शिबू का नया साल: गरीब विद्यार्थी की प्रेरक कहानी

शिबू का नया साल: गरीब विद्यार्थी की प्रेरक कहानी

नया साल आने वाला था और क्लास के सभी बच्चों में खुसुर पुसुर शुरू हो गई थी। सबको पता था कि इस साल भी प्रिंसिपल सर बच्चों के साथ नए साल पर कोई बढ़िया सा आइडिया लेकर आएँगे। क्लास का मॉनीटर दीपेश डस्टर से दस बार ब्लैक बोर्ड पोंछ चुका था पर प्रिंसिपल सर ने अभी तक एंट्री नहीं ली थी। जैसे ही उसे गुप्ता सर के साथ प्रिंसिपल सर की आवाज़ सुनाई दी वह फ़िर से ब्लैक बोर्ड साफ़ करने लगा।

प्रिंसिपल सर ने उसे मुस्कुराकर देखा और क्लास के अंदर आ गए।

पहली बेंच पर बैठा हुआ सागर बोला – “अगर सर थोड़ी देर और ना आते तो आज हमारा ब्लैक बोर्ड व्हाइट बोर्ड बन जाता।”

क्लास में इस बात पर एक जोरदार ठहाका गूँज उठा।

प्रिंसिपल सर बोले – “इस बार नए साल के पहले दिन को हम सब बिलकुल अलग तरह से मनाएँगे।”

सभी बच्चे मुस्कुरा उठे।

“सर, जल्दी बताइये, हम तो कब से इंतज़ार कर रहे है” नैना ने तुरंत कहा।

“इस बार सभी बच्चे अपने पापा और मम्मी के साथ स्कूल आएँगे और सबके मम्मी-पापा अपने बारे में थोड़ा-थोड़ा बताएँगेी” प्रिंसिपल सर ने कहा।

प्रिंसिपल सर की बात सुनते ही सभी बच्चों ने ख़ुशी से तालियाँ बजाई और एक बार में ही सहमति दे दी।

समता बोली – “सर, आपने बहुत अच्छी बात कही। हमारे मम्मी-पापा को भी अपने स्कूल के दिन याद आ जाएँगे”।

प्रिंसिपल सर बोले – “तो 1 जनवरी को मैं आप सभी की बैठने की व्यवस्था ऑडिटोरियम में करवा दूँगा। सब टाइम पर पहुँच जाना”।

बच्चे ख़ुशी से चीख उठे। मम्मी पापा के साथ उनके अनुभव शेयर करने की बात सुनकर सब को मज़ा आ गया। बस फ़िर क्या था दिन भर जब भी मौका मिलता बच्चे अपने मम्मी पापा के बारे में अपने दोस्तों को बताते रहे और खुश होते रहे। पर क्लास में अचानक ही जैसे कोई बुत बन गया था तो वो था शिबू…

शिबू के समझ ही नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे।

उसकी माँ उसी स्कूल में सफाई का कार्य करती थी।

प्रिंसिपल सर ने उनकी सालों की मेहनत और ईमानदारी को देखते हुए शिबू की फ़ीस माफ़ कर दी थी और किताबों की व्यवस्था भी वह स्कूल से ही करवा देते थे।

हर इतवार के दिन शिबू उनके घर जाकर पढ़ता भी था, पर ये बात पूरे स्कूल में किसी को पता नहीं थी।

तभी शिबू को क्लास के बाहर माँ झाड़ू लगाती हुई दिखी।

पसीने में तरबतर माँ उसे देखकर मुस्कुराई पर शिबू ने उन्हें देखकर नज़रें नीची कर ली।

तभी शिबू का दोस्त मिहिर बोला – “आज तक तूने हमें अपने मम्मी से नहीं मिलवाया है, इस बार तो हम उनसे ढेर सारी बातें करेंगे”।

शिबू का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया। वह तुरंत वहाँ से उठकर चला गया। शाम को जब माँ घर लौटकर आई तो वह सिर दर्द का बहाना करते हुए औंधा पड़ा रहा। ना उसने होमवर्क किया और ना ही खाना खाया। पता नहीं क्लास की सब बातें सोचते हुए वह कब सो गया।

