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वीर राजा की कहानी जो गणित से हार गया: गणित का डर

वीर राजा की कहानी जो गणित से हार गया: गणित का डर

बहुत समय पहले की बात है बुद्धीनगर नाम के राज्य में एक राजा रहा करता था। राज्य के नाम के अनुसार ही वहाँ पर रहने वाले सब बड़े बुद्धिमान थे और किसी भी मुसीबत का हल चुटकियों में निकाल लेते थे।

पर बुद्धीनगर का राजा, जिसका नाम तो था वीरसेन, बड़ा डरपोक था। वह अपने नाम के बिलकुल उल्टा था।

दूसरों की नज़रों में तो वह बड़ा वीर था पर गणित का नाम आते ही उसके हाथ पैर काँपने लगते थे। वह गणित के विषय से बहुत डरता था।

इतने बड़े राज्य का राजा होने के बाद भी अगर उसके सामने कोई जोड़ने घटाने की बात करता तो वह घबराकर भाग जाता।

उसकी गणित से डरने की कहानी भी बड़ी मज़ेदार है।

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जब बचपन में वह गुरुकुल में पढ़ता था तभी उसके साथ एक अनोखी घटना हो गई जिसने उसे गणित के विषय से बहुत दूर कर दिया।

एक बार वीरसेन गुरुकुल में सभी विद्यार्थियों के साथ बैठा कोई सवाल हल कर रहा था कि तभी उसके सिर पे एक कटहल आकर गिर पड़ा।

“बूम!” जब तक कोई कुछ समझ पाता वीरसेन अपना सिर पकड़कर वहीँ ज़मीन पर लोट गया।

वो तो कहो कटहल छोटा था वरना बेचारे वीरसेन का पता नहीं क्या हुआ होता।

ठीक होने के बाद भी वह कई दिनों तक कई दिनों तक आराम फ़रमाता रहा।

पर वह गणित पढ़ने के नाम से ही घबराने लगा था।

किसी तरह ठोंक पीटकर गुरूजी ने उसे वापस गणित पढ़ने के लिए बैठाया।

पर जब वह दुबारा गणित पढ़ने बैठा तो तो किसी शैतान बच्चे ने उसी पेड़ के ऊपर बने मधुमक्खी के छत्ते पर पत्थर मार दिया।

बाकी बच्चे तो भाग खड़े हुए पर गोल मटोल वीरसेन जब तक कुछ समझ पाता उस पर मधुमक्खियों ने आक्रमण कर दिया।

गुरूजी ने तुरंत कम्बल मँगवाकर उसके ऊपर कम्बल डाला और उसे वहाँ से ले गए।

पर तब तक तो कई मधुमक्खियां उसे डंक मार चुकी थी।

वीरसेन रोते-रोते बस एक ही बात कह रहा था कि मैं अब कभी गणित नहीं पढ़ूँगा।

दो चार दिन में वीरसेन की सूजन भी चली गई और वह ठीक भी हो गया।

पर कुछ नटखट बच्चों ने उससे कहा कि अगर वह गणित पड़ेगा तो उसके सिर पे दुबारा कटहल गिर जाएगा और मधुमक्खियां भी काट खाएंगी।

गुरु जी को जब ये बात पता चली तो पहले तो उन्होंने उन बच्चों को डाँटा और उसके बाद वीरसेन से कहा – “हम उस जगह पर नहीं बैठेंगे जहाँ पर कटहल का पेड़ हो और मधुमक्खियों का छत्ता हो। हम इस बार कमरे के अंदर ही पढ़ेंगे”।

पर वीरसेन इतना डर चुका था कि वह किसी भी कीमत पर गणित पढ़ने को तैयार ही नहीं हुआ।

जब भी गुरु जी गणित पढ़ाते तो वह इतनी दूर चला जाता जहाँ पर उसे कोई ढूंढ ही ना सके।

धीरे धीरे गुरूजी समझ गए कि वीरसेन को गणित पढ़ाना नामुमकिन है, इसलिए उन्होंने वीरसेन को गणित छोड़कर बाकी विषयों पर ही ध्यान देने के लिए कहा।

समय व्यतीत होता गया और जब वीरसेन गुरुकुल से अपनी शिक्षा पूरी करके निकला तो गणित के मामले में वह अपने चेहरे की तरह पूरा गोल था।

