जिंदगी से बड़ा इम्तिहान? असफलता में छिपी है सफलता

जिंदगी से बड़ा इम्तिहान? असफलता में छिपी है सफलता

चंद पंक्तियों को माता पिता के आँसुओं पर भारी रखकर चले जाना और बड़ी आसानी से लिख देना “मैं आपकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाया… या फिर मेरा पेपर अच्छा नहीं हुआ, इसलिए मैं जा रहा हूँ हो सके तो मुझे माफ़ कर देना…”।

बारहवीं की परीक्षा के मात्र दो पेपर होने के बाद ही समाचार पत्र मासूम बच्चों की मौत की ख़बरों से भरे नज़र आ रहे है।

ऐसा क्या हो गया अगर एक पेपर अच्छा नहीं हुआ है तो या फिर ऐसा क्या हो गया, अगर सारे ही पेपर मनमुताबिक नहीं हो सके और आगे भी ऐसा क्या हो जाएगा अगर कोई बच्चा बारहवीं के इंतिहान में अनुत्तीर्ण हो गया तो।

क्या हो जाएगा ऐसा की सोलह, सत्रह वर्ष की आयु में वह अपने परिवार को रोता बिलखता छोड़ पंखें से झूल जाता है, ट्रेन के आगे कूदकर अपनी जान दे देता है।

ज़िंदगी तो बेहद खूबसूरत और धूप की तरह उजली होती है। माता पिता जिस बच्चे को ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाते है उन्हें स्वप्न में भी अंदेशा नहीं होता कि एक दिन वह बच्चा खुद को इतना बड़ा समझने लगेगा कि उनके कंधे पर चढ़कर इस संसार से विदा हो जाएगा।

बच्चा अपने पसंद के कालेज में एडमिशन नहीं पा सकेगा अगर उसके नंबर कम आ गए तो… वह पड़ोस वाले गुप्ता जी के बच्चे से पीछे रह जाएगा… वह खानदान की नाक कटा देगा… तो जो माता पिता यह बातें अपने बच्चों को दिन रात बोलते हैं उनसे मैं पूछना चाहती हूँ कि पड़ोस वाले गुप्ता जी के बच्चे से अपने बच्चे की किस बात पर प्रतियोगिता करनी है, क्या वह ज्यादा पैसे कमा लेगा या फिर उसकी पार्किंग में दो गाड़ियाँ और आकर धुल फाँकेंगी। चार गाड़ियाँ तो कोई भी एक साथ चला नहीं सकता है। खुदा ना खास्ता कल को गुप्ता जी का बच्चा उन्हें वृद्धा आश्रम छोड़कर आता है तो क्या आप भी अपने बच्चे से कहोगे कि चलो, जल्दी से मुझे भी किसी “ओल्ड एज होम” छोड़ आओ क्योंकि गुप्ता जी के बच्चे ने तो उन्हें वही पर एक मोटी रकम के साथ डाल दिया है।

कौन से खानदान की दिन रात दुहाई दी जाती है जिस खानदान को मोहल्ले के बाहर कोई जानता भी नहीं… एक पीढ़ी के ऊपर किसी को किसी का नाम याद नहीं रहता तो फिर इतना हो हल्ला किसलिए! पर कई बार देखा गया है कि माता पिता कोई दवाब नहीं डालते बल्कि वह बच्चे को उसके अनुसार ही जीने देते हैं और उस पर भी बच्चा आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर लेता है और पीछे छोड़ जाता है ज़िंदगी भर माँ बाप को खून के आँसूं रोने के लिए।

मेरे जाननेवालों में ही एक ऐसी महिला है जिनकी बेटी ने बारहवीं की परीक्षा के रिज़ल्ट आने से पहले ही छत पर जाकर आत्महत्या कर ली थी क्योंकि उसे लगा था कि दिल्ली में अपने मनपसंद कालेज में एडमिशन नहीं पा सकेगी। आज उस घटना को करीब पाँच वर्ष हो रहे है। उन महिला का इलाज कराते कराते घरवाले करीब करीब भिखारी बन चुके हैं पर अभी भी वह ना किसी से कुछ बोलती हैं ना खाती है और ना ही कुछ करती है। बस मूर्ति की तरह एक जगह चुपचाप बैठी रहती है। बेटी के मृत शरीर को देखने के बाद उन्हें ऐसा सदमा लगा कि वह खुद भी एक ज़िंदा लाश बन कर रह गई।

उस बेटी ने एक बार भी अपनी माँ के लिए नहीं सोचा। छात्रों को पेपर खराब होने पर या मनपसंद कालेज नहीं मिलने पर कम से कम एक बार तो अपने माता पिता की ओर देखना चाहिए। जिन बच्चों के जरा सा बीमार होने पर माँ बाप ज़मीन आसमान एक कर देते हैं उन्हें वे किस तरह से अपनी आँखों के आगे से जाता हुआ देखते है, उस दर्द की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता है।

बच्चों को इतना बड़ा कदम उठाने से पहले एक बार तो सोचना चाहिए कि उनके घरवालों का उनके बाद क्या होगा।

आज तक किस माता ने कहा होगा कि अगर पेपर खराब हो जाए तो बच्चा अपनी जान दे दे, उन्हें मुँह ना दिखाए या फिर वे उसका परित्याग कर देंगे। ऐसा कहीं होता हैं क्या कि जीवन में आई छोटी मोटी परेशानियों से घबराकर मौत को गले लगा लो। कोई नहीं जानता आगे आने वाला कल शायद ये परीक्षा खराब होने के कारण ही जीवन को एक नई दिशा दे दे। क्या पता ज़िंदगी अन्य रूप में, किसी नई राह पर बाँह फैलाये खड़ी हो और उसे गले लगाने का यह सुनहरा मौका दिया ही नहीं जा रहा हो।

किसी भी महापुरुष की जीवनी उठाकर पढ़ ली जाए तो उनका संघर्ष देखकर विश्वास ही नहीं होता कि इन्होने सभी प्रतिकूल परिस्तिथितयों के बावजूद भी इतना कष्ट उठाकर अपनी मंज़िल पाई होगी। पर मुझे लगता हैं तभी वे आज हमारे प्रेरणा स्त्रोत है और किताबों के द्वारा लाखों करोड़ो लोगो का मार्गदर्शन कर रहे है। अगर उन्होंने भी कायरता पूर्ण कदम उठाकर मौत को गले लगा लिया होता तो आज उन्हें कोई नहीं जानता होता।

परीक्षा ज़रूरी है ताकि वह छात्र को एक मुकाम दे सके, वह अपने सपनों को सच कर सके। पर इसके लिए हर छात्र को सदैव खुद से ही स्पर्धा करनी होगी। चाहे वह पढ़ाई हो, खेलकूद या फिर जीवन के उतार चढ़ाव …

~ डॉ. मंजरी शुक्ला [अप्रैल की अहा! ज़िंदगी में मेरा लेख “जिंदगी से बड़ा इम्तिहान?”]

Check Also

Munshi Premchand Heart Touching Story - Festival of Eid

Festival of Eid: Premchand Story For Students

Festival of Eid – Idgaah story in English: Premchand [1] A full thirty days after …