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टॉफी चोर: मंजरी शुक्ला

टॉफी चोर: बच्चों के लिए रोमांचक जासूसी कहानी

“केले के छिलकों का ढेर लगा हुआ है और तुम कह रहे हो कि टोनी केले नहीं खाकर तुम्हारी टॉफ़ी चुराकर खाता है” मम्मी ने नाराज़ होते हुए गिल्लू से कहा।

गिल्लू आश्चर्य से टोनी को देखे जा रहा था।

टोनी के चारों तरफ घूमने के बाद वह बोला – “तो अगर टोनी मेरी टॉफ़ी नहीं खाता है तो मेरी टॉफ़ी जाती कहाँ है”?

टोनी मासूम चेहरा बनाता हुआ बोला – “मम्मी, आप तो जानती हो कि मैं सिर्फ़ केले ही खाता हूँ। गिल्लू अपनी सारी टॉफ़ी ख़ुद ही खा जाता है और मेरा झूठा नाम लगा देता है”।

मम्मी ने गिल्लू का कान उमेठते हुए कहा – “एक तो तुम टोनी की तरह कोई फल नहीं खाते हो जो शरीर को इतना फ़ायदा पहुँचाते है, ऊपर से बेचारे टोनी को जब देखो तब परेशान करते रहते हो”।

“छोड़ो मम्मी, दर्द हो रहा है” कहता हुआ गिल्लू अपना कान छुड़ाकर भागा।

तेजी से भागने के कारण वह कमरे के अंदर आते हुए दादाजी को नहीं देख पाया और भड़ाक से जाकर उनसे टकरा गया।

“यह क्या कर दिया” दादाजी ने फ़र्श की ओर देखते हुए पूछा।

“आप इमली तोड़ कर लाए हो, इत्त्ती सारी!” गिल्लू ने ज़मीन पर बिखरी हुई इमलियों को देखते हुए आश्चर्य से पूछा।

“अरे, मैं भला इतने ऊँचे पेड़ पर कैसे चढूँगा। ये तो तेज हवा चलने के कारण पेड़ के आसपास गिरी पड़ी थी”।

“और गायब भी मेरी इमली वाली चटपटी टॉफ़ी ही हो रही है” गिल्लू ने अपनी ठुड्डी पर हाथ रखते हुए सोचा और सिर हिलाया।

“अब ये स्प्रिंग वाले गुड्डे की तरह लगातार सिर क्यों हिला रहा है” दादाजी ने हँसते हुए कहा।

“मैं सोच रहा हूँ कि अगर आपको इमली इतनी पसंद है तो इमली वाली टॉफ़ी भी आप को बहुत अच्छी लगती होगी”।

दादाजी हँस पड़े और गिल्लू के कान के पास जाकर धीरे से बोले – “मेरे मुँह में तो लाल, पीली, खट्टी मीठी गोलियों को सोचकर ही पानी आ रहा है। मैं जब तेरी उम्र का था तो अपने भाई बहनों के बस्तें में से उनकी टॉफ़ी निकालकर चुप्पे से खा लिया करता था”।

“हे हे हे हे…” कहते हुए गिल्लू नकली हँसी हँसा और मम्मी के पास दौड़ता हुआ गया।

मम्मी टोनी के साथ बैठकर बातें कर रही थी।

“मुझे पता चल गया है कि चोर कौन है?” गिल्लू ने मम्मी से एक हाथ की दूरी बनाते हुए कहा।

क्योंकि मम्मी के मूड का कोई भरोसा नहीं था कि कब उसके कान उमेठ दे।

टोनी ने गिल्लू के पास सरकते हुए आँखें छोटी करते हुए पूछा – “वाह, तू बड़ा होकर एक दिन “शेरलॉक होम्स*” से भी बड़ा जासूस बनेगा”।

शेरलॉक होम्स - सर आर्थर कॉनन डॉयल का एक काल्पनिक जासूस चरित्र

शेरलॉक होम्स - सर आर्थर कॉनन डॉयल का एक काल्पनिक जासूस चरित्र

शेरलॉक होम्स उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध का एक काल्पनिक चरित्र है, जो पहली बार 1887 में प्रकाशन में उभरा। वह ब्रिटिश लेखक और चिकित्सक सर आर्थर कॉनन डॉयल की उपज है। लंदन का एक प्रतिभावान ‘परामर्शदाता जासूस “, होम्स अपनी बौद्धिक कुशलता के लिए मशहूर है और मुश्किल मामलों को सुलझाने के लिए अपने चतुर अवलोकन, अनुमिति तर्क और निष्कर्ष के कुशल उपयोग के लिए प्रसिद्ध है।

