ज्ञान का मूल्य: जब भी पढ़ो - मन लगाकर के पढ़ो और पूरी एकाग्रता के साथ करो

ज्ञान का मूल्य: जब भी पढ़ो – मन लगाकर के पढ़ो और पूरी एकाग्रता के साथ करो

ज्ञान का मूल्य: अभिषेक 10वीं कक्षा का छात्र था। वह छोटी कक्षाओं से ही अपने पापा और दादा जी को ज्ञान की बहुत-सी पुस्तकों को पढ़ते देखता रहता था। उसकी बड़ी बहन तथा वह जब भी अपने पापा तथा दादा जी को कोई भी प्रश्न पूछते तो वे तुरन्त उस प्रश्न का उत्तर दे देते थे।

वह अपने दादा जी को पूछता, “दादा जी, आपने और पापा ने इतनी सारी जानकारी कैसे प्राप्त की हुई है? मैं और दीदी जब भी आप और पापा जी को जो कुछ भी पूछते हैं, उसका आप झटपट उत्तर दे देते हो।”

ज्ञान का मूल्य: प्रेरक कहानी

दादा जी ने हंसते हुए उसे उत्तर दिया, “बच्चे, तुमने देखा होगा कि तुम्हारे पापा और मैं पुस्तकें, अख़बार तथा मैगज़ीन पढ़ते रहते हैं। उन्हें पढ़कर ही हमारे पास बहुत सारा ज्ञान इकट्ठा होता रहता है। हमें जब भी आवश्यकता पड़ती है, हम उस ज्ञान का इस्तेमाल कर लेते हैं।”

अभिषेक ने फिर अपने दादा जी से प्रश्न किया, “दादा जी, पापा और आपको इतना कुछ याद कैसे रह जाता है?”

दादा जी ने उसके प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, “बेटा, यदि तुम कोई भी पुस्तक, अख़बार तथा मैगज़ीन बड़े ध्यान से पढ़ते हो तो उनमें लिखी बातें तुम्हारे दिमाग में बैठ जाती हैं और तुम उसे कभी नहीं भूल पाते।”

दादा जी द्वारा कही गई बातें अभिषेक के दिमाग में बैठ गईं। प्रेरित होकर उसकी दिलचस्पी पुस्तकें पढ़ने में दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उसने ज्ञान अर्जित करने के लिए पुस्तकें, अखबारों तथा मैगज़ीन बहुत ही दिलचस्पी से पढ़ने शुरू कर दिए।

उसके विद्यालय में सप्ताह में एक दिन उनकी कक्षा को पुस्तकालय में ले जाया जाता था। अभिषेक लाइब्रेरियन से सामान्य ज्ञान की पुस्तकें लेकर बड़े ध्यान से पढ़ता और अपने घर भी ले जाता, परन्तु अन्य बच्चे पुस्तकालय में शरारतें करते रहते या फिर लाइब्रेरियन से पढ़ने के लिए मिली पुस्तकें दिखावे के लिए हाथ में लेकर बेठे रहते थे।

यदि अभिषेक कभी उन्हें पूछता कि वे पुस्तकालय से मिली हुई पुस्तकों को पढ़ते क्‍यों नहीं, तो उनका उत्तर होता, “यार, अपने सिलेबस की पुस्तकें तो पढ़ी नहीं जातीं, इन्हें क्‍यों पढ़ें, इन पुस्तकों में से परीक्षा में प्रश्न तो पूछे नहीं जाएंगे।”

अभिषेक उनका उत्तर सुनकर चुप हो जाता। अभिषेक के पापा और दादा यदि उसे कभी कोई सामान्य ज्ञान का प्रश्न पूछते तो वह तुरन्त उस प्रश्न का उत्तर दे देता। उनसे शाबाशी मिलने पर वह और प्रोत्साहित हो जाता। कभी-कभी तो वह अपनी बड़ी बहन से भी मुकाबला करने लगता।

उसके विद्यालय में जब भी सामान्य ज्ञान का पेपर या मुकाबला होता, तो वह अपने वर्ग में प्रथम स्थान ही ग्रहण करता।

एक बार सामान्य ज्ञान का तहसील स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर का मुकाबला हुआ। वह तहसील स्तर से लेकर प्रांतीय स्तर तक प्रथम स्थान पर आया। अब उसका मुकाबला राष्ट्रीय स्तर के बच्चों के साथ था।

वह पहली बार राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले में भाग ले रहा था। वह काफी घबराया हुआ था। उसने अपने अपने पापा को कहा, “पापा, राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले में बहुत सारे बच्चे आए होंगे, उनसे मुकाबला करना बहुत कठिन कार्य है, मुझे बहुत डर लग रहा है।”

उसके पापा ने उसे समझाते हुए कहा, “बेटा, उस मुकाबले में तुम्हारे जैसे बच्चे ही आए होंगे, तुम डरने की बजाय अधिक से अधिक मेहनत करो। तुम्हारा इस स्तर पर पहुंचना ही तुम्हारी बहुत बड़ी उपलब्धि है।”

पापा को बातों ने उसके मन का डर दूर कर दिया। विद्यालय में भी उसे बहुत मेहनत करवाई गई। उसने राष्ट्रीय स्तर भी प्रथम स्थान प्राप्त किया।

सुबह की प्रार्थना सभा में विद्यालय के प्रधानाचार्य ने उसे सम्मानित करते हुए कहा, “बच्चो, अभिषेक ने अपने ज्ञान के आधार पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान प्राप्त करके अपने विद्यालय और परिवार का नाम रोशन किया है, सरकार की ओर से उसकी विश्वविद्यालय स्तर की सारी पढ़ाई मुफ्त कर दी गई है। यह उसके ज्ञान का पारितोषिक है, जो उसने पुस्तकें पढ़कर अर्जित किया है, सभी बच्चों को अभिषेक से प्रेरणा लेकर ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।”

जो बच्चे पुस्तकालय में पुस्तकें पढ़ने की बजाय शरारतें किया करते थे, उन्हें अभिषेक की बातें याद आ रही थीं।

~ प्रिंसिपल विजय कुमार

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