पूरा राज्य जहाँ उसके वापस लौटने से खुशियों से झूम रहा था वहीँ दूसरी ओर उसके पिता, हर्षसेन चिंता के मारे घुले जा रहे थे।

उन्होंने वीरसेन को अकेले में बुलाकर कहा – “तुम्हें ना तो जोड़ना आता है ना घटाना, ना ही भाग देना और ना ही गुणा करना यहाँ तक कि तुम हमारे राजमहल के सदस्य तक नहीं गिन सकते हो”।

वीरसेन ने कुछ सोचा और बोला – “पर पिताजी, हम हमारे राजमहल के लोग क्यों गिनेंगे, क्या उन्हें कोई चुराकर ले जा रहा है”?

ऐसा बुद्धिमानी भरा उत्तर सुनकर राजा चकित रह गए। उनके मुँह से एक शब्द भी नहीं निकल सका और वह अपना सिर पकड़ते हुए वहाँ से चले गए।

राजगद्दी को अपने इकलौते पुत्र को देनी ही थी सो राजा ने जिस दिन वीरसेन का राजतिलक किया उसी दिन महामंत्री को साए की तरह उसके साथ रहने के लिए कह दिया।

महामंत्री था तो बहुत बुद्धिमान पर वह लम्बे समय से राजगद्दी हथियाने की फ़िराक में था।

उसे जैसे ही पता चला कि वीरसेन को जोड़ना घटाना नहीं आता है तो वह ख़ुशी से नाच उठा।

पर उसने ये बात किसी और को नहीं बताई कि कहीं कोई वीरसेन को सचेत ना कर दे।

अब तो हर दिन वह कोई ना कोई काम बताकर वीसरसेन से पैसे ऐंठने लगा।

कभी वह तालाब बनवाने की बात करता तो पचास स्वर्ण मुद्राओं की जगह सौ स्वर्ण मुद्राएं ले जाता तो कभी दान पुण्य के नाम पर दो सौ की जगह चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ ले जाता।

धीरे धीरे दरबार में कानाफूसी शुरू हो गई और सबको पता चल गया कि वीरसेन को बिलकुल भी जोड़ना घटाना नहीं आता और महामंत्री इस बात का फ़ायदा उठा रहा है।

पर इस बात को भला बताए कौन?

सभी महामंत्री से बहुत डरते थे कि कहीं वह उन्हें ही दरबार से ही ना निकलवा दे इसलिए कोई भी वीरसेन को महामंत्री के बारे में बताने से डर रहा था।

एक दिन महामंत्री शस्त्र खरीदने के लिए वीरसेन से स्वर्ण मुद्राएँ माँग रहा था कि तभी दरबार में घोड़े बेचने के लिए एक व्यापारी आया।

वह व्यापारी इतने सुन्दर कपड़े और कीमती जेवराहत पहने हुआ था कि वीरसेन के साथ साथ सभी मन ही मन उसकी प्रशंसा करने लगे।

उसने वीरसेन के सामने जाकर सिर झुकाकर अभिवादन किया और बेहद नम्रता से बोला – “महाराज, मेरे पास बेहद उम्दा नस्ल के सौ घोड़े है। अगर आप उन्हें को खरीद ले तो आपकी सेना को बहुत फ़ायदा होगा क्योंकि वे सभी घोड़े इतना तेज दौड़ते है कि आपको लगेगा कि वे उड़ रहे है”।

वीरसेन ने अपने वजीर से कहा – “आप घोड़ों को एक बार देखकर आइये अगर वे घोड़े उतनी ही अच्छी नस्ल के है, जितना ये व्यापारी बता रहा है तो हम उन्हें खरीद लेंगे”।

राजा की बात सुनते ही वजीर अपने साथ कुछ और दरबारियों को लेकर गया और थोड़ी देर बाद आकर बोला-“महाराज, सभी घोड़े बेहद आकर्षक और मजबूत है। आप उन्हें हमारे अस्तबल के लिए खरीद सकते है”।

वीरसेन ने व्यापारी से पूछा – “एक घोड़े की कीमत कितनी है”?

महामंत्री के कान ये सुनते ही खड़े हो गए। उसके मन में तुरंत गुणा भाग चलने लगा।

वह व्यापारी की ओर ध्यान से देखने लगा।

व्यापारी बोला – “महाराज, वैसे तो एक घोड़े की कीमत सौ स्वर्ण मुद्राएँ है पर आप को जो ठीक लगे वो दे दीजिये”।

वीरसेन खुश होते हुए बोला – “नहीं, नहीं, तुमने बिलकुल उचित कीमत बताई है”।

वीरसेन ने महामंत्री से धीरे से पूछा – “अगर एक घोड़े की कीमत सौ स्वर्ण मुद्राये है तो सौ घोड़ों की कीमत कितनी होगी”।

महामंत्री झूठी हँसी हँसते हुए धीरे से बोला – “बीस हज़ार स्वर्ण मुद्राएं होंगी। मैं अभी जाकर ले आता हूँ”।

वीरसेन ने मुस्कुराते हुए कहा – “अभी महामंत्री जी आपको उन घोड़ों की कीमत लाकर दे रहे है”।

व्यापारी ने कहा – “महाराज, आप घोड़ों को भी अस्तबल में रखवा दीजिये वे भी भूखे और प्यासे होंगे”।

वीरसेन के इशारा करते ही वजीर के साथ ही कुछ सदस्य उन घोड़ों को अस्तबल में भेजने के लिए चल दिए।

तभी महामंत्री एक लाल रंग के रेशमी थैले लाया और व्यापारी के हाथ में देता हुआ बोला – “ये आपके घोड़ों की कीमत…”।

व्यापारी ने थैला लिया और वीरसेन से बोला – “महाराज, अच्छा हुआ आपने सारे घोड़े खरीद लिए। मुझे दस हज़ार स्वर्ण मुद्राओं की सख़्त आवश्यकता थी”।

“हाँ, अच्छा है और बाकी दस भी आपके किसी काम आ जाएंगे”। महामंत्री के पास खड़े एक मंत्री ने कहा जिसने बीस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ वाली बात सुन ली थी।

“नहीं महाराज, एक घोड़े की कीमत सौ स्वर्ण मुद्राएं है तो सौ घोड़ों की कीमत तो दस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ हुई, तो भला आप मुझे बीस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ क्यों दे रहे है”?

वीरसेन ने आश्चर्य से महामंत्री की ओर देखा जिसके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थी।

वीरसेन समझ गया कि महामंत्री ने उससे झूठ बोला है। वह गुस्से में सिहांसन से उठ खड़ा हुआ और बोला – “सच्चाई क्या है महामंत्री जी”?

महामंत्री ने अपना सिर शर्म से झुका लिया।

सभी दरबारियों ने एक दूसरे को देखा और सोचा कि यहीं सही समय है महामंत्री की करतूतों के बारें में बताने के लिए, और फिर एक के बाद एक करके सभी ने महामंत्री के झूठों का पुलिंदा खोलकर रख दिया।

वीरसेन अपना सिर पकड़कर चुपचाप सिहांसन पर बैठ गया।

थोड़ी देर बाद उसने महामंत्री की ओर देखा जो डर के मारे थर थर काँप रहा था।

वीरसेन संयत स्वर में महामंत्री की तरफ़ देखता हुआ बोला – “आपसे ज़्यादा मेरी गलती है क्योंकि मैंने आप पर आँख मूँद कर विश्वास किया। दुर्घटनाएँ तो किसी के साथ भी हो सकती है पर मैं उनका मुकाबला करने के बजाय उनसे डर कर भाग गया”।

“पर आप आज से महामंत्री नहीं रहेंगे और इस दरबार में कभी नहीं आएंगे”।

व्यापारी जो अब तक खड़ा सब देख रहा था धीरे से बोला-“महाराज, अगर आप बुरा ना माने तो एक बात कहूं”।

“बिलकुल कहिये” वीरसेन से उसे गौर से देखते हुए कहा।

व्यापारी बोला – “सीखने की कोई उम्र नहीं होती महाराज, आप अभी भी गणित सीख सकते है”।

“अरे वाह, ये तो मैंने सोचा ही नहीं”। वीरसेन खुश होते हुए बोला और कोषाध्यक्ष से बोला – “कल सुबह से ही आप मुझे गणित सिखायेंगे”।

“जी महाराज, मैं आपको पढ़ाने कहाँ पर आ जाऊं”।

“कटहल के बाग़ में, क्योंकि कटहल हमेशा नहीं गिरते” कहते हुए वीरसेन ठहाका मारकर हँस पड़ा।

गणित का डर ~ मंजरी शुक्ला

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