भोला अपने गांव का बहुत सीधा-सादा व्यक्ति था। लोग उसे इसलिए पसंद नहीं करते थे, क्योंकि वह कुछ कामकाज नहीं करता था। भोला अपने परिवार की आंखों में तिनके की रह चुभता था। उसे बांसुरी बजाने का बहुत शौक था। वह गांव के बाहर एक तालाब के किनारे अक्सर बांसुरी बजाया करता था।
उसकी बांसुरी की मधुर धुन सुनकर वहां के जीव-जंतु बड़े प्रसन्न होते और तो और वहां के पेड़-पौधे भी अत्यंत खुश होते। तितलियां और भंवरे सब उसकी मुरली की धुन सुनकर उपवन को छोड़कर उसी के पास उड़ते हुए चले आते।
भोला की बांसुरी: गोविंद भारद्वाज
जिस पेड़ के नीचे बैठकर वह बांसुरी बजाता था, उस पेड़ पर रहने वाले सारे पंछी उसके दोस्त बन चुके थे।
एक बार गांव में अकाल की स्थिति उत्पन हो गई। तालाब का पानी धीरे-धीरे सूखने लगा। पेड़ों के पत्ते झड़ने लगे। गांव के लोग पीने के पानी के लिए भी तरसने लग।
भोला पहले की तरह जैसे बांसुरी बजा रहा था। उसको बांसुरी की मधुर धुन सुनकर एक राहगीर वहां ठहर गया।
“अरे तुम तो बहुत सुन्दर बांसुरी बजाते हो भैया… क्या नाम है तुम्हारा?” राहगीर ने पुछा।
“भोला… भोला नाम है मेरा…।” भोला ने बड़े आदर के साथ उत्तर दिया।
राहगीर ने कहा, “तुम्हारे पास ऐसा हुनर है कि तुम अपने गांव के सूखे को मिटा सकते हो।”
“वो कैसे जी?” भोला ने पूछा।
“तुम अगर बांसुरी से राग मल्हार की तान छेड़ो, तो हो सकता है बादल उस तान को सुनकर प्रसन्न हो जाएं।” राहगीर ने उपाय बताया।
भोला को एक पल के लिए लगा कि कोई महान आत्मा या ईश्वर का कोई प्रतिनिधि उसके सामने खड़ा है। वह मन हो मन सोचने लगा कि वह राहगीर कहीं स्वयं कृष्ण भगवान तो नहीं।
उसने सिर झुकाकर कहा, “आपने बहुत उपयोगी सुझाव दिया है मान्यवर। मैं बांसुरी के माध्यम से राग मल्हार बजाने की प्रयास करूंगा।”
अगले ही पल वह राहगीर अपने पथ पर आगे बढ़ गया।
भोला ने मन ही मन सोचा, “इससे बढ़िया कोई और अवसर नहीं हो सकता… अपने गांव की मदद करेगा।”
दोपहर का समय था। धूप बहुत तेज थे। पशु-पक्षी पेड़-पौधे झुलस रहे थे। तालाब का पानी लगभग सूख चुका था। भोला बड़े मनन से इंद्रदेव को याद करते हुए बांसुरी बजाने लगा।
बांसुरी की धुन इतनी प्यारी थी कि वहां का सारा वातावरण संगीतमय हो गया। उसी समय एक बादल झुमता हुआ वहां आया और बांसुरी की धुन पर लहराने लगा।
भोला ने ऊपर देखा। बादल का वह टुकड़ा उसकी धुन पर बड़ी मस्ती में झम रहा था।
अचानक भोला ने बांसुरी बजानी बंद कर दी।
“बजाओ, बजाओ भैया… और बजाओ। मैं तो तुम्हारी बांसुरी की तान सुनकर इस तरफ चला आया।” बादल ने कहा।
“बांसुरी तो बजा दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है।” भोला ने कहा।
“कैसी शर्त भैया… ?” बादल ने नीचे झुकते हुए पूछा।
भोला ने कहा, “हमारे गांव में इस वर्ष बिल्कुल भी बारिश नहीं हुई… यदि तुम मेरे गांव पर झूम कर बरसो तो मैं तुन्हें बांसुरी की खूब तान सुनाऊंगा।”
“बस इतनी-सी शर्त? मेरा तो काम हो पानी बरसना है, तुम जितना कहो, उतनी देर बरस जाऊं। मैं तो अपनी सारी झोली ही खाली कर दूं।” बादल ने मुस्कुराते हुए कहा।
“देर किस बात की बादल भैया… बरस जाओ।” भोला ने कहा।
फिर क्या था झमाझम पानी वरसना शुरू हो गया। बादल लहरा-लहरा कर पूरे गांव और खेतों पर घूमता रहा।
देखते हो देखते चारों तरफ पानी ही पानी हो गया। भोला ने फिर बादल के लिए नई तान छेड़ी। बादल बहुत खुश हुआ। उसने चलते-चलते कहा, “तुम जब चाहो मुझे अपनी तान से बुला लेना… और हां, अब तुम्हारे गांव में कभी सूखा नहीं पड़ेगा। मैं अगली बार अकेला नहीं बल्कि अपने दल बल के साथ आऊंग…।”
“तुम्हारा आभार बादल भैया।” भोला ने धन्यवाद देते हुए कहा।
“अरे आभार तो मुझे जताना चाहिए तुम्हारा। जो मुझे इतना खुश कर दिया और फिर तुम ने तो गांव की भलाई का काम किया हैं… अपने लिए तो कुछ नहीं मांगा।” बादल ने कहा। भोला बहुत खुश था। यह सोचकर कि उसका बांसुरी बजाने का शौक कोई काम तो आया।
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