कोनन डॉयल ने चार उपन्यास और छप्पन लघु कथाएं लिखी हैं जिसमें होम्स को चित्रित किया गया है। पहली दो कथाएं (लघु उपन्यास) क्रमशः 1887 में बीटन्स क्रिसमस ऐनुअल में और 1890 में लिपिनकॉट्स मंथली मैग्जीन में आईं। 1891 में द स्ट्रैंड मैग्जीन में छोटी कहानियों की पहली श्रृंखला की शुरूआत के साथ ही चरित्र की लोकप्रियता में अत्यधिक वृद्धि हुई। बाद में 1927 तक लघु कथाओं की श्रृंखला और दो धारावाहिक उपन्यास प्रकाशित हुए.कथाएं लगभग 1875 से 1914 तक की अवधि को आवृत करती हैं, जिसमें अंतिम मामला 1914 का है।

चार कहानियों को छोड़कर बाकी सभी कहानियां होम्स के दोस्त और जीवनी लेखक डॉ॰ जॉन एच. वाटसन द्वारा सुनाई गई हैं, दो कहानियां खुद होम्स द्वारा सुनाई गईं हैं और दो अन्य तीसरे व्यक्ति द्वारा। दो कहानियों में (“द मुस्ग्रेव रिचुअल” और “द अडवेंचर ऑफ़ ग्लोरिया स्कॉट”) होम्स, वाटसन को अपनी स्मृति से मुख्य कहानी सुनाते हैं, जबकि वाटसन फ्रेम कहानी का वर्णन करते हैं।

कोनन डॉयल ने कहा कि होम्स का चरित्र डॉ॰ जोसेफ बेल से प्रेरित था, जिनके लिए डॉयल ने एक लिपिक के रूप में एडिनबर्ग रॉयल इनफर्मरी में काम किया था। होम्स की तरह, बेल छोटे-छोटे निरीक्षणों से बड़े निष्कर्ष निकालने के लिए जाने जाते थे। माइकल हैरिसन ने 1971 के एक लेख एल्लेरी क्वींस मिस्ट्री मैगज़ीन में तर्क दिया है कि यह चरित्र, वेंडेल शेरर से प्रेरित था जो एक हत्या के मामले में एक “परामर्श जासूस” थे जो कथित रूप से इंग्लैंड में 1882 में अखबारों की सुर्खियों में छाया रहा।

मम्मी ने गिल्लू को घूरते हुए पूछा – “अभी दो मिनट पहले तू कह रहा था कि टोनी चोर है और इतनी जल्दी तूने नए चोर का पता भी लगा लिया”।

“हाँ… लगा लिया” गिल्लू बोला।

“तो अब बता भी दो कि चोर कौन है” टोनी ने हँसते हुए कहा।

“दादाजी… दादाजी है चोर, वहीँ मेरी इमली वाली टॉफ़ी चुरा रहे है” गिल्लू फुसफुसाते हुए बोला।

टोनी के मुँह से पानी निकलकर मम्मी के मुँह पर उछल गया।

मम्मी बोली – “क्या बोला दादाजी… ठहर तू, बताती हूँ तुझे अभी” कहते हुए मम्मी गिल्लू की तरफ़ बढ़ी।

गिल्लू जो हमेशा ही दौड़ने की पोज़िशन में खड़ा रहता था, सिर पर पैर रखकर भागा।

पलक झपकते ही गिल्लू नौ दो ग्यारह हो गया।

“बचा लो दादाजी…” गिल्लू दादाजी के पीछे खड़ा होता हुआ बोला।

तब तक मम्मी भी वहाँ गुस्से से काँपती हुई आ चुकी थी।

“अरे क्या हो गया?” दादाजी गिल्लू को अपनी गोदी में बैठाते हुए बोले।

मम्मी सकपका गई और वहाँ से चली गई।

वह दादाजी को गिल्लू के कारनामों के बारे में कैसे बताती।

गिल्लू ही लड़ियाते हुए बोला – “दादाजी, आप पूरी टॉफ़ी चुराकर मत खाया करोI थोड़ी तो मेरे लिए बचा दिया करो”।

दादाजी हँसते हँसते दोहरे हो गए और बोले – “अरे बाबा, मैंने तो तुम्हारी टॉफ़ी देखी भी नहीं है और मैं भला क्यों चुराऊँगा। तुम तो मुझे दे ही दोगे”।

“आप बिलकुल ठीक कह रहे हो दादाजी, अब मुझे फ़िर से ढूँढना पड़ेगा कि आख़िर टॉफ़ी चोर है कौन?” कहता हुआ गिल्लू दादाजी की गोदी से उछलकर भागा।

सामने ही बगीचे में दादी इमली बिन रही थी।

गिल्लू का शैतानी भरा दिमाग तुरँत चल पड़ा।

तभी टोनी उसके पास आकर बोला – “देखा तूने, दादी कितनी देर से इमली बिन रही है”।

“सफाई कर रही होंगी” गिल्लू कुछ सोचता हुआ बोला।

“क्यों भला, बगीचे में इतने पेड़ है और वह इमली के पेड़ के नीचे ही क्यों सफाई कर रही है और वैसे भी माली काका तो पास ही खड़े है। देखा नहीं कैसे दादी ने माली काका को रोक दिया है इमली उठाने से!” टोनी धीरे से बोला।

“ओह! तो क्या दादी चोर है!” गिल्लू ने सिर पर हाथ रखते हुए कहा।

“पक्का… दादी ही तेरी इमली वाली रंगबिरंगी गोलियाँ चुरा कर खाती है” कहता हुआ टोनी भाग खड़ा हुआ।

तभी दादी ने गिल्लू को देखा और उसके पास आकर मुस्कुराते हुए बोली – “देख, तेरे दादाजी के लिए कितनी सारी इमली इकठ्ठा कर ली। खुश हो जाएँगे ढेर सारी इमली देखकर”।

“आज दोबारा पीटने से बच गया हूँ मैं, वरना मम्मी मेरी चटनी ही बना देती” सोचता हुआ गिल्लू वापस अपने कमरे की ओर चल पड़ा।

रात को जब वह अपने सुंदर से काँच के डिब्बे के पास गया, जिसमें टॉफ़ी रखी रहती थी, तो चीख उठा। डिब्बे से टॉफ़ियाँ फ़िर गायब थी।

गिल्लू तुरँत पापा के पास पहुँचा ओर बोला – “आप घर में सीसीटीवी कैमरा लगवा दो ताकि मुझे पता चल सके कि कौन मेरी टॉफ़ी चुरा रहा है!”

पापा का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया।

वह कुछ कहते इससे पहले ही टोनी बोला – “कैमरे लग जाएँगे तो तू बड़ा जासूस कैसे बनेगा”।

गिल्लू ने तैश में आते हुए कहा – “अब परसों तक का सारा होमवर्क आज ही करने के बाद मैं सोमवार तक चोर को ढूँढ ही निकालूँगा”।

मम्मी बोली – “मैं फ़िर से कह रही हूँ कि तुझे ग़लतफ़हमी हो रही है। तू टॉफ़ी खाने के बाद भूल जाता है कि डिब्बे में कितनी टॉफ़ी बची है और उसके बाद सबको चोर समझ रहा है”।

गिल्लू ने मम्मी की बात का कोई जवाब नहीं दिया और अपना होमवर्क करने चला गया ताकि वह चोर को रंगे हाथों पकड़ सके।

अगले दिन सुबह से ही गिल्लू सबको बहुत ध्यान से देख रहा था।

वह चुपके चुपके सबके पीछे चल रहा था और सब हँसी के मारे दोहरे हुए जा रहे थे।

तभी दादाजी बोले – “तू इस तरह से चोर को कैसे पकड़ेगा। अगर उसे पकड़ना ही है तो अपने टॉफ़ी के डिब्बे के पास जाकर बैठो”।

गिल्लू ने दादाजी की बात सुनी और मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर चला गया।

थोड़ी ही देर बाद टोनी ने कमरे में झाँका तो गिल्लू अपने कमरे में चादर ओढ़े लेटा हुआ था।

टोनी हँसता हुआ बोला – “बेचारा चोर ढूँढते ढूँढते थक कर सो गया। अरे, आजकल के चोर भी बहुत स्मार्ट होते है। हैं ना दादाजी?”

दादाजी मुस्कुरा दिए और टोनी मम्मी से बोला – “मम्मी, जल्दी से केले दे दो, भूख लगी है”।

मम्मी टोनी को केले पकड़ाते हुए बोली – “एक यह है जो हमेशा फल खाया करता है और एक वो गिल्लू है जो दिन भर टॉफ़ी के पीछे परेशान घूमता रहता है मानों कोई खज़ाना चोरी हो गया हो”।

टोनी तुरँत अपने कमरे की ओर भागा और बिस्तर पर बैठ गया।

उसने केले का छिलका उतारा और केला खाने लगा।

वह आँखें बंद करते हुए बड़ा स्वाद लेकर केला खा रहा था, तभी उसे लगा कि उसके पास कोई बैठा है।

उसने हड़बड़ाते हुए आँखें खोली तो गिल्लू के साथ, दादा, दादी, मम्मी और पापा उसके सामने खड़े हुए उसे घूर रहे थे।

“वो वो वो…” टोनी हकलाते हुए बोला।

“देखो मम्मी, आप इसकी कारस्तानी…” गिल्लू ने टोनी के हाथ से केला छीनते हुए कहा।

और केला देखते ही मम्मी के साथ साथ सभी की आँखें आश्चर्य से फ़ैल गई।

केले में ढेर सारी रंगबिरंगी खट्टी मीठी गोलियाँ चिपकी हुई थी।

“तो… तो गिल्लू के पलंग पर कौन सोया था …”टोनी ने बिस्तर से कूदते हुए पूछा।

“हा हा हा…” गिल्लू, दादा-दादी और मम्मी-पापा के ठहाकों से कमरा गूँज उठा।

और बेचारा टोनी कभी नहीं जान पाया कि टोनी के पलंग पर पापा लेटे हुए थे और सबने मिलकर आज उसे रंगें हाथों पकड़ने का प्लान बनाया था।

~ डॉ. मंजरी शुक्ला

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