Home » Poems For Kids » Poems In Hindi » अपनापन – बुद्धिसेन शर्मा
अपनापन – बुद्धिसेन शर्मा

अपनापन – बुद्धिसेन शर्मा

चिलचिलाती धूप में सावन कहाँ से आ गया
आप की आँखों में अपनापन कहाँ से आ गया।

जब वो रोया फूट कर मोती बरसने लग गये
पास एक निर्धन के इतना धन कहाँ से आ गया।

दूसरों के ऐब गिनवाने का जिसको शौक था
आज उसके हाथ में दरपन कहाँ से आ गया।

मैं कभी गुज़रा नहीं दुनियाँ तेरे बाज़ार से
मेरे बच्चों के लिये राशन कहाँ से आ गया।

पेट से घुटने सटाकर सो गया फुटपाथ पर
पूछो दीवाते को योगआसन कहाँ से आ गया।

कोई बोरा तक बिछाने को नहीं है जिसके पास
उसके कदमों में ये सिंहासन कहाँ से आ गया।

मैंने तो मत्थे को रगड़ा था तेरी दहलीज पर
मेरी पेशानी पे ये चंदन कहाँ से आ गया।

कैसे दुनियाँ को बताएँ बंद आँखों का कमाल
मूंदते ही आँख वो फौरन कहाँ से आ गया।

∼ बुद्धिसेन शर्मा

Check Also

International Day of Yoga Images

International Day of Yoga Images, Stock Photos

International Day of Yoga Images, Stock Photos: Yoga is a 5,000-year-old physical, mental and spiritual …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *