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अवगुंठित – सुमित्रानंदन पंत

अवगुंठित सुमित्रानंदन पंत का कविता संग्रह है।

वह कैसी थी,
अब न बता पाऊंगा
वह जैसी थी।

प्रथम प्रणय की आँखों से था उसको देखा,
यौवन उदय, प्रणय की थी वह प्रथम सुनहली रेखा।

ऊषा का अवगुंठन पहने,
क्या जाने खग पिक के कहने,
मौन मुकुल सी, मृदु अंगो में,
मधुऋतु बंदी कर लाई थी!
स्वप्नों का सौंदर्य, कल्पना का माधुर्य
हृदय में भर, आई थी।

वह कैसी थी,
वह न कथा गाऊंगा
वह जैसी थी।

क्या है प्रणय? एक दिन बोली, उसका वास कहाँ है
इस समाज में? देह मोह का,
देह डोह का त्रास कहाँ है?
देह नहीं है परिधि प्रणय की,
प्रणय दिव्य है, मुक्ति हृदय की

यह अनहोनी रीति,
देह वेदी हो प्राणो के परिणय की।

बंध कर दृद्य मुक्त होते है,
बंध कर देह यातना सहती,
नारी के प्राणों में ममता
बहती रहती, बहती रहती।

नारी का तन माँ का तन है,
जाती वृद्धि के लिए विनिर्मित,
पुरुष प्रणय अधिकार प्रणय है,
सुख विलास के हित उत्कंठित।

तुम हो स्वप्न लोक के वासी,
तुम को केवल प्रेम चाहिए,
प्रेम तुम्हें देती मैं अबला,
मुझको घर की क्षेम चाहिए।

हृदय तुम्हें देती हूँ प्रियतम
देह नहीं दे सकती,
जिसे देह दूंगी अब निश्चित
स्नेह नहीं दे सकती।

अतः विदा दो मन के साथी,
तुम नभ के मैं भू की वासी,
नारी तन है, तन है, तन है,
हे मन प्राणो के अभिलाषी।

नारी देह शिखा है जो
नभ देहो के नव दीप संजोती,
जीवन कैसे देही होता
जो नारीमय देह न होती।

तुम हो सपनो के दृष्टा तुम
प्रेम ज्ञान औ सत्य प्रकाशी,
नारी है सौंदर्य प्राण,
नारी है रूप सृजन की प्यासी।

तुम जग की सोचो मैं घर की,
तुम अपने प्रभु, मैं निज दासी,
लज्जा पर न तुम्हें आती,
वन सकते नहीं प्रेम सन्यासी।

विदा! विदा!
शायद मिल जाएँ यदा कदा।

मैं बोला तुम जाओ,
प्रसन्न मन जाओ मेरा आशी,
उसके नयनों में आंसू थे,
अधरों पर निश्छल हंसी।

वह क्या समझ सकी थी, उस पर
क्यों रीझ था यह आत्मतुर
स्वप्न लोक का वासी?

मैं मौन रहा,
फिर स्वतः कहा,
बहती जाओ, बहती जाओ,
बहती जीवन धरा में,
शायद कभी लौट आओ तुम,
प्राण, बन सका अगर सर्वहारा मैं।

∼ सुमित्रानंदन पंत

About Sumitranandan Pant

सुमित्रानंदन पंत (20 मई 1900 - 28 दिसम्बर 1977) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था। सुमित्रानंदन पंत उस नये युग के प्रवर्तक के रूप में हिन्दी साहित्य में उदित हुए। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' और रामकुमार वर्मा जैसे छायावादी प्रकृति उपासक-सौन्दर्य पूजक कवियों का युग कहा जाता है। सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति चित्रण इन सबमें श्रेष्ठ था। उनका जन्म ही बर्फ़ से आच्छादित पर्वतों की अत्यंत आकर्षक घाटी अल्मोड़ा में हुआ था, जिसका प्राकृतिक सौन्दर्य उनकी आत्मा में आत्मसात हो चुका था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक सौष्ठव उन्हें सभी से अलग मुखरित करता था। पंत का जन्म अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में 20 मई 1900 ई. को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही उनकी माँ का निधन हो गया। उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया। उनका प्रारंभिक नाम गुसाई दत्त रखा गया। वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अल्मोड़ा में हुई। 1918 में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण कर वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नया नाम सुमित्रानंदन पंत रख लिया। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने बारवीं में प्रवेश लिया। 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी के भारतीयों से अंग्रेजी विद्यालयों, महाविद्यालयों, न्यायालयों एवं अन्य सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने के आह्वान पर उन्होंने महाविद्यालय छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी भाषा-साहित्य का अध्ययन करने लगे। इलाहाबाद में वे कचहरी के पास प्रकृति सौंदर्य से सजे हुए एक सरकारी बंगले में रहते थे। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। उन्हें मधुमेह हो गया था। उनकी मृत्यु 28 दिसम्बर 1977 को हुई। पुरस्कार व सम्मान– हिंदी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण (1961), ज्ञानपीठ (1968), साहित्य अकादमी, तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है। आधी शताब्दी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकर्म में आधुनिक हिंदी कविता का पूरा एक युग समाया हुआ है।

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