सपने में भी उसे, उसकी क्लास के बच्चे, उसकी माँ का मज़ाक ही उड़ाते दिखे।

अब शिबू का हँसना बोलना सब बंद हो गया।

वह घुमा फ़िराकर बच्चों से कहता कि हम लोग प्रिंसिपल सर से कहते है कि उस दिन पिकनिक चले या फ़िर कुछ और कार्यक्रम कर ले। पर कोई भी बच्चा उसकी बात पर ध्यान नहीं देता। सभी अपने मम्मी पापा के स्कूल आने की बात को लेकर बहुत खुश थे। जहाँ एक ओर बच्चे नए साल को लेकर दुगुने उत्साह में थे वहीं दूसरी ओर शिबू का दिल बैठा जा रहा था।

शिबू के ना चाहने पर भी नया साल आ ही गया।

आज एक जनवरी थी और बच्चे हो या बूढ़े सभी के चेहरे ख़ुशी से चमक रहे थे। लोग एक दूसरे को नए साल की बधाइयाँ ओर शुभकामनाएँ दे रहे थे। शिबू का मन स्कूल जाने का बिलकुल नहीं था। माँ जितनी बार आवाज़ लगाती वह चादर और कस कर पकड़ लेता।

माँ ने शिबू का माथा चूमते हुए कहा – “नया साल बहुत बहुत मुबारक हो”।

शिबू का मन हुआ कि माँ के गले लग कर खूब रोये पर वह उनके पैर छूकर चुपचाप खड़ा हो गया। माँ ने आर्शीवादों की झड़ी लगा दी और उसके लिए नाश्ता बनाने लगी।

अगर उसे प्रिंसिपल सर का डर ना होता तो आज वह किसी भी कीमत पर स्कूल ना जाता। किसी तरह से जैसे तैसे तैयार होकर वह भारी क़दमों से स्कूल के लिए चल पड़ा। थोड़ा ही आगे जाने पर उसके मोहल्ले के दो बच्चे उसे कूड़े के ढेर के पास प्लास्टिक की बोतले बीनते हुए मिले।

एक बच्चा बोला – “सुनो…”

शिबू उसकी आवाज़ सुनकर रूक गया। एक ही मोहल्ले में रहने के कारण वह इन बच्चों को बहुत अच्छी तरह से पहचानता था। शिबू उनके पास जाकर खड़ा हो गया।

वह बच्चा बोला – “हैप्पी नई ईयर…”

शिबू मुस्कुरा उठा और बोला – “हैप्पी न्यू ईयर कहते है”।

“हाँ… हमें सही पता नहीं है हम स्कूल नहीं जाते हैं ना तुम्हारी तरह… पर हमें बहुत अच्छा लगता है तुम्हें स्कूल जाते देखकर…” वह बच्चा प्लास्टिक की बोतल को थैले में रखते हुए बोला।

” हाँ… जिस समय तुम स्कूल बैग टाँगकर घर से निकलते हो, उसी समय हमें ये कूड़े का थैला लेकर निकलना पड़ता है” दूसरे बच्चे ने कहा।

शिबू बोला – “तुम दोनों तो मेरे घर के पीछे ही रहते हो ना”?

“हाँ… तुम हम दोनों को भी पढ़ा दिया करो। हम दोनों स्कूल नहीं जाते ना…” एक बच्चे ने शिबू के स्कूल बैग को ललचाई नज़रों से देखते हुए कहा।

“पढ़ा दूँगा” कहते हुए शिबू के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई।

दोनों बच्चे हँसते हुए चल दिए।

तभी एक बच्चा दूसरे से बोला – “इसकी मम्मी बहुत अच्छी है, वह इसके पापा के नहीं होने पर भी इसे रोज़ स्कूल भेजती है वरना इसे भी रोज़ सुबह हमारी तरह …”

इसके आगे शिबू कुछ सुन नहीं सका।

उसकी आँखों से आँसूं बह निकले और वह रोते हुए घर की ओर दौड़ पड़ा, माँ को अपने साथ स्कूल ले जाने के लिए…

~ डॉ. मंजरी शुक्ला

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