चीखे तो जैसे और बढ़ जाता है सन्नाटा सभी के कान हैं हर आहट पर, जहाँ मैं हूँ खुली हैं खिडकियां फिर भी घुटन महसूस होती है गुजरती है मकानों से हवा बचकर, जहाँ मैं हूँ सियासत जब कभी अंगडाइयाँ लेती …

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लो दिन बीता – हरिवंश राय बच्चन

लो दिन बीता - हरिवंश राय बच्चन

सूरज ढलकर पश्चिम पहुँचा डूबा, संध्या आई, छाई सौ संध्या सी वह संध्या थी क्यों उठते–उठते सोचा था दिन में होगी कुछ बात नई लो दिन बीता, लो रात हुई धीमे–धीमे तारे निकले धीरे–धीरे नभ में फैले सौ रजनी सी वह रजनी थी क्यों संध्या में यह सोचा था निशि में होगी कुछ बात नई लो दिन बीता, लो रात …

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फागुन की शाम – धर्मवीर भारती

फागुन की शाम - धर्मवीर भारती

घाट के रस्ते, उस बँसवट से इक पीली–सी चिड़िया, उसका कुछ अच्छा–सा नाम है! मुझे पुकारे! ताना मारे, भर आएँ, आँखड़ियाँ! उन्मन, ये फागुन की शाम है! घाट की सीढ़ी तोड़–फोड़ कर बन–तुलसी उग आयी झुरमुट से छन जल पर पड़ती सूरज की परछाईं तोतापंखी किरनों में हिलती बाँसों की टहनी यहीं बैठ कहती थी तुमसे सब कहनी–अनकहनी आज खा …

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एक कण दे दो न मुझको – अंचल

एक कण दे दो न मुझको - अंचल

तुम गगन–भेदी शिखर हो मैं मरुस्थल का कगारा फूट पाई पर नहीं मुझमें अभी तक प्राण धारा जलवती होती दिशाएं पा तुम्हारा ही इशारा फूट कर रसदान देते सब तुम्हारा पा सहारा गूँजती जीवन–रसा का एक तृण दे दो न मुझको, एक कण दे दो न मुझको। जो नहीं तुमने दिया अब तक मुझे, मैंने सहा सब प्यास की तपती …

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दो दिन ठहर जाओ – रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’

दो दिन ठहर जाओ - रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’

अभी ही तो लदी ही आम की डाली, अभी ही तो बही है गंध मतवाली; अभी ही तो उठी है तान पंचम की, लगी अलि के अधर से फूल की प्याली; दिये कर लाल जिसने गाल कलियों के – तुम्हें उस हास की सौगंध है, दो दिन ठहर जाओ! हृदय में हो रही अनजान–सी धड़कन, रगों में बह रही रंगीन–सी …

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चल उठ नेता – अशोक अंजुम

चल उठ नेता - अशोक अंजुम

चल उठ नेता तू छेड़ तान! क्या राष्ट्रधर्म? क्या संविधान? तू नये ­नये हथकंडे ला! वश में अपने कुछ गुंडे ला फिर ऊँचे­ ऊँचे झंडे ला! हर एक हाथ में डंडे ला! फिर ले जनता की ओर तान! क्या राष्ट्रधर्म? क्या संविधान? इस शहर में खिलते चेहरे क्यों? आपस में रिश्ते गहरे क्यों? घर­ घर खुशहाली चेहरे क्यों? झूठों पर …

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बादलों की रात – रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’

बादलों की रात - रामकुमार चतुर्वेदी ‘चंचल’

फागुनी ठंडी हवा में काँपते तरु–पात गंध की मदिरा पिये है बादलों की रात शाम से ही आज बूँदों का जमा है रंग नम हुए हैं खेत में पकती फ़सल के अंग समय से पहले हुए सुनसान–से बाज़ार मुँद गये है आज कुछ जल्दी घरों के द्वार मैं अकेला पास कोई भी नहीं है है मीत मौन बैठा सुन रहा …

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मदारी आया

मदारी आया

देखो, एक मदारी आया, संग में अपने बन्दर लाया। डम-डम डमरू बजा रहा है, बन्दर को वह नचा रहा है। चली बन्दरिया देकर ताने, बन्दर उसको लगा मनाने। दोनों ने मिल रंग जमाया, अपना-अपना नाच दिखाया